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क्या कांग्रेस के दखल से SC में अयोध्या केस का फैसला टला? पीएम मोदी के आरोपों की पड़ताल

नरेंद्र मोदी अगर यह कह रहे हैं कि कांग्रेस देश की न्यायपालिका में दखल दे रही है तो इसका मतलब यह है कि प्रधानमंत्री अपने झूठ को लेकर कितना खतरनाक रूप से विश्वस्त हैं

Updated On: Nov 27, 2018 07:23 AM IST

Suhit K. Sen

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क्या कांग्रेस के दखल से SC में अयोध्या केस का फैसला टला? पीएम मोदी के आरोपों की पड़ताल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण में देरी के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया है. पीएम मोदी ने आरोप लगाया है कि, कांग्रेस न्याय प्रक्रिया में दखल देकर राम मंदिर केस की सुनवाई में देरी करा रही है.

मोदी ने कांग्रेस पर यह आरोप रविवार को राजस्थान के अलवर में एक जनसभा के दौरान लगाया. पीएम मोदी ने कहा कि, कांग्रेस न्याय प्रक्रिया में दखल देकर जजों पर दबाव बनाने का प्रयास कर रही है, ताकि राम मंदिर केस की सुनवाई को लंबे वक्त तक टाला जा सके. पीएम मोदी के मुताबिक कांग्रेस ऐसा इसलिए कर रही है, क्योंकि 2019 में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं.

क्यों लगाया यह आरोप?

दरअसल पीएम मोदी का यह आरोप सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस (सीजेआई) दीपक मिश्रा के खिलाफ चलाए गए महाभियोग अभियान के संदर्भ में था. इसी साल अप्रैल महीने में कांग्रेस ने दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने का अभियान चलाया था.

कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दलों के कुल 64 सांसदों ने दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू के सामने पेश किया था. महाभियोग प्रस्ताव में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को पद से हटाने के लिए 5 वजहें बताई गईं थीं. लेकिन उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग चलाए जाने की मांग खारिज कर दी थी.

Justice-Deepak-Mishra

इसके बाद चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने बिना किसी अड़चन के अपना कार्यकाल पूरा किया. जस्टिस दीपक मिश्रा के रिटायरमेंट के बाद 3 अक्टूबर को जस्टिस रंजन गोगोई ने देश के नए चीफ जस्टिस की शपथ ली थी.

संगीन आरोप

प्रधानमंत्री मोदी ने न्यायपालिका में दखल का जो आरोप लगाया है वह बेहद संगीन है. जाहिर तौर पर उनका इशारा सुप्रीम कोर्ट में चल रहे कुछ अहम केसों की ओर था. लिहाजा उन केसों की सुनवाई और उन पर आए फैसलों की पड़ताल बेहद जरूरी है. ऐसा इसलिए ताकि पीएम मोदी के आरोपों को सच की कसौटी पर जांचा-परखा जा सके.

तो चलिए, जस्टिस दीपक मिश्रा के रिटायरमेंट से ठीक पहले उनकी अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न बेंचों में सुनवाई के लिए आए अलग-अलग केसों पर नजर डालते हैं.

सितंबर के आखिरी सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट ने भीमा-कोरेगांव गिरफ्तारी केस, अयोध्या का बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि केस, सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में SC/ST आरक्षण केस, आधार कार्ड की अनिवार्यता और संवैधानिकता केस, IPC की धारा 497 के तहत एडल्टरी की वैधता केस और केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री के केस पर सुनवाई की. इनमें से पांच अहम केसों में से तीन के फैसले सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के पक्ष में सुनाए.

भीमा-कोरेगांव गिरफ्तारी केस में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज किए गए आपराधिक मामलों को खारिज करने की मांग वाली सभी याचिकाओं पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया. यह याचिकाएं देश के कई प्रतिष्ठित लोगों द्वारा दायर की गई थीं.

अयोध्या केस में क्या हुआ फैसला?

अयोध्या केस में सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम में अनिवार्य नहीं बताने वाले अपने पूर्व के फैसले को बरकरार रखा था और फैसले को पुनर्विचार (रिव्यू) के लिए बड़ी बेंच में भेजने से इनकार कर दिया था. दरअसल साल 1994 में अयोध्या में भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाले डॉक्टर एम. इस्माइल फारूकी के मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 3-2 के बहुमत से दिया था.

इस फैसले में कहा था कि नमाज के लिए मस्जिद इस्लाम धर्म का अभिन्न हिस्सा नहीं है. मुसलमान कहीं भी नमाज अदा कर सकते हैं. यहां तक कि खुले में भी नमाज अदा की जा सकती है. मुस्लिम पक्षकारों ने इसी फैसले को चुनौती दी थी और मामले को सात सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजने की मांग की थी. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय संविधान पीठ ने मुस्लिम पक्षकारों की इस मांग को 2-1 के बहुमत से खारिज कर दिया था.

Supreme Court of India New Delhi: A view of Supreme Court of India in New Delhi, Thursday, Nov. 1, 2018. (PTI Photo/Ravi Choudhary) (PTI11_1_2018_000197B) *** Local Caption ***

इसी तरह, सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने अनुसूचित जाति और जनजातियों (SC/ST) के लिए सरकारी नौकरियों में पदोन्नति (प्रमोशन) में आरक्षण पर दिए गए अपने पूर्व के फैसले पर फिर से विचार करने से इनकार कर दिया था. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की संविधान पीठ ने कहा था कि, सरकारी नौकरियों के प्रमोशन में SC/ST को आरक्षण मिलेगा. साथ ही पीठ ने यह भी कहा था कि, साल 2006 के नागराज जजमेंट को सात जजों को रैफर करने की जरूरत नहीं है.

आधार कार्ड की अनिवार्यता पर फैसला

आधार कार्ड की अनिवार्यता और संवैधानिकता के केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला मिला-जुला रहा था. कोर्ट ने एक तरफ जहां आधार की संवैधानिकता को बरकरार रखा था और उसे आम आदमी की पहचान माना था, वहीं दूसरी तरफ बैंक खातों और फोन नंबरों को आधार से जोड़ने की अनिवार्यता को खत्म कर दिया था. आधार कार्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बहुत संतुलित था, जिसे सरकार के हक में माना जा सकता है.

जस्टिस दीपक मिश्रा के रिटायरमेंट से पहले सुप्रीम कोर्ट के दो फैसले खासे उदार रहे. इनमें से एक केस था IPC की धारा 497 के तहत एडल्टरी की वैधता का. अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 158 साल पुराने व्यभिचार (एडल्टरी) कानून को रद्द कर दिया था. कोर्ट ने कहा था कि, अगर अविवाहित पुरुष किसी विवाहित महिला के साथ सेक्स करता है तो वह व्यभिचार नहीं होता.

कोर्ट ने कहा कि, शादी की पवित्रता बनाए रखने के लिए पति और पत्नी दोनों की जिम्मेदारी होती है. कोर्ट ने यह भी कहा था कि, विवाहित महिला अगर किसी विवाहित पुरुष से संबंध बनाती है तो सिर्फ पुरुष ही दोषी क्यों? जबकि महिला भी अपराध की जिम्मेदार है. बता दे कि, सुप्रीम कोर्ट के इस हालिया फैसले से पहले, किसी विवाहित महिला से किसी अन्य पुरुष द्वारा सेक्स करने को अपराध माना जाता था. तब सिर्फ पुरुषों पर ही व्यभिचार का आपराधिक केस दर्ज होता था, जबकि महिलाओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती थी.

सबरीमाला पर फैसला 

सुप्रीम कोर्ट ने दूसरा उदार फैसला केरल के सबरीमाला मंदिर केस में सुनाया था. अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की इजाजत दी थी. उससे पहले मासिक धर्म में सक्षम 10 से 50 साल तक की उम्र वाली महिलाओं को सबरीमाला मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाए गए इन फैसलों की सूची यहां किसी बहस-मुबाहिसे के लिए नहीं दी गई है. और न ही इन फैसलों पर कोई टीका-टिप्पणी का इरादा है. मेरा मकसद यहां उस आरोप की पड़ताल करना है जो पीएम मोदी ने कांग्रेस पर लगाए हैं. मैं ससम्मान कहना चाहूंगा कि, सुप्रीम कोर्ट के इन सभी फैसलों में कहीं भी तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा पर कांग्रेस के दबाव/दखल या महाभियोग के डर की झलक नजर नहीं आती है.

सितंबर महीने के आखिर में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाए गए लगभग सभी फैसलों से तो यह जाहिर होता है कि, तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा इस बात से बखूबी वाकिफ थे कि, कांग्रेस और बाकी विपक्षी दलों के पास उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं है और वे सिर्फ प्रतीकात्मक तौर पर ही उनका विरोध कर रहे हैं.

दरअसल सुप्रीम कोर्ट के किसी जज के खिलाफ महाभियोग चलाने के लिए संसद के दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव पारित कराना अनिवार्य होता है. महाभियोग प्रस्ताव पारित कराने के लिए प्रत्येक सदन के सदस्यों की कुल संख्या का दो-तिहाई बहुमत पाना आवश्यक होता है.

पीएम की राय अलग

लेकिन इन सब के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी अलग ही राग अलाप रही है. आइए देखते हैं कि, पीएम मोदी की पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेशों और फैसलों पर क्या प्रतिक्रिया दी. जस्टिस रंजन गोगोई ने सीजेआई के रूप में पदभार संभालने के बाद ही यह स्पष्ट कर दिया था कि, वह अयोध्या केस पर जल्द कोई आदेश पारित नहीं करेंगे.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने 2019 के जनवरी महीने की शुरुआत में अयोध्या केस की सुनवाई निर्धारित की है. ऐसे में यह जानते हुए कि, अब अयोध्या केस में अंतिम फैसला 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले पारित नहीं हो सकता है, बीजेपी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और संघ परिवार के अन्य सहयोगी संगठनों ने भड़काऊ अभियान शुरू कर दिया है.

जनता को बहलाने-फुसलाने और भड़काने के इसी अभियान के तहत इन संगठनों ने बीते सप्ताहांत अयोध्या में भीड़ इकट्ठा करके शक्ति प्रदर्शन किया. इस दौरान अनौपचारिक और निर्णायक तौर पर यह मांग की गई कि अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण के लिए केंद्र सरकार जल्द से जल्द एक अध्यादेश या कानून पारित करे.

क्या यह दखलअंदाजी नहीं है?

क्या यह न्यायिक प्रक्रिया में दखलअंदाजी नहीं है? क्या इसे न्यायिक प्रक्रिया में अड़चन नहीं माना जाना चाहिए? जाहिर है कि यह सब राजनीतिक लाभ यानी जनता की सहानुभूति और समर्थन हासिल करने के लिए किया जा रहा है. लेकिन इसके लिए कोर्ट में लंबित केस को प्रभावित करने की कोशिश हो रही है. केस की प्रक्रिया में बाधा डालने का प्रयास हो रहा है और खुलेआम नियम-कानूनों का उल्लंघन किया जा रहा है.

सबरीमाला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कई लोगों ने हिंदू धर्म के खिलाफ माना है. खासकर हिंदूवादी कट्टरपंथी तो उच्च न्यायालय के फैसले को परंपरा, आस्था और धर्म पर हमला करार दे रहे हैं. यही वजह है कि, बीजेपी, आरएसएस, सबरीमाला मंदिर के कर्ताधर्ता-संचालक समेत अन्य कट्टरपंथी लोग सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कार्यान्वयन में बाधा डालने के लिए भरपूर प्रयास कर रहे हैं.

इसके लिए पूरे केरल में जबरदस्त अभियान चलाया जा रहा है. हिंदूवादी कट्टरपंथियों के उग्र विरोध-प्रदर्शनों के चलते ही अबतक सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू नहीं हो पाया है. यानी अबतक सभी आयु वर्ग की महिलाएं सबरीमाला मंदिर में प्रवेश नहीं कर पाई हैं.

हास्यास्पद आरोप

चलिए एक बार फिर से प्रधानमंत्री मोदी की बात करते हैं, जो व्यावहारिक रूप से पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के साथ मिलकर बीजेपी को चलाते हैं. ऐसे में मोदी का यह आरोप हास्यास्पद लगता है कि कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट के कामकाज में दखल दे रही है. CJI को डरा-धमका रही है और न्यायपालिका को राजनीति का अखाड़ा बनाने की कोशिश कर रही है.

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पीएम मोदी की पार्टी को जरा अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए. यह बीजेपी है, जो न्यायपालिका को तबाह करने पर तुली हुई है. यह बीजेपी है, जो सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को निर्थक और निष्प्रभावी करने के लिए अतिरिक्त कानूनी साधनों का इस्तेमाल करने की पूरजोर कोशिश कर रही है.

बीजेपी और केंद्र समेत कई राज्यों में उसकी सरकारों द्वारा सिर्फ न्यायपालिका को ही निशाना नहीं बनाया जा रहा है, बल्कि उनकी ओर से देश के ज्यादातर संस्थानों पर हमले किए जा रहे हैं, उन्हें या तो कमजोर किया जा रहा है या नष्ट करने के प्रयास हो रहे हैं.

अब चुनाव आयोग को ही ले लीजिए. पिछले साल अक्टूबर में चुनाव आयोग ने हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए नवंबर महीने की तारीखों का ऐलान किया था. लेकिन गुजरात विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा करने में देरी की गई. जो दिसंबर महीने के आखिर में संपन्न हुए.

गुजरात विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान में चुनाव आयोग द्वारा की गई देरी से गुजरात की बीजेपी सरकार को लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा करने के लिए न सिर्फ एक महीने की मोहलत मिल गई थी, बल्कि बीजेपी को अपने चुनावी अभियान को बेहतर तरीके से व्यवस्थित करने का ज्यादा समय भी मिल गया था.

इस विलंब के बावजूद चुनाव में कांग्रेस ने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी. गुजरात की कुल 182 विधानसभा सीटों में से बीजेपी सिर्फ 99 सीटें ही जीत पाई थी. यह आंकड़ा बहुमत से केवल सात सीट ज्यादा था. लिहाजा कहना गलत नहीं होगा कि, चुनाव की तारीखों के ऐलान में देरी काफी महत्वपूर्ण साबित हुई. जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला.

पीएम को चुनाव आयोग का साथ 

अभी हाल ही में, चुनाव आयोग ने पांच राज्यों- छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना में विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा में लगभग तीन घंटे तक देरी की. दरअसल उस समय प्रधानमंत्री मोदी राजस्थान में एक रैली को संबोधित कर रहे थे. उसी रैली में राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने चुनाव की तारीखों के ऐलान से ठीक पहले जनता के लिए बिजली आपूर्ति की एक योजना की घोषणा की.

इस योजना की घोषणा के तुरंत बाद चुनाव आयोग ने चुनाव की तारीखों का ऐलान किया और आचार संहिता लागू हो गई. बाद में चुनाव आयोग ने इस मामले में अपनी सफाई दी थी और इसे महज संयोग करार दिया था. अब यह संयोग था साजिश इसका निर्णय पाठक खुद कर सकते हैं.

केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी सरकार देश के विभिन्न संस्थानों को नष्ट करने पर अमादा है. केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), आयकर विभाग (इनकम टैक्स डिपार्टमेंट), प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी संस्थाओं का जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है. सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने के लिए इन संस्थाओं का इस्तेमाल एक उपकरण के तौर पर कर रही है.

हालांकि, ऐसा कोई पहली बार नहीं हो रहा है. बीजेपी से पहले की सरकारें भी यह काम कर चुकी हैं. लेकिन मोदी सरकार जिस दीदा दिलेरी के साथ मनमानी कर रही है, उससे देश के लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा हो गया है. कुल मिलाकर कहा जाए तो, केंद्र की इस बीजेपी सरकार ने मीडिया को भी डराने का लगातार प्रयास किया है. यही वजह है कि, आप तक सरकार की कारगुजारियों की पूरी तस्वीर नहीं पहुंच पाती है. दरअसल यह सरकार संवैधानिक मानदंडों को केवल नाम मात्र का सम्मान देती है. इस सरकार की कथनी और करनी के बीच जमीन और आसमान का फर्क है.

इसलिए, नरेंद्र मोदी अगर यह कह रहे हैं कि, कांग्रेस देश की न्यायपालिका में दखल दे रही है, तो इसका मतलब यह है कि, प्रधानमंत्री अपने पेटेंटधारी झूठ को लेकर कितना खतरनाक रूप से विश्वस्त हैं. जनता की अनदेखी की आशंका के चलते वह निरंकुश होकर कुछ भी बोल सकते हैं. उम्मीद की जा रही है कि, पांच विधानसभा चुनावों के नतीजे प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी को जनता की नब्ज और जमीनी हकीकत से वाकिफ करा देंगे. तब उनके तेवर शायद थोड़े नरम हो जाएं.

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