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नोटबंदी: बीजेपी को महंगा पड़ सकता है मोदी का फैसला

प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के फैसले को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है

Updated On: Dec 17, 2016 08:04 PM IST

Akshaya Mishra

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नोटबंदी: बीजेपी को महंगा पड़ सकता है मोदी का फैसला

शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के संसदीय दल की मीटिंग में बोल रहे थे. कैमरे के सामने हमेशा उत्साह से भरे मोदी यहां कुछ थके हुए नजर आए. भाषा जोशीली थी पर उनके हाव-भाव इसके उलट थे. उनका चेहरा असामान्य रूप से क्लांत था.

वे हमेशा की तरह अपने विरोधियों पर तंज तो कस रहे थे पर उसमे वह आत्मविश्वास नहीं था जो उनके भाषणों में रहता है.

उनका व्यंग्य भी फीका ही था. वे वह मोदी थे ही नहीं जो एक कुशल वक्ता की तरह अपने श्रोताओं को बांधे रखते हैं.

ऐसा लग रहा था मानो वे खुद को लेकर किसी संशय की स्थिति में हैं. मोदी ने दृढ़ता से नोटबंदी और डिजिटल पेमेंट के फैसले पर उठ रहे सवालों का बचाव किया. उन्होंने कहा कि काले धन की समस्या से निपटने के लिए यह पहला कदम है, लड़ाई अभी और भी है.

उन्होंने कांग्रेस के अतीत के उदाहारण देते हुए कहा कि कांग्रेस ने हमेशा दल को देश से ऊपर रखा है. उन्होंने वामपंथी पार्टियों पर अपनी विचारधारा से समझौता करने का आरोप लगाया.

उन्होंने भाजपा नेताओं से कहा कि वे जनता को कैशलेस होने के लिए प्रेरित करें साथ ही डिजिटल पेमेंट करने पर कैश ईनाम की भी घोषणा की.

हालांकि इतने सब के बाद भी वे विश्वसनीय नहीं लगे. शायद इसका कारण यह हो सकता है कि अपने पहले लिए गए फैसलों पर वे जनता के समर्थन की बात कह सकते हैं पर नोटबंदी के फैसले पर वे जनता के समर्थन को लेकर आश्वस्त नहीं हैं.

उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव सिर पर आ चुके हैं, पार्टी कार्यकर्ता नोटबंदी के फैसले पर वोटरों की नाराजगी को लेकर आशंकित हैं. वे काले धन को तो किसी भावनात्मक बात से जोड़ सकते हैं पर डिजिटल पेमेंट को आम जनता में स्वीकार्य कैसे बनायेंगे?

एक ऐसा देश जहां लोगों का बैंकिंग व्यवस्था पर विश्वास कम है, मोबाइल फोन अब भी कौतुक की चीज है, कैशलेस पेमेंट करने के लिए जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है वहां कोई पार्टी कैसे ग्रामीण जनता को डिजिटल होने के फायदे गिना सकती है.

New Delhi: Prime Minister Narendra Modi during BJP parliamentary party meeting in New Delhi on Friday. PTI Photo by Manvender Vashist (PTI12_16_2016_000097B)

उससे भी खराब यह कि डिजिटल होने की बात से यह जनता इतनी अनभिज्ञ और अनजान हैं कि तकनीक की ये बातें उनकी समझ में भी नहीं आएंगी. मोदी जैसे जमीन से जुड़े और अनुभवी नेता को इस बात का एहसास तो होगा.

वे यह तो समझते ही होंगे कि विमुद्रीकरण के इस फैसले से जनसाधारण में किस तरह की नाराजगी है और इस फैसले पर और ज्यादा समय तक विरोध का बचाव नहीं किया जा सकता.

पहली बार किसी मुद्दे पर विपक्ष मजबूत दिख रहा है. फैसले पर उठे सवालों पर संसद या और किसी बहस में तो बचा जा सकता है पर विधानसभा चुनावों के मद्देनजर जमीन पर काम कर रहे पार्टी कार्यकर्ताओं को इस फैसले से उपजे कैश संकट का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है.

जो लोग अपनी रोजमर्रा की जिदंगी में नोटबंदी से हुई मुश्किलों का सामना कर रहे हैं, उन्हें देने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं के पास कोई जवाब नहीं है.

यही समस्याएं प्रधानमंत्री के निस्तेज भाषण का कारण हो सकती हैं पर जो बात समझ से बाहर है वो है मोदी का डिजिटल पेमेंट पर जिद्दी रवैया. वे इसके लिए इतनी जल्दी में क्यों हैं?

लोगों से कैशलेस व्यवस्था को अपनाने की उम्मीद करने से पहले वे इसके लिए जरूरी इंफास्ट्रक्चर और जागरूकता लाने की कोशिश क्यों नहीं कर रहे हैं?

सरकार गंभीर मुद्दों पर कदम उठाने की बजाय इन सबमे क्यों उलझ रही है? अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों को आवश्यक बदलावों की जरूरत है पर इस पर ध्यान देने की जगह सरकार अपनी सारी ऊर्जा लोगों का कैश से मुंह मोड़ने में क्यों लगा रही है?

New Delhi: BJP President Amit Shah with party MPs after BJP parliamentary party meeting in New Delhi on Friday. PTI Photo by Manvender Vashist (PTI12_16_2016_000170B)

संसदीय दल की बैठक के बाद पार्टी नेताओं के साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह

कई समीक्षकों का मानना है कि सरकार लोगों की रोज बढ़ती मुश्किलों का हल ढूंढने में नाकाम है इसलिए ध्यान भटकाने के लिए ऐसे कदम उठाये जा रहे हैं. समीक्षकों की यह बात सही हो सकती है.

ऐसा भी लगता है कि प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के फैसले को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है. जो भी हो वे इसे हर हाल में न्यायोचित ठहराएंगे चाहे इसके लिए कोई भी अव्यवहारिक कदम उठाना पड़े, भले ही उससे मौजूदा मुश्किलें हल होने के बजाय बढ़ ही क्यों न जाएं.

मोदी नाटकीयता और भव्यता पसंद करते हैं, इससे उनकी छवि को फायदा मिलता है. पर इस बार ऐसा लगता है कि स्थितियां उनके काबू से बाहर हो चुकी हैं. पर वे इसे स्वीकार नहीं करना चाहते जिसका नतीजा भविष्य में उनकी पार्टी को भुगतना पड़ सकता है.

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