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#MeToo: एमजे अकबर का पतन भारतीय राजनीति के लिए एक निर्णायक क्षण है

जाहिर तौर पर एमजे अकबर 'सम्मानपूर्वक विदाई' लेकर बीजेपी को और शर्मिंदगी और परेशानी से बचा सकते हैं. ऐसे में अब पूरा का पूरा दारोमदार अकबर पर है

Updated On: Oct 14, 2018 06:23 PM IST

Sanjay Singh

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#MeToo: एमजे अकबर का पतन भारतीय राजनीति के लिए एक निर्णायक क्षण है

एडिटर्स नोट: विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर के आधिकारिक विदेश दौरे से भारत लौटने के बाद उन पर मंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए लगातार दबाव बढ़ रहा है. भारत में चल रहे #MeToo कैंपेन के तहत कम से कम 14 महिला पत्रकारों ने अकबर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है. पूर्व पत्रकार अकबर से जुड़े विवाद से संबंधित खबरों में हालिया अपडेट को प्रमुखता से पेश करने के लिए इस लेख को संपादित कर इसे फिर से प्रकाशित किया गया है.

एमजे अकबर को लेकर चल रहा हालिया मामला भारतीय राजनीति में निर्णायक क्षण हो सकता है. जिस तरह से उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों को देखा जा रहा है और उसके बाद राजनीतिक आकाओं द्वारा कार्रवाई को लेकर चल रहे घटनाक्रम के सिलसिले में कम से कम यह बात कही जा सकती है. यह भारत में सोशल मीडिया और राजनीति पर उसके असर के मामले में भी निर्णायक क्षण है. वो पहले ऐसे मंत्री हो सकते हैं, जिन्हें सोशल मीडिया पर बढ़ते दबाव के कारण शायद अपने पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़े.

आम तौर पर अब तक चलन रहा है कि अगर किसी शख्स को इस तरह के अपराध में सजा मिलती है या उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज होता है, तो उसे मंत्री का ओहदा या अन्य अहम पद छोड़ने को कहा जाता है. अकबर के खिलाफ अब तक कोई एफआईआर नहीं है. 14 महिलाओं ने अकबर को यौन उत्पीड़न का दोषी बताया है. यह तमाम कथित घटनाएं 15-20 साल पहले हुईं. लिहाजा, इसमें किसी तरह का आपराधिक मुकदमा संभव नहीं है.

भारत में #MeToo कैंपेन के जोर पकड़ने के बाद से कई महिलाओं ने अपने बयां की है

भारत में #MeToo कैंपेन के जोर पकड़ने के बाद से कई महिलाओं ने अपने साथ पूर्व में हुए यौन उत्पीड़न की घटनाएं बयां की है

हालांकि, महिलाओं के आरोपों को भरोसा करने योग्य मानते हुए और मीडिया में अकबर के आसपास बुनी गई कहानी को ध्यान में रखें तो विदेश राज्य मंत्री के पास अपने पक्ष में सफाई पेश करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं बचता है. साथ ही, उन्होंने इसको लेकर कुछ भी प्रतिक्रिया नहीं दी है. उनका ट्विटर एकाउंट 6 अक्टूबर से खामोश है. अकबर अफ्रीका के आधिकारिक दौरे पर थे और वो रविवार सुबह ही भारत लौटे. भले ही उन पर अपने पद से इस्तीफा देने के लिए दबाव तेजी से बढ़ रहा हो, लेकिन उनका मंत्रालय ज्यादा कुछ नहीं कह रहा है. बहरहाल, मुमकिन है कि वो बाद में इस संबंध में एक बयान जारी कर दें. विदेश से लौटकर दिल्ली हवाई अड्डे पर पत्रकारों से बातचीत में भी उन्होंने इस तरह की बात कही थी.

इससे पहले खबर आई थी कि एमजे अकबर शुक्रवार को नाइजीरिया से वापस दिल्ली लौटेंगे. इसके बाद फिर यह बताया गया कि अकबर अपने मूल कार्यक्रम के मुताबिक इक्वेटोरियल गिनी में हैं और रविवार को राजधानी दिल्ली वापस लौटेंगे.

खुद से इस्तीफा देकर पार्टी को राहत दे सकते हैं अकबर

मोदी सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया था कि अकबर के भारत लौटने के बाद उनसे मंत्री पद से अपना इस्तीफा देने के लिए कहा जाएगा. निश्चित तौर पर यह एक तरह से मंत्री पद से बर्खास्त किए जाने जैसा मामला है, लिहाजा जाहिर तौर पर अकबर 'सम्मानपूर्वक विदाई' लेकर बीजेपी को और शर्मिंदगी और परेशानी से बचा सकते हैं. ऐसे में अब पूरा का पूरा दारोमदार अकबर पर है.

जहां तक इस संबंध में फैसला लेने में हुई देरी का सवाल है, तो भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि अकबर की विदेश यात्रा के दौरान ही अगर उन पर कार्रवाई करने का फैसला किया जाता तो यह शायद सरकार के लिए ठीक नहीं रहता. साथ ही, यात्रा के बीच में उनसे ही स्पष्टीकरण मांगने की बात भी किसी तरह से उचित नहीं थी. बीजेपी नेताओं के मुताबिक, उच्च अधिकारियों, जूनियर या सीनियर मंत्रियों के द्विपक्षीय दौर के लिए एक निश्चित प्रक्रिया है, जिसका अवश्य पालन किया जाना चाहिए. इन नेताओं का कहना था कि मंत्री आखिरकार देश का प्रतिनिधित्व करते हैं.

एमजे अकबर पर 1 अमेरिकी समेत 10 महिला पत्रकारों ने यौन शोषण और छेड़छाड़ के गंभीर आरोप लगाए हैं

विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर पर 1 अमेरिकी समेत कई महिला पत्रकारों ने हाल-फिलहाल यौन शोषण और छेड़छाड़ के गंभीर आरोप लगाए हैं

शिष्टचार और औपचारिकता का यह भी तकाजा है कि अकबर को अपना पक्ष रखने के लिए भी मौका दिया जाना चाहिए. उन्हें आरोपों पर नेतृत्व के सामने जवाब देने का अवसर मिलना चाहिए. साथ ही, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह फिलहाल राजधानी दिल्ली में नहीं हैं, बैठक भी तत्काल संभव नहीं है. अकबर के इस्तीफे पर आखिरी फैसला इस तरह की सुनवाई के बाद ही किया जा सकता है.

यहां इस बात का भी जिक्र करना जरूरी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे राजनेता हैं, जिन्होंने सबसे पहले सोशल मीडिया की ताकत को महसूस किया. मोदी ने 2014 के आम चुनावों में इसे अपने (और बीजेपी के भी) फायदे के लिए बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया और वो अब भी ऐसा कर रहे हैं.

पूरी तरह सोच-विचार के बाद ही फैसले के मूड में है BJP

सोशल मीडिया पर चल रहे #MeToo कैंपेन ने शहरी भारतीय समाज में हलचल पैदा कर दी है और भारत में अकबर पहले ऐसे हाई प्रोफाइल शख्स हैं, जिन पर यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद अपने पद से इस्तीफा देने का दबाव लगातार बढ़ रहा है. यहां यह बात भी बेहद महत्वपूर्ण है कि मोदी सोशल मीडिया का रुख खुद और अपनी पार्टी के खिलाफ होते हुए चुपचाप नहीं देख सकते.

इसके अलावा, अकबर के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई एक तरह का उदाहरण भी पेश करेगी. ऐसा पहली बार हुआ है, जब सोशल मीडिया पर किसी मंत्री के खिलाफ इस तरह के आरोप लगाए गए हैं. अकबर के खिलाफ पार्टी जिस तरह की भी कार्रवाई के बारे में फैसला करती है, सोशल मीडिया पर दूसरे नेताओं के खिलाफ इस तरह के आरोप उभरकर सामने आने के बाद उन पर भी पार्टी को इसी तरह की कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. लिहाजा, अकबर के मामले में किसी भी तरह की कार्रवाई करने से पहले बीजेपी इस पर पूरी तरह से सोच-विचार कर लेना चाहती है.

BJP National Executive Meeting

अमित शाह और नरेंद्र मोदी

संघ के लिए काफी मायने रखता है यह मुद्दा

मोदी की वैचारिक पाठशाला राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ (आरएसएस) व्यक्ति निर्माण में गर्व की बात करता है. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने हाल में दिल्ली में आयोजित संघ के एक कार्यक्रम में 3 दिन तक चले व्याख्यान में व्यक्ति निर्माण पर विस्तार से भाषण दिया. अकबर पर जिस तरह के आरोप लगे हैं, वो सीधे तौर पर उन सिद्धांतों के उलट हैं, जिसकी चर्चा मोहन भागवत ने इस कार्यक्रम के दौरान अपने भाषण में की थी. कुछ साल पहले आरएसएस ने अपने एक नेता के खिलाफ सिर्फ इसलिए सख्त कार्रवाई करने का फैसला किया था, क्योंकि उनकी एक गतिविधि को नैतिक भ्रष्टता का नमूना माना गया. हालांकि, उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न का कोई आरोप नहीं था. अकबर के खिलाफ इस तरह के आरोप मोदी को यह साबित करने का अवसर भी मुहैया कराते हैं कि जब वो (मोदी) महिलाओं की गरिमा की बात करते हैं, तो इससे उनका क्या आशय होता है.

बीजेपी ने अकबर को राजनीतिक गुमनामी से बाहर निकाला और उसके बाद सबसे पहले पार्टी का प्रवक्ता बनाया. इसके बाद इस पार्टी ने अकबर को राज्यसभा सांसद और आखिरकार अहम माने जाने वाले विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री का पद दिया. बता दें कि इससे पहले एमजे अकबर 1989 में बिहार के किशनगंज से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर लोकसभा सांसद चुने गए थे. साथ ही वो पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के भी करीबी थे.

हालांकि, बीजेपी सरकार में उनकी इस पदोन्नति (प्रमोशन) को लेकर कइयों को हैरानी भी हुई थी. अकबर कभी मोदी के कट्टर आलोचक हुआ करते थे और उन्होंने मोदी को ऐसा 'हिटलर' करार दिया था, जिसका दुश्मन मुस्लिम समुदाय है. उन्होंने यह भी कहा था कि मोदी के लिए एक हिंदू की जिंदगी के बराबर दो मुसलमानों की जिंदगी है. इसके अलावा भी मोदी के खिलाफ उन्होंने कई अन्य तरह की बातें की थीं. हालांकि, ऐसा लगता कि मोदी को इन पुरानी बातों को भुलाने में किसी तरह की आपत्ति नहीं थी और इस तरह से उन्होंने अकबर को 2016 में केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल कर लिया था.

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