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राजनीति की ‘माया’ जो जानती है बिना लड़े सियासी जंग जीतना

एसपी और बीएसपी के बीच 25 साल पुरानी अदावत अब दावत में बदल गई है क्योकि कांशीराम के दौर से निकल कर मायावती के दौर की बीएसपी रिश्तों के इंजीनियरिंग के साथ सामने है

Updated On: Mar 15, 2018 07:37 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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राजनीति की ‘माया’ जो जानती है बिना लड़े सियासी जंग जीतना

गोरखपुर और फूलपुर के चुनावी नतीजों ने बीएसपी सुप्रीमो मायावती के राजनीतिक एकांत में संगीत भर दिया है. जो खामोशी राज्यसभा से इस्तीफा देने के बाद बनी थी वो अब जीत की रणभेरी में बदल गई. वफादारों के पार्टी छोड़कर जाने और हार के सिलसिलों से पसरा सन्नाटा अब बधाई संदेशों की गूंज में तब्दील हो गया है. क्योंकि दलितों की देवी कहलाने वाली राजनीति की माया यानी मायावती ने बिना लड़े ही सियासत की जंग जीत ली है.

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कहां तो राज्यसभा से उनके इस्तीफे के बाद उनके राजनीतिक वनवास के कयास लगने शुरू हो गए थे और कहां उन्होंने यूपी की सियासत में सत्ताधारी पार्टी का सिंहासन हिला दिया.

राजनीति का चरित्र ही यही होता है कि यहां दोस्ती और दुश्मनी अस्थाई होती है. तभी एसपी और बीएसपी के बीच 25 साल पुरानी अदावत अब दावत में बदल गई है. मुलायम-कांशीराम के दौर से निकल कर अब मायावती के दौर की बीएसपी रिश्तों के इंजीनियरिंग के साथ सामने है. बीजेपी के विजयी रथ को मायावती ने उसी तरह रोकने का काम किया जिस तरह साल 1993 में मुलायम सिंह और कांशीराम ने साथ आ कर राम लहर को रोका था.

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ये इत्तेफाक है कि 25 साल पहले एसपी और बीएसपी जब आपस में अलग हुए तो यूपी की राजनीति में बीएसपी को सत्ता तक पहुंचने का मौका मिला. लेकिन इस बार जब दोनों एक हुए तो उन्हें सत्ताधारी पार्टी को पछाड़कर राज्य की सियासत में वापसी का मौका मिला.

इस जीत का श्रेय मायावती की उस हामी को जाता है जो उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ सियासी तालमेल के लिए भरी. मायावती का समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन उनकी सियासी मजबूरी ही नहीं बल्कि वजूद के लिए भी जरूरी था. भले ही मायावती उस गठबंधन को वोट शेयर के लिए तालमेल बताती हैं लेकिन उन्होंने इस तालमेल से महागठबंधन के तार भी झनझना दिए .

मायावती के लिए ये जीत कितनी जरूरी और बड़ी है उनसे बेहतर कोई जान नहीं सकता. मायावती ने साल 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही बीएसपी के जनाधार को दरकते महसूस किया था. लोकसभा में बीएसपी खाता भी नहीं खोल सकी थी. बीएसपी की सोशल इंजीनियरिंग में फिट किए गए वर्ग धीरे धीरे निकलने शुरू हो गए थे. आखिरी उम्मीद यूपी विधानसभा से थी क्योंकि बीएसपी का अस्तित्व दांव पर था. लेकिन मोदी-लहर ने बीएसपी को तीन साल बाद  यूपी विधानसभा चुनाव में भी संभलने का मौका नहीं दिया. यूपी चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग के सारे फॉर्मूले इस कदर फ्लॉप हुए कि मिली केवल 19 सीटें.

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सत्ता में सूखे का दौर जारी रहा. बीएसपी की हार के पीछे माना गया कि मायावती के आत्मकेंद्रित होने की वजह से दलित वोटर बीएसपी से दूर हो गया. दलित जनाधार से बना दलितों की देवी का साम्राज्य अचानक ताश के पत्तों से बने महल की तरह ढहने लगा. पार्टी के बुरे वक्त में और राजनीति के बदलाव के दौर में बीएसपी के बड़े और वफादार नेता पार्टी छोड़ कर जाने लगे. बीएसपी राजनीतिक निर्वासन की तरफ बढ़ती दिखाई दे रही थी.

पिछले साल जब मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफा दिया तो ये कयास लगने लगे थे कि मायावती के राजनीतिक वनवास के दिन शुरू हो गए. सहारनपुर हिंसा के मामले में उनके राज्यसभा से इस्तीफा देने के बाद सवाल था कि, ‘न संसद में न सत्ता में और न दलितों के दिल में तो फिर आखिर मायावती हैं कहां?’

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लेकिन मायावती की किस्मत का दरवाजा खटखटाने के लिए उपचुनाव इंतजार कर रहा था. वो उपचुनाव जो सीएम योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की वजह से एकतरफा मालूम हो रहे थे. उन्हें मायावती ने बीजेपी के लिए न भूल सकने वाला दर्द बना दिया.

ये ऐसी जीत है जो भले ही समाजवादी पार्टी को मिली लेकिन इस जीत में हाथी की हुंकार सुनाई दे रही है. मायावती की कूटनीतिक जीत से बीएसपी के कोर वोटरों और कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ेगा. मोदी लहर के खिलाफ मायावती अब नई ताकत से हमले करेंगीं.

पिछले दो विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव के बाद मायावती ये जान चुकी हैं कि दलित उत्थान और समाजिक न्याय के एजेंडे पर ही आगे बढ़ना होगा क्योंकि सोशल इंजीनियरिंग से एक वक्त तक ही पार्टी का फायदा हो सका है. वो ये जान चुकी हैं कि सोशल इंजीनियरिंग की बजाए उन्हें अपने कोर वोटर बेस को मजबूत करना होगा. तभी उन्होंने सहारनपुर में हुई दलित हिंसा को मुद्दा बनाकर राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था. वहीं जब उन्हें दोबारा राज्यसभा के लिए ऑफर मिला तो उसे ठुकरा दिया ताकि दलितों में उनका संदेश जा सके.

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अब सामाजिक न्याय के अगुवा नेता के तौर पर मायावती खुद को स्थापित करने में जुटी हैं. वो ये जानती हैं कि राजनीति में रूठा वोटर जब घर वापसी करता है तो सत्ता में बिठाकर ही दम लेता है. बीजेपी की मिसाल सामने है जिसे केंद्र और यूपी में कई सालों के वनवास के बाद राजपाट मिला है. मायावती की नजर उसी राजपाट पर है. जिसके लिए वो इतिहास से सबक लेकर राजनीति के नए वर्तमान में कीर्तिमान बनाने का भरोसा देख रही हैं.

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