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यूपी चुनाव 2017: दलितों की देवी मायावती की संघर्षगाथा

मायावती का राजनीतिक उभार भारतीय समाज में सामाजिक न्याय का उभार है जिसने दलितों को सम्मान और सुरक्षा दी

Updated On: Nov 17, 2016 07:30 PM IST

Krishna Kant

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यूपी चुनाव 2017: दलितों की देवी मायावती की संघर्षगाथा

छोटेलाल दलित हैं.  कुछ साल पहले वो दबंगों के खेत में काम करते थे और गालियां सुनते थे.

ये उनकी मजबूरी थी. गाली और डांट सुनने से इनकार का मतलब था पिटाई और बेरोजगारी.

पर छोटेलाल बदला उसके तेवर भी बदले. साल 2003-04 की बात है.

एक बाबू साहेब ने छोटेलाल के खेत का पानी अपने खेत में उतार लिया. छोटेलाल ने मना किया तो बाबू साहेब ने गाली दे दी.

छोटे लाल ने भी बदले में गाली दी और कुदाल उठाकर बाबू साहेब को दौड़ा लिया.यह लगभग चमत्कार था.

छोटेलाल को यह आत्मविश्वास यूं ही नहीं आ गया था. यूपी में दलितों के इस आत्मविश्वास के पीछे मायावती हैं.

यह घटना मेरे सामने की है. उस समय तक मायावती दो बार मुख्यमंत्री रह चुकी थीं और राज्य में हरिजन एक्ट लागू हो चुका था.

अब किसी दलित को लाठी के जोर से हांककर बेगार कराना संभव नहीं था.

भारतीय राजनीति में मायावती का उभार एक ऐतिहासिक घटना है.

इससे दलितों को ताकत, सम्मान और सुरक्षा मिली. मायावती का राजनीतिक उभार भारतीय समाज में सामाजिक न्याय का उभार है.

मायावती का राजनीतिक जीवन रहस्यों और किस्से-कहानियों से भरा है.

एक तरफ वे दलितों की मसीहा हैं तो विरोधियों की नजर में भ्रष्टाचारी और तानाशाह हैं.

हालांकि, उनके बेहतर और सख्त प्रशासन का लोहा विरोधी भी मानते हैं.

मायावती का राजनीतिक जीवन जैसे-जैसे आगे बढ़ा, उत्तर प्रदेश में दलितों की आवाज भी उतनी ही मजबूत हुई.

उनकी निजी उपलब्धियों को पूरा दलित समाज अपनी उपलब्धि मानता है. यह वो तबका है जो भारत की राजनीति को बदल देने का माद्दा रखता है.

मायावती के आने के बाद भारतीय समाज में एक व्यापक राजनीतिक-सामाजिक और आर्थिक बदलाव की शुरुआत हुई.

कांशीराम की संगत

मायावती 15 जनवरी, 1956 में दिल्ली के एक दलित परिवार में पैदा हुईं.

उनका बचपन किसी सामान्य मध्यवर्गीय बच्चे जैसा ही रहा. मायावती का गांव बादलपुर है जो गौतमबुद्ध नगर जिले में है.

उनके पिता प्रभु दयाल भारतीय डाक विभाग के क्लर्क थे. उनकी मां रामरती एक सामान्य अनपढ़ महिला थीं.

मायावती ने बीए, बीएड करने के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी की.

अपने कैरियर की शुरुआत उन्होंने एक स्कूल टीचर के रूप में की. वे सिविल सर्विसेस की तैयारी भी करती थीं.

1977 में मायावती, दलित नेता कांशीराम के संपर्क में आईं. तब कांशीराम दिल्ली में रहकर अपने दलित आंदोलन के मिशन को आगे बढ़ा रहे थे.

कांशीराम मायावती से बहुत प्रभावित हुए. उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया. मायावती ने कांशीराम के आंदोलन में धार देनी शुरू की.

मायावती को दलित आंदोलन की समझ बाबा साहेब से मिली. अंबेडकर से उनका परिचय उनके पिता ने कराया था.

अंबेडकर की जीवनी और उनसे जुड़ी किताबें पढ़कर उन्होंने दलित समाज के बारे में जाना.

मायावती ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, 'मैं आठवीं में पढ़ती थी. एक दिन पिताजी से पूछा कि अगर मैं भी डॉ. अंबेडकर जैसे काम करूं तो क्या मेरी भी पुण्यतिथि बाबा साहब की तरह ही मनाएंगे?'

कांशीराम से उनके संपर्क का किस्सा भी दिलचस्प है. सितंबर, 1977 में सत्ताधारी जनता पार्टी ने जात-पांत के खिलाफ कांस्टिट्यूशन क्लब में एक कार्यक्रम रखा.

मुख्य वक्ताओं में केंद्रीय मंत्री राजनारायण भी थे. वे 1977 के चुनावों में इंदिरा गांधी को हराकर चर्चा में आए थे.

अपने भाषण में उन्होंने दलितों को बार-बार 'हरिजन' कहकर संबोधित किया. मायावती को बोलने का मौका मिला तो उन्होंने राजनारायण और उनकी पार्टी पर तीखा हमला बोला.

माया ने कहा, हरिजन शब्द का इस्तेमाल करके राजनारायण जैसे लोग दलितों को अपमानित करते हैं.

उनका कहना था कि बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान में हरिजन नहीं, बल्कि दलितों के लिए अनुसूचित जाति का इस्तेमाल किया है.

मायावती के भाषण के दौरान जनता पार्टी और राजनारायण के खिलाफ नारे लगे.

यह बात कांशीराम को पता चली तो वे रात में ही मायावती से मिलने पहुंचे. उस वक्त मायावती का परिवार सोने की तैयारी में था.

उस रात कांशीराम से हुई मुलाकात ने मायावती की जिंदगी बदल दी.

मायावती के पिता नहीं चाहते थे कि वे राजनीति में जाएं. इस विरोध को देखते हुए उन्होंने घर छोड़ दिया.

मायावती के भाई-बहनों में से उनके बड़े भाई ने उनका साथ दिया. लेकिन परिवार राजनीति में उनके साथ नहीं आया.

पहले वे कमरा लेकर कांशीराम के पड़ोस में रहीं. बाद में उनके साथ ही रहने लगीं. मायावती और कांशीराम के रिश्ते को लेकर तमाम तरह की कहानियां हैं.

मायावती के जीवन पर आधारित किताब 'बहनजी' में अजय बोस लिखते हैं, 'कांशीराम और मायावती के बीच एक निजी भावनात्मक संबंध था.'

उनके करीबी रहे लोग भी इसकी पुष्टि करते हैं. अक्सर उनके झगड़ों की तीव्रता भी उनके इस भावनात्मक संबंध को रेखांकित कर देती थी.'

बोस लिखते हैं, 'पुराने सहयोगियों के मुताबिक ये झगड़ा कई बार तो इतना तेज होता था कि उनके आस-पास मौजूद लोग घबरा जाते थे.'

मायावती कांशीराम को लेकर किसी भी चीज से ज्यादा अधिकार की भावना रखती थीं.

कांशीराम के बेहद करीबी लोगों से उन्हें खतरा महसूस होता था.

कई ऐसे लोग हैं जिन्हें कांशीराम पार्टी में लाए और जिन्हें मायावती के कारण असमय ही पार्टी छोड़नी पड़ी.'

मायावती उन बिरले नेताओं में से हैं जो पारिवारिक मोह से दूर हैं. उन्होंने अपने परिवार में पद और पैसे की बंदरबांट नहीं की.

प्रिंसपल को थप्पड़

स्कूल में अध्यापन करते हुए मायावती के तेवर बेहद आक्रामक थे.

दिल्ली के त्रिलोकपुरी में नगर निगम प्राइमरी स्कूल में वह मैडम माया के नाम से मशहूर थीं.

एक बार शिक्षकों का ग्रेड पे बढ़ाने के लिए 44 दिनों तक हड़ताल चली जिसमें उन्होंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया.

इस पर कार्रवाई करते हुए प्रशासन ने निलंबन का आदेश जारी किया, जिसमें पहला निलंबन मायावती का ही हुआ था.

उनके बारे में मशहूर है कि एक बार उनके सहकर्मी को प्रिंसपल ने जातिसूचक शब्द कह दिए. इससे गुस्सा होकर उन्होंने प्रिंसिपल को ही थप्पड़ जड़ दिया था.

मायावती का असली नाम चंद्रावती था. उनकी पढ़ाई-लिखाई इसी नाम से हुई थी. राजनीति में सक्रिय होने के बाद कांशीराम ने उनका नाम मायावती रख दिया.

उनकी आत्मकथा 'मेरा संघर्षमय जीवन एवं बहुजन समाज मूवमेंट का सफरनामा' उनके बारे में काफी कुछ कहती है. वे लिखती हैं, 'मेरे विचार और लक्ष्य समझते हुए कांशीराम जी ने मुझे समझाया कि 'तुम्हारे अंदर कलक्टर बनने की काबिलियत है और नेता बनने की भी, लेकिन यदि तुम नेता बनीं तो ऐसे कई कलक्टर तुम्हारे पीछे फाइलें लिए खड़े रहेंगे. उनकी मदद से तुम दबे-कुचले शोषित समाज का अधिक उत्थान कर सकती हो.'

यहां से मायावती की राजनीतिक यात्रा शुरू हुई तो तमाम संघर्ष और मेहनत वे आगे बढ़ती गईं.

सियासत का सफर

मायावती पहले 1978 में बामसेफ में सक्रिय हुईं. इसके बाद 1981 में डीएस फोर की स्थापना हुई जिसमें उन्होंने अहम भूमिका निभाई.

कांशीराम के नेतृत्व में जब यह दलित आंदोलन शुरू हुआ था तब किसी को अंदाजा नहीं था कि दलित आंदोलन का कोई भविष्य है. कांशीराम और मायावती के कड़े संघर्ष ने दलित आंदोलन को ऐतिहासिक मुकाम पर पहुंचाया.

1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना हुई. यहां से मायावती का सक्रिय राजनीति का सफर शुरू हुआ.

कांशीराम के संरक्षण में 1984 में जब बहुजन समाज पार्टी की स्थापना हुई तो मायावती कांशीराम की कोर टीम का हिस्सा थीं.

मायावती ने मुजफ्फरनगर के कैराना लोकसभा सीट से अपना पहला चुनाव लड़ा. इसके बाद उन्होंने 1985 में बिजनौर तथा 1987 में हरिद्वार से चुनाव लड़ा, जिसमें वे हार गईं.

1989 में वे पहली बार बिजनौर लोकसभा सीट से चुनाव जीतीं. 1989 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने 13 सीटों पर जीत हासिल की.

1994 में मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुनी गईं. 1995 में उन्हें बहुजन समाज पार्टी का प्रमुख बनाया गया.

3 जून 1995 को मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और उन्होंने 18 अक्टूबर 1995 तक पद संभाला.

देश में यह पहली बार था जब कोई दलित महिला मुख्यमंत्री बनी थी. वे उत्तर प्रदेश के इतिहास में सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री भी थीं.

बतौर मुख्यमंत्री दूसरा कार्यकाल 21 मार्च 1997 से 21 सितंबर 1997 तक रहा. 2001 में कांशीराम ने मायावती को पार्टी अध्यक्ष के रूप में अपना उत्तराधिकारी घोषित किया.

2002-2003 के दौरान भाजपा के साथ गठबंधन सरकार में मायावती फिर से मुख्यमंत्री बनीं. तीसरा कार्यकाल 3 मई 2002 से 29 अगस्त 2003 तक रहा. हालांकि भाजपा ने सरकार से अपना समर्थन वापिस ले लिया और सरकार गिर गई.

2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई. चौथी बार 13 मई 2007 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद संभाला.

इस बार उन्होंने पूरे पांच साल तक सरकार चलाई. इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा चुनाव हार गई और समाजवादी पार्टी की सरकार बनी.

सपाइयों का हमला

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2 जून 1995 एक काला दिन था. दरअसल, 1993 में चुनाव में सपा-बसपा में गठबंधन हुआ. चुनाव में गठबंधन जीत गया और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने.

लेकिन आपसी मतभेदों के चलते 2 जून, 1995 को बसपा ने समर्थन वापस ले लिया और मुलायम सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई.

इसी दिन लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में सपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मायावती और उनके विधायकों पर हमला कर दिया. बताया जाता है कि कुछ गुंडों ने मायावती को कमरे में बंद करके मारा और उनके कपड़े फाड़ दिए.

अपनी जान जोखिम में डाल कर भाजपा विधायक ब्रम्हदत्त द्विवेदी ने मायावती को बचाया था. मायावती पूरे जीवन उनका एहसान मानती रहींं और कभी उनके खिलाफ अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं किया.

प्रतीकों की राजनीति और सोशल इंजीनियरिंग

मायावती ने मुख्यमंत्री रहते हुए राज्य के प्रशासन से ज्यादा दलितों के प्रतीकात्मक उत्थान को लेकर सजग रहीं. उन्होंने दलित नायकों और बौद्ध धर्म के सम्मान में कई स्मारक स्थापित किए.

गौतम बुद्ध, बाबा साहेब आंबेडकर, कांशीराम आदि की मूर्तियां लगवाईं. यहां तक की साथ में अपनी भी मूर्ति लगवाने से उन्होंने गुरेज नहीं किया. इसे लेकर उन्हें विरोधियों की खासी आलोचना भी झेलनी पड़ी.

समाज में दलितों की स्थिति को लेकर काफी गुस्से में रहने वाली मायावती ने तमाम ऐसे प्रयास किए जिससे दलित समाज को सम्मान और आर्थिक सुरक्षा हासिल हो सके. हालांकि, अब भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है.

मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने बहुजन नायकों और बहुजन हितों पर खासी तवज्जो दी. आंबेडकर ग्राम योजना लाकर अनुसूचित जातियों को मजबूत बनाने की पहल की.

थानों में दलित अधिकारियों की नियुक्ति बढ़ाकर दलित उत्पीड़न पर रोक लगाने जैसा महत्वपूर्ण काम मायावती के खाते में हमेशा के लिए दर्ज हो चुका है.

दलितों के बीच निश्चित कैडर होने के बाद भी मायावती दो बार पूर्ण बहुमत नहीं प्राप्त कर सकीं. सतीशचंद्र मिश्रा के नेतृत्व में 2007 में उन्होंने ब्राह्मणों और सवर्णों को अपने साथ मिलाया और पूर्ण बहुमत हासिल किया.

कभी उनका नारा था 'तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार.' राजनीतिक पंडितों को हैरत में डालते हुए मायावती ने 'तिलक, तराजू और तलवार' को जूते मारने की जगह उन्हें विधानसभा की कुर्सियां सौंप दीं. इस सरकार में 42 ब्राह्मण उम्मीदवार जीतकर विधानसभा पहुंचे थे.

सोशल इंजीनियरिंग का उनका यह प्रयोग अनूठा था, जिसने तमाम राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया. मायावती की तमाम उपलब्धियों के चलते वे भारतीय राजनीति ताकतवर महिलाओं में शुमार की जाती हैं.

सत्ता में पहुंचने के बाद मायावती ने उत्तर प्रदेश के कई माफियाओं पर कार्रवार्इ करते हुए उन्हें जेल भिजवा दिया. सपा सरकार की छवि जहां गुंडाराज के लिए कुख्यात है, वहीं मायावती के सख्त प्रशासन के लिए विपक्षी भी उनकी तारीफ करते हैं.

आलोचकों के तीखे तीर

मायावती की आलोचना भी कम नहीं होती. उनकी छवि एक तानाशाह प्रशासक की है, जो किसी की बात नहीं सुनतीं.

उनकी पार्टी में उनके अलावा कोई दूसरा नेता नहीं है. निर्णय लेने वाली वे पहली और आखिरी नेता हैं. पार्टी में जो भी है, वह सिर्फ उनके सहयोगी के रूप में ही रह सकता है.

कांशीराम के नेतृत्व में उन्होंने कांग्रेस और बीजेपी/जनसंघ के विरोध में राजनीतिक की शुरुआत की, लेकिन जब सत्ता में पहुंचने की बारी आई तो उन्होंने हिंदूवादियों से भी हाथ मिलाया.

वे मूलत: ब्राह्मण और सवर्ण विरोध की राजनीति के जरिये अपने शिखर पर पहुंचीं, लेकिन भाजपा-कांग्रेस से हाथ मिलाने में कभी गुरेज नहीं किया. मायावती अकेली ऐसी नेता हैं, जिन्होंने 2008-2009 के लिए करीब पंद्रह करोड़ का एडवांस टैक्स चुकाया.

यह किसी नेता द्वारा चुकाया गया सबसे ज्यादा टैक्स की रकम थी. उनका कहना है कि उनके पास ज्यादातर ऐसी संपत्तियां हैं जो उनके समर्थकों ने उन्हें तोहफे में या आर्थिक सहयोग के लिए दी हैं.

हालांकि, उनपर आय से अधिक संपत्ति, भ्रष्टाचार, महंगा बंगला और उनका ठाट-बाट हमेशा चर्चा में रहा है. उनपर भ्रष्टाचार के कई मुकदमें भी चल रहे हैं.

मायावती के बारे में मशहूर है कि उनका कब क्या रुख होगा, यह पूरी तरह से अप्रत्याशित होता है. वह मीडिया से दूर रहती हैं और अपने हिसाब से ही बयान जारी करती हैं. वे कभी बाकी पार्टियों की तरह अभियान नहीं चलातीं, न ही आक्रामक प्रचार करती हैं.

उनकी पार्टी में या उनकी सरकार में अनुशासनहीनता से बड़ा दूसरा गुनाह नहीं होता. उत्तर प्रदेश में एक मजबूत विकल्प बनने के बाद मायावती का यूपी से बाहर कोई खास जनाधार नहीं बन पाया.

जानकार मानते हैं कि चूंकि मायावती अपने अलावा किसी दूसरे नेता पर भरोसा नहीं करतीं इसलिए दूसरे प्रदेशों में उनकी पार्टी कोई नेतृत्व विकसित नहीं कर सकी. वन मैन आर्मी जैसी पार्टी चलाने के कारण उनकी पार्टी सिर्फ यूपी में ही सिमटी है.

विवादों से उनका गहरा रिश्ता है, लेकिन उनके समर्थक मानते हैं कि मायावती चूंकि दलित समुदाय की नेता हैं, इसलिए मीडिया उनके प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त होता है.

विश्लेषकों की नजर में मायावती

अन्य नेताओं की तरह मायावती का भी पक्ष-विपक्ष दोनों मौजूद है. लेकिन समाजशास्त्रियों की नजर में वे दलित शक्ति की प्रतीक हैं. चिंतक कंवल भारती मानते हैं कि 'मायावती ने सवर्ण वर्चस्व तोड़कर दलितों को सिर उठाकर चलना सिखाया.'

प्रो. विवेक कुमार अपने एक लेख में लिखते हैं, ‘यह विडंबना है कि लोग आज मायावती के गहने देखते हैं, उनका लंबा संघर्ष और एक-एक कार्यकर्ता तक जाने की मेहनत नहीं देखते. वे यह जानना ही नहीं चाहते कि संगठन खड़ा करने के लिए मायावती कितना पैदल चलीं, कितने दिन-रात उन्होंने दलित बस्तियों में काटे. मीडिया इस तथ्य से आंखें मूंदे है. जाति और मजहब की बेड़ियां तोड़ते हुए मायावती ने अपनी पकड़ समाज के हर वर्ग में बनाई है.'

दलितों की देवी की छवि वाली मायावती की तारीफ और आलोचना हो सकती है, लेकिन सामाजिक न्याय और दलितों के सशक्तीकरण में उनके ऐतिहासिक योगदान को नकारा नहीं जा सकता.

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