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गुजरात अस्मिता के ब्रह्मास्त्र से परास्त होगा जातीय समीकरणों का ऐरावत!

सोमवार से शुरू होगा गुजरात का असली रण जब मोदी अपनी रैलियों में हुंकार भरेंगे.

Updated On: Nov 26, 2017 09:43 AM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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गुजरात अस्मिता के ब्रह्मास्त्र से परास्त होगा जातीय समीकरणों का ऐरावत!

गुजरात के सियासी घमासान में 16 साल बाद बीजेपी के लिए ऐसा मौका आया है जब कि चुनाव प्रचार के लिये स्टार प्रचारक सीएम उम्मीदवार नहीं हैं. 13 साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी ही राज्य में बीजेपी के चुनाव प्रचार के ब्रांड एंबेसडर होते थे.

इस बार भी जिम्मेदारी वही है बस किरदार बदल चुका है. अब वो देश के प्रधानमंत्री हैं और छह करोड़ गुजरातियों की भावनाओं के लिये ये गौरव ऐतिहासिक भी है. ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि मोदी गुजराती अस्मिता का प्रतीक बन चुके हैं और अबकी बार गुजरात में चुनावी युद्ध छह करोड़ गुजराती भावनाओं बनाम विपक्षी मुद्दों के बीच हो रहा है.

चुनाव को रोमांचक बनाने के लिये मुद्दों का होना जरूरी है. विपक्ष की नज़र में उसके पास मुद्दे बहुत हैं. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने गुजरात में आईसीयू में पड़ी कांग्रेस में जान फूंकने के लिये न सिर्फ हर मुद्दे को छुआ बल्कि कांग्रेस के पुराने कोर वोटर को जोड़ने में भी कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी.

राहुल ने गुजरात में देवी-देवाताओं के सामने सजदा किया तो दलित-आदिवासियों के दिलों में झांकने की भी कोशिश की. लेकिन ये सारा प्रचार तब तक परवान चढ़ता रहा जबतक मोदी ने दिल्ली से गुजरात के लिये कूच नहीं किया. अब सोमवार से शुरु होगा गुजरात का असली रण जब मोदी अपनी रैलियों में हुंकार भरेंगे. मोदी उन आरोपों का जवाब देंगे जो उनकी सरकार पर लगे. उन इल्ज़ामों पर सफाई देंगे जो गुजरात के दामन पर कांग्रेस ने लगाए.

pm modi jaunpur rally

कांग्रेस भी अब मोदी की रैलियों का इंतज़ार कर रही है. वो भी ये जानना चाहती है कि इस बार ‘चायवाला रिटर्न्स’ के साइड इफैक्ट किस हद तक जाते हैं. युवा कांग्रेस ने जिस तरह से सोशल मीडिया के जरिये पीएम मोदी का मज़ाक उड़ाया है अब उस मज़ाक के जवाब देने की भी बारी आएगी.

मोदी विरोधियों के ही दिये हुए मुद्दों से अपने चुनाव प्रचार के लिये नवरत्न चुनते हैं. इस बार उनके पास बहुत सारे जवाब इकट्ठे हो चुके हैं. मोदी यहां पांच दिन में 17 रैलियां करेंगे. हालांकि उनकी पचास रैलियों की संभावना जताई जा रही है.

पहले प्रधानमंत्री पद से गुजरात का गौरव बढ़ाया तो बाद में देश की पहली बुलेट ट्रेन की सौगात भी गुजरात को मिली. बुलेट ट्रेन की सौगात पर बीजेपी सवारी कर सकती है जिससे पीछे कई वो आरोप छूट सकते हैं जो बार बार विकास के पागल होने का दावा करते हैं.

पीएम ने कहा कि इस प्रोजेक्ट के लिए शिंजो आबे ने निजी रूप से रुचि दिखाई, इसलिए तेजी से काम हो रहा है. जापान ने दिखा दिया है कि वो भारत का सबसे मजबूत दोस्त है.

पिछले 22 साल से गुजरात में बीजेपी सत्ता में है. इसकी बड़ी वजह पटेल-पाटीदारों की भूमिका है. पटेल समुदाय को लेकर इस वक्त गुजरात में राजनीति चरम पर है. हार्दिक पटेल कांग्रेस का समर्थन कर चुके हैं. कांग्रेस भी पूर्व मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी के खाम फॉर्मूले के तहत क्षत्रिय, दलित और आदिवासियों को लुभाने में लगी है.

गुजरात में दो दशक बाद जातीय समीकरणों की राजनीति हावी हुई है. बीजेपी अध्यक्ष जातीय समीकरणों को पहले ही साधने की तैयारी कर चुके थे. बीजेपी की जारी हुई टिकट लिस्ट में भी जातीय फैक्टर का ध्यान पूरी तरह रखा जा रहा है. इसके बावजूद पीएम मोदी विकास के लिये जातीवाद की राजनीति का विरोध कर चुके हैं. हालांकि गुजरात में पिछले दो दशक में वोटों के ध्रुवीकरण की वजह से जातियां गोलबंद नहीं हो सकी थीं लेकिन इस बार बदले बदले से हालात में कांग्रेस को उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है.

अब जब मोदी खुद जाति की राजनीति का जवाब देंगे तो माना जा सकता है कि कांग्रेस के सारे समीकरण गौण पड़ सकते हैं. मोदी एक बार फिर गुजरात के विकास के एडवांस्ड मॉडल की बात करेंगे क्योंकि विकास की कोई जाति या मज़हब नहीं होता है.

Amit Shah and Narendra Modi in Ahmedabad

गुजरात में सियासी फतह हासिल करने के लिये कांग्रेस युवा त्रिमूर्ति के भरोसे है तो नोटबंदी और जीएसटी की वजह से उसे कारोबारियों को लुभाने की उम्मीद दिखाई दे रही है. राहुल गांधी ने नोटबंदी और जीएसटी को लेकर लगातार पीएम मोदी पर प्रहार किया. उन्होंने जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स करार दिया तो नोटबंदी के एक साल बाद भी तीखा हमला बोला.

अब मोदी की बारी है कि वो जिसे गुड एंड सिंपल टैक्स बताते हैं वो वाकई में गुजरात के कारोबारियों के लिये कितना अच्छा और आसान है. हालांकि नोटबंदी और जीएसटी को लेकर चुनाव में उतनी हवा नहीं दिखाई दे रही है जितनी बड़ी लहर समझी या समझाई जा रही है.

patel statue

कांग्रेस की बेचैनी इस बात को लेकर ज्यादा रही है कि उसके ही प्रतीक पुरुष अब मोदी के लिये युगपुरुष हो चुके हैं. प्रतीकों की राजनीति में सरदार पटेल को कांग्रेस से मुक्त कराकर मोदी गुजरात में बड़ी जीत हासिल कर चुके हैं. साथ ही मोदी राजनीति के कद्दावर चेहरों को भी नेपथ्य से बाहर लाकर अपने साथ खड़ा करने में माहिर हैं.

हाल ही में गुजरात के सीएम विजय रूपानी ने बीजेपी के पूर्व नेता केशुभाई पटेल से मुलाकात की थी. ये मुलाकात एक बड़ा संकेत है भविष्य का और इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये कि किसी मंच पर मोदी के साथ केशुभाई पटेल भी साथ दिखाई दे जाएं और कांग्रेस-हार्दिक के मेल का पटाक्षेप हो जाए.

लोकसभा चुनाव जीतने के बाद मोदी के जीत के सेहरा में यूपी,महाराष्ट्र, हरियाणा,गोवा,उत्तराखंड जैसे राज्यों के जीत के नगीने लगे हैं और अब बारी उनके गृहराज्य की है. जाहिर तौर पर मोदी यहां के रण में बहुत कुछ सोचकर उतरेंगे. मोदी अपने विरोधियों से कह सकते हैं कि ‘मेरी खामोशियों का बहुत फायदा उठाया तुमने, अब जवाब देने का वक्त आया है तो शिकायत मत करना’.

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