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मेघालय चुनाव 2018: इन मुद्दों की वजह से आसान नहीं होगी बीजेपी की राह

मेघालय में फरवरी महीने में चुनाव होने की संभावना है, इस बार कई मुद्दों की वजह से क्षेत्रीय पार्टियों से कांग्रेस-बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टियों को पार पाने में मुश्किल हो सकती है

Phalguni Rao Updated On: Jan 18, 2018 08:34 AM IST

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मेघालय चुनाव 2018: इन मुद्दों की वजह से आसान नहीं होगी बीजेपी की राह

पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय में इस साल के शुरुआती महीनों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और यह बात तय है कि सत्ताधारी कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, नेशनल पीपुल्स पार्टी और अन्य क्षेत्रीय दलों के लिए चुनावी मुकाबला बहुत कठिन साबित होगा.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक मेघालय की आबादी 29,66,889 है और सूबे का विस्तार 22,429 वर्गकिलामीटर में है. सो कह सकते हैं कि मेघालय में उतने ही लोग रहते हैं जितने कि जमैका में और यह सूबा उतना ही बड़ा है जितना कि मध्य अमेरिका का देश ब्लीज. साल 1970 के अप्रैल में असम के एक हिस्से को स्वायत्त (ऑटोनोमस) इलाके का दर्जा मिला फिर इस इलाके को 1972 की जनवरी में पूर्ण राज्य घोषित किया गया, इस तरह मेघालय का निर्माण हुआ. मेघालय जमीन की एक संकरी लंबी पट्टी पर बसा है और बांग्लादेश के साथ कुल 443 किलोमीटर लंबी अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा का दक्षिणी हिस्से में इस सूबे का साझा है.

राज्य की आबादी

साल 2011 के जनगणना के मुताबिक राज्य की आबादी में पुरुषों की संख्या 14,91,832 है और महिलाएं 14,75,057 की तादाद में हैं. पूर्वोत्तर के इस राज्य में जनजातीय आबादी अच्छी खासी (2,555,861) है जबकि अनुसूचित जाति के लोगों की संख्या 17,355 है.

राज्य में लैंगिक अनुपात (प्रति हजार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या) 989 है. सूबे के ग्रामीण इलाके में लैंगिक अनुपात 989 है जबकि शहरी इलाके में 1001.

साक्षरता की दर 74.43 फीसदी है. पुरुषों की साक्षरता दर (75.95 फीसदी) महिलाओं (72.89 फीसदी) की तुलना में तनिक ऊंची है.

इस पर्वतीय राज्य की आबादी में मुख्य रुप से खासी, जैंतिया और गारो समुदाय के लोग हैं. इनके बाद तादाद के लिहाज से कोच, राभा और बोडो समुदाय का नाम लिया जा सकता है.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक मेघालय की ज्यादातर आबादी ईसाई (74.59 प्रतिशत) है. इसके बाद हिंदू (11.53 प्रतिशत), मुस्लिम (4.40 प्रतिशत), बौद्ध (0.33 प्रतिशत), सिख (0.10 प्रतिशत) और जैन (0.02 प्रतिशत) धर्म मानने वालों का स्थान है.

राज्य में कुल ग्यारह जिले हैं: ईस्ट खासी हिल्स, वेस्ट खासी हिल्स, साऊथ वेस्ट खासी हिल्स, रि भोई, वेस्ट जैंतिया हिल्स, ईस्ट जैंतिया हिल्स, ईस्ट गारो हिल्स, वेस्ट गारो हिल्स, नार्थ गारो हिल्स, साऊथ वेस्ट गारो हिल्स और साऊथ गारो हिल्स जिला. मेघालय की आधिकारिक भाषाओं में खासी, पनार, गारो और अंग्रेजी का नाम शुमार है. साथ ही, कुछ क्षेत्रीय बोलियां कोच, बोडा, अबेंग, दुअल, यऊबोक, चिसाक मेगम भी प्रचलन में हैं.

मुकाबले के मुख्य किरदार

अपने 46 साल लंबे और डांवाडोल सियासी इतिहास में सूबे ने ग्यारह मुख्यमंत्री देखे हैं. इनमें छह मुख्यमंत्री कांग्रेस के रहे जिसमें सूबे के पहले मुख्यमंत्री विलियमसन ए संगमा ( मूल रुप से ऑल पार्टी हिल लीडर्स कांफ्रेंस के नेता लेकिन बाद में 1976-78 के दौरान मुख्यमंत्री के रुप में कांग्रेस में चले गए) और कांग्रेस की अगुवाई वाले मेघालय यूनाइडेट एलायंस सरकार में सत्तासीन मुख्यमंत्री मुकुल संगमा शामिल हैं.

इस साल के चुनाव में सभी पार्टियों के सामने एक अनोखी चुनौती है. मेघालय विधानसभा के लिए चुनाव इस साल के पहले के छह महीनों में किसी वक्त होंगे क्योंकि मौजूदा सरकार का कार्यकाल 6 मार्च को समाप्त हो रहा है.

भारतीय जनता पार्टी

फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत करते हुए नार्थ ईस्टर्न हिल्स यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर एच श्रीकांत ने कहा कि मेघालय की जनता बीजेपी को लेकर कोई बहुत उत्साह में नहीं है. उनका कहना था, 'ऐसा नहीं लगता कि बीजेपी की यहां बहुत ताकत है, हालांकि बीजेपी ऐसा दावा कर रही है.'

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वेस्ट गारो हिल्स जिले के अपने हाल के दौरे में बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने विश्वास जताया था कि मुकुल संगमा की अगुवाई वाली सूबे की सरकार को उखाड़ फेकेंगे. अमित शाह ने 6 जनवरी के दिन कहा कि 'टिकरिकिला जाते हुए ( जनसभा को संबोधित करने) मुझे विश्वास नहीं था लेकिन टिकरिकिला में लोगों का उत्साह और (मुकुल) संगमा सरकार के खिलाफ अवाम का गुस्सा देखकर मुझे यकीन हो गया है कि अगली सरकार बीजेपी की बनेगी.'

Amit Shah and Narendra Modi in Ahmedabad

इलाके में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए जारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक्ट ईस्ट पॉलिसी के सहारे भी बीजेपी मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रही है. हाल में केंद्र सरकार ने राज्य में धार्मिक और अध्यात्मिक गलियारा विकसित करने के लिए 70 करोड़ रुपए के टूरिज्म पैकेज की घोषणा की.

मेघालय की बाजी जीतना इसलिए भी कठिन साबित होगा क्योंकि यहां 60 फीसदी आबादी ईसाई है. चूंकि बीजेपी हिंदुत्व के आधार पर बने राष्ट्र की समर्थक है और बीफ खाने के बारे में उसके विचार बहुत बंधे-बंधाए हैं सो यहां मतदाताओं को समझा पाना बीजेपी के लिए कठिन साबित होगा.

कांग्रेस

देश में बाकी जगहों पर लगातार हार के बाद कांग्रेस के लिए मेघालय की चुनावी जंग जीतना बहुत अहम है. चूंकि बीते कई दशकों से कांग्रेस की सियासी मौजूदगी यहां मजबूत बनी हुई है सो कांग्रेस के लिए चुनावी बढ़त हासिल करने की गुंजाइश बनी हुई है.

बीते 8 जनवरी को एनसीपी के विधायक मार्थन संगमा और चार अन्य स्वतंत्र उम्मीदवारों- ब्रिगेडी माराक, असाहेल डी शीरा, माइकल संगमा तथा डेविड नोनगुरुम ने एलान किया कि वे विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस में शामिल होने जा रहे हैं. कांग्रेस के लिए यह एक तरह से नुकसान की भरपाई का मामला है क्योंकि चंद रोज पहले पांच विधायक पार्टी छोड़कर एनपीपी में शामिल हो गये थे. एनपीपी बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए में शामिल है. पांच विधायकों के एनपीपी में शामिल होने से सूबे की विधानसभा में कांग्रेस के विधायकों की संख्या घटकर 24 हो गई.

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इस वाकये के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मेघालय कांग्रेस इकाई के अध्यक्ष डीडी लेपांग को हटाकर उनकी जगह सेलेस्टिन लिंग्दोह को कमान थमाई. उन्होंने लिंग्दोह की देखरेख में पार्टी की प्रदेश चुनाव समिति का भी गठन किया.

India's main opposition Congress party's vice-president Rahul addresses his supporters before what the party calls as "Save Democracy" march to parliament in New Delhi

प्रोफेसर श्रीकांत का कहना है कि 'सूबे में कांग्रेस संकट में है, इसके कई सदस्य एनपीपी में शामिल होने के लिए पार्टी छोड़कर जा रहे है. खासी हिल्स में लोगों का रुझान अमूमन कांग्रेस की तरफ है. बहुत संभव है कि पूर्ण बहुमत ना मिल पाने की हालत में कांग्रेस के लिए गठबंधन बनाना जरुरी हो जाए.'

प्रोफेसर श्रीकांत ने ध्यान दिलाया कि मेघालय में पार्टियां उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितने कि पार्टी से जुड़े लोग. उनका कहना है- 'पूर्वोत्तर में पार्टियां मायने नहीं रखतीं. लोग एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाते-आते रहते हैं और महत्व लोगों का ही है. मेघालय में मजबूत पकड़ वाली एकमात्र पार्टी कांग्रेस है.'

यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी

क्षेत्रीय पार्टियों में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी (यूडीपी) का पूर्वोत्तर के राज्य में मजबूत जनाधार है. कांग्रेस और एनसीपी के बाद मेघालय में यह तीसरी बड़ी पार्टी है. अगामी चुनाव के लिए यूडीपी ने हिल स्टेट पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी(एचएसपीडीपी) और गारो नेशनल काउंसिल (जीएनसी) के साथ गठबंधन बनाया है.

यूडीपी राज्य में राष्ट्रीय दलों की सरकार बनाने के खिलाफ है. उसका ख्याल है कि ‘सांप्रदायिक’ बीजेपी और ‘कैंसर सरीखी कांग्रेस’ को राज्य में सरकार नहीं बनाने देना चाहिए.

नेशनल पीपुल्स पार्टी

ऊपर जिन पार्टियों का जिक्र किया गया है उनके अलावे बीते कुछ सालों में एनपीपी जनाधार बनाने वाली एक अहम पार्टी बनकर उभरी है. पार्टी के प्रमुख कोनार्ड के संगमा ने अगामी चुनाव जीतने और मेघालय में कायम कांग्रेस की सरकार को हटाने का भरोसा जताया है. उन्होंने पार्टी के उम्मीदवार स्नाइवाभालांग धर की एक जनसभा में 9 जनवरी को कहा कि 'एपीपी 2018 के चुनाव में सबसे बड़ी नहीं बल्कि बहुमत हासिल करने वाली पार्टी बनकर उभरेगी.' पार्टी की फिलहाल मेघालय विधानसभा में दो सीटें हैं.

आम आदमी पार्टी

आम आदमी पार्टी ने मेघालय की 35 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है. पार्टी का दावा है कि 'हमारे जीतने 'के बेहतर आसार हैं. हमलोग आम आदमी हैं और हम आम लोगों को ही उम्मीदवार बनाएंगे. हमारी साथ कुछ रिटायर्ड अधिकारी तथा कुछ बुद्धिजीवी हैं और ये चुनाव लड़ना चाहते है और हम चाहेंगे कि हमारे उम्मीदवार आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ें.'

आम आदमी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वन्श्वा नोंग्दू ने शिलांग में यह बात पत्रकारों से कही. आम आदमी पार्टी के जीतने की संभावनाएं बहुत कम हैं क्योंकि इलाके में कांग्रेस को छोड़कर बाकी राष्ट्रीय पार्टियों से ज्यादा जनाधार क्षेत्रीय पार्टियों का है.

ऊपर जिन पार्टियों का जिक्र आया है उनमें से किसी ने भी अभी तक मुख्यमंत्री पद के लिए अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं की है.

साल 2000 तक का चुनावी इतिहास

1972: राज्य में विधानसभा के लिए हुए पहले चुनाव में केवल चार दल (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, कांग्रेस, ऑल पार्टी हिल लीडर्स कांफ्रेंस तथा निर्दलीय) चुनावी मुकाबले में थे. इनमें से तीन दलों (कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर) ने मिलकर सरकार बनायी. ऑल पार्टी हिल लीडर्स कांफ्रेंस को बहुमत (32 सीट) हासिल हुआ. विलियम्सन ए. संगमा मुख्यमंत्री बने.

1978: इस साल एचएसपीडीपी विधानसभा में पहुंची (कुल 14 सीटें) और एपीएचएलसी की सीटें पहले चुनाव की तुलना में घटकर 16 रह गईं. कांग्रेस का जनाधार बढ़ा और उसने 20 सीटें जीतीं.

1983: विधानसभा के लिए हुए पहले चुनाव के 10 साल से भी ज्यादा वक्त गुजरने के बाद कांग्रेस ने अपनी स्थिति और मजबूत की. उसे सूबे में 1983 में 25 सीटों पर जीत हासिल हुई.

1988: इस साल चुनावी मुकाबले में सात दलों ने हिस्सा लिया. कांग्रेस 32.65 वोट शेयर के साथ विजयी रही. अभी तक बीजेपी ने चुनावी मुकाबले में हिस्सा नहीं लिया था.

1993: बीजेपी ने सूबे में पहली बार 1993 में चुनाव लड़ा लेकिन उसे एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई. 1990 के दशक के आते-आते मेघालय में क्षेत्रीय दलों की संख्या भी बढ़ी, एचएसपीडीपी, एपीएचएलसी, हिल पीपुल यूनियन और मेघालय प्रोग्रेसिव पीपुल्स पार्टी विधानसभा में पहुंचे.

1998: इस साल के चुनाव में कांग्रेस को 25 सीटें हासिल हुईं और वह बहुमत में रही. यूडीपी को 20 सीटें मिली थीं. गारो नेशनल काउंसिल इस साल पहली बार एक सीट जीतकर सूबे की विधानसभा में पहुंची.

Labourers work at a coal stockyard in East Jaintia Hills in Meghalaya, India, September 16, 2015. A senior Indian politician has been lobbying New Delhi to lift a ban on dangerous, small-scale coal mining operations in his state, without disclosing that his wife owns several mines there, according to documents seen by Reuters. So-called "rat-hole" mining practised in Meghalaya state killed thousands of workers, including children, before the ban was imposed in April last year. At its peak the state produced coal worth $4 billion a year, or about a tenth of India's total production, nearly all from this form of small-scale mining. Picture taken September 16, 2015. REUTERS/Krishna N. Das - GF20000035968

बीते वक्त में पार्टियों के वोट-शेयर

बीते दो विधानसभा में पार्टियों को मिले वोट से संबंधित चुनाव आयोग के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2008 तथा 2013 में कांग्रेस वोट-शेयर के मामले में सबसे आगे रही.

साल 2008 में कांग्रेस को सूबे की विधानसभा की 25 सीटों पर जीत मिली. एनसीपी 15 सीटों के साथ दूसरे नंबर की पार्टी रही. 2013 के चुनाव में भी कांग्रेस की सीटें बढ़ीं और उसे 29 सीटें मिली लेकिन इस बार 13 सीटों पर निर्दलीय जीते और निर्दलीय उम्मीदवारों का चुनावी रुतबा बढ़ा.

इन दोनों चुनावों को एक साथ मिलाकर देखें तो बीजेपी को एक ही सीट नसीब हुई, यह सीट उसे 2008 में मिली थी.

दोनों ही चुनावों में वोट-शेयर के मामले में कांग्रेस आगे रही. साल 2008 में कांग्रेस को कुल 3,62,617 वोट मिले और इस तरह पार्टी ने 32.9 प्रतिशत का वोटशेयर हासिल किया. एनसीपी 20.76 के वोटशेयर के साथ दूसरे नंबर पर रही. बीजेपी को मात्र 2.76 प्रतिशत मत मिले जबकि यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी (यूडीपी) का वोटशेयर 18.37 प्रतिशत रहा.

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साल 2013 में कांग्रेस का वोटशेयर बढ़कर 34.78 प्रतिशत पर पहुंच गया. यूडीपी का वोटशेयर 17.11 प्रतिशत रहा. सबसे ज्यादा गिरावट एनसीपी के वोटशेयर में आयी. एनसीपी का वोटशेयर गिरकर 1.84 प्रतिशत पर पहुंच गया. क्षेत्रीय पार्टी के रुप में एनपीपी ने 8.81 प्रतिशत वोटशेयर हासिल किया.

मेघालय में मुख्य मुद्दे

1. बेरोजगारी

साल 2014 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण(एनजीटी) ने सूबे में कोयले के खनन पर रोक लगायी थी. ऐसे में जीविका के लिए कोयले के खनन पर निर्भर 1.5 लाख परिवारों की जिंदगी दुभर हो गई. सूबे में निम्न आयवर्ग के ज्यादातर परिवार कोयला खदानों में काम करते थे. रोक का असर अब भी देखा जा सकता है.

प्रोफेसर श्रीकांत ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि 'रोक के कारण कोयला खनन में लगे लोगों की जिंदगी पर बड़ा बुरा असर पड़ा. इस उद्योग से जो पैसे तीन-चार साल पहले आया करते थे वे अब हासिल नहीं.' इसके अलावे, मेघालय में रोजगार के अवसर भी बहुत सीमित हैं क्योंकि औद्योगिक गतिविधि के विकल्प के तौर पर रोजगार का कोई और अवसर मौजूद नहीं.

प्रोफेसर श्रीकांत के मुताबिक 'राज्य में आंतरिक संसाधनों का विकास के लिए उपयोग ना के बराबर हुआ है. सूबे में औद्योगिक गतिविधि बहुत कम है. हाल के वक्त में, सरकार बागवानी को जीविका के वैकल्पिक स्रोत के रुप में विकसित करने के प्रयास कर रही है. पूर्वोत्तर के राज्य केंद्र सरकार से मिलने वाली सहायता राशि पर ज्यादा निर्भर हैं, राज्यों में राजस्व की उगाही बहुत कम होती है.'

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2. नशे की लत

मेघालय विधानसभा ने 2016 के सितंबर में चिंता के स्वर में कहा कि राज्य में मादक द्रव्यों खासकर हिरोइन का चलन बढ़ रहा है. विधानसभा में कहा गया कि सूबे में हिराइन का उपभोग देश में सबसे ज्यादा है. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में मेघालय पंजाब से भी आगे निकल गया है.

सूबे के गृहमंत्री एचडीआर लिंग्दोह ने कहा कि राज्य की पुलिस और अन्य एजेंसियां मामले की जांच कर रही हैं और 2013 से 2016 के बीच हिरोइन, गांजा, कफ सीरप, नींद की दवाइयां तथा अन्य चीजों समेत कई तरह के मादक द्रव्यों को जब्त करने में कामयाबी मिली है. लिंग्दोह का कहना था कि म्यांमार के रास्ते नशे की चीजें मेघालय में आसानी से पहुंच रही है. म्यांमार अवैध अफीम के उत्पादन में दुनिया में दूसरे नंबर पर है.

3. विद्रोह

मेघालय में 1980 के दशक में विद्रोह की भावना ने जड़ जमाया. इसकी शुरुआत के आंदोलन के रुप में हुई. आंदोलन दखर (बाहरी) लोगों के बढ़ते सामाजिक-आर्थिक तथा सियासी दबदबे के खिलाफ था. शुरुआत में कई उग्रवादी समूह उठ खड़े हुए जैसे कि हेनीव्ट्रेप अचिक लिबरेशन काउंसिल (एचएएलसी), हेनिव्ट्रेप नेशनल लिबरेशन काउंसिल (एचएनएलसी), अचिक मातग्रिक लिबरेशन आर्मी (एएमएलए) और अचिक नेशनल वालंटियर्स काउंसिल(एएनवीसी) लेकिन इनकी पकड़ बाद में कमजोर पड़ गई.

साल 2009 में गारो नेशनल लिबरेशन आर्मी का गठन हुआ. गठन का मुख्य मकसद मेघालय के पश्चिमी हिस्से में अलग गारोलैंड कायम करना था. बीते कुछ महीनों में जनजातीय लोगों के लिए अलग राज्य बनाने की मांग ने जोर पकड़ा है. 2014 के 18 मार्च को मेघालय विधानसभा ने सूबे के पश्चिमी हिस्से के गारो हिल्स में अलग गारोलैंड बनाने का प्रस्ताव नकार दिया.

बीते कुछ सालों में सूबे में विद्रोही गतिविधियों में कमी आई है लेकिन विद्रोही तेवर के खतरे अभी बने हुए हैं. रोजमर्रा के बंद के आह्वान से कामकाज में बाधा पहुंचती है. साऊथ एशिया टेरररिज्म पोर्टल (एसएटीपी) के मुताबिक विद्रोहियों की गतिविधियों के कारण होने वाली आकस्मिक घटनाओं में 2015 की तुलना में 2016 में सूबे में 57 फीसद की कमी आई.

राज्य में विद्रोह और गैर-कानूनी गतिविधियों की बड़ी वजहों में एक यह भी है कि बांग्लादेश से मेघालय की लगती सीमा पर निगरानी कम है, सूबे में जनजातीय भावनाओं का सख्त उभार है और स्वायत्त जिला परिषद कारगर तरीके से काम नहीं कर रहे. ये कारण इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस की रिपोर्ट में गिनाए गए हैं.

प्रोफेसर श्रीकांत का कहना है कि 'पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की तुलना में मेघालय में कांग्रेस के शासन के दौरान विद्रोही गतिविधियों पर पर्याप्त अंकुश लगाने में कामयाबी मिली है.'

उन्होंने एचएनएलसी का उदाहरण दिया जिसका खासी और जैंतिया हिल्स में दबदबा था लेकिन प्रोफेसर श्रीकांत के मुताबिक 'एचएनएलसी का असर विकास के कामों के कारण बहुत हद तक मंद पड़ गया है. लेकिन गारो हिल्स में सूरत-ए-हाल ऐसे नहीं. यह इलाका बहुत अविकसित है और इलाके में उग्रवाद के सर उठाने का खतरा बरकरार है.'

उन्होंने यह भी कहा कि बीते कुछ सालों में शिलांग में हालात कमोबेश शांतिपूर्ण रहे हैं और स्वतंत्रता दिवस तथा गणतंत्र दिवस के अवसर पर कोई रोक नहीं लगी है.

4. विकास

शहरी क्षेत्र की तुलना में मेघालय के ग्रामीण अंचल में बुनियादी ढांचा बहुत लचर हालत में है. चिकित्सा सुविधा का अभाव है, सड़के ऐसी नहीं कि उनके ऊपर वाहन चलाया जा सके, आवाजाही के साधन कम है. इन कारणों से लोगों का सूबे में जीवन-यापन करना कठिन है. नार्थ ईस्ट टुडे में छपी रिपोर्ट के मुताबिक अगर सड़क बनाने के लिए कोई रास्ता तैयार किया जाता है तो भी ज्यादातर खुदाई भर का काम होता है, काम कभी भी पूरा नहीं हो पाता. हाल में नार्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस के अध्यक्ष हेमंत बिस्वा शर्मा ने मुकुल संगमा की सरकार पर सूबे को पिछड़ेपन की दशा में रखने का आरोप लगाया.

प्रोफेसर श्रीकांत का कहना है कि 'मेघालय के खासी हिल्स की तुलना में गारो हिल्स में विकास बहुत कम हुआ है. यह क्षेत्र दूर-दराज के इलाकों से सड़क के जरिए ठीक से जुड़ नहीं पाया है.'

यूएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक मेघालय में अन्य राज्यों की तुलना में सड़कों की मौजूदगी बहुत कम है. सड़कों का घनत्व पूर्वोत्तर के राज्यों में सबसे ज्यादा कम मेघालय में ही है.

राज्य की विकास-प्रक्रिया की एक बड़ी बाधा गरीबी है. योजना आयोग के रिपोर्ट के मुताबिक मेघालय की 11.9 फीसद आबादी गरीबी-रेखा के नीचे है. सूबे के ग्रामीण अंचल में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की तादाद 12.53 प्रतिशत है जबकि शहरी क्षेत्र के लिए यह आंकड़ा 9.26 प्रतिशत का है.

5. स्वास्थ्य सुविधा

हाल के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 के मुताबिक मेघालय में शिशु मृत्यु दर 30 है जबकि राष्ट्रीय औसत 41 शिशुओं का है. पांच वर्ष की आयु-सीमा तक के बच्चों की मृत्यु दर 40 है. केवल 21.8 प्रतिशत घरों में खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन (जैसे रसोई गैस) का इस्तेमाल होता है. बाकी परिवारों में खाना पकाने के लिए लकड़ी और कोयले का इस्तेमाल हता है. इस बार जो पार्टी सूबे में सरकार बनाएगी उसे सरकारी चिकित्सा सेवा की दशा और नीतियों का फिर से मूल्यांकन करना होगा.

मेघालय में फरवरी महीने में चुनाव होने की संभावना है.

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