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नरोदा केस: ऐसा क्या हुआ जिससे दो अदालतों के फैसले में जमीन-आसमान का फर्क आ गया

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: Apr 20, 2018 04:45 PM IST

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नरोदा केस: ऐसा क्या हुआ जिससे दो अदालतों के फैसले में जमीन-आसमान का फर्क आ गया

हिंदुत्व फैंस के लिए यह सप्ताह मानो स्वर्ग से उतरा हो. ऐसा सप्ताह, जिसके लिए उन्होंने प्रार्थना की हो. पहले असीमानंद को मक्का मस्जिद ब्लास्ट मामले में रिहाई मिली. उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस लोया मामले में स्वतंत्र जांच को मंजूरी नहीं दी. अब, माया कोडनानी की बारी. माया कोडनानी को कल तक नरोदा पाटिया नरसंहार का मास्टरमाइंड माना जाता था. 2002 गुजरात दंगों के दौरान हुए इस नरसंहार में करीब 100 मुस्लिम जानें गई थीं.

सितारे यकीनन इस वक्त हिंदुत्व और सलमान खान के साथ हैं. बीजेपी के विरोधियों को इस वक्त शायद जरूरत है कि वे अपनी जन्मपत्री दिखाएं. कोडनानी के मामले में आप अदालत से बहस नहीं कर सकते. कानूनी ढांचा गवाहों और सबूतों पर आधारित होता है. यह इस सिद्धांत पर काम करता है कि जब तक साबित न हो जाए, तब तक आप निर्दोष हैं. किसी मुलजिम को मुजरिम साबित करने के लिए भरोसेमंद गवाह और पुख्ता सबूतों को जरूरत होती है. ऐसा लगता है कि कोडनानी इसलिए बरी हुईं, क्योंकि उनके खिलाफ लगे आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे.

कोडनानी का बरी होना न्याय पालिका के बारे में काफी कुछ कहता है. 2012 में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें नरोदा पाटिया नरसंहार का मास्टर माइंड कहा था. यह फैसला 11 चश्मदीद गवाहों के बयानों पर आधारित था, जिसमें साबित हो रहा था कि नरसंहार वाली जगह वो मौजूद थीं.

माया कोडनानी

माया कोडनानी

ट्रायल कोर्ट ने कहा था- आरोपी नंबर 37 (कोडनानी) सांप्रदायिक दंगों की किंगपिन साबित होती हैं. वह मुख्य षड्यंत्रकारियों में है, जिन्होंने दंगाइयों को भड़काया. उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. यह सजा मामले की जांच करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित स्पेशल टीम की जांच पर आधारित थी. जांच टीम ने कोर्ट को बताया था कि कोडनानी उस जगह पहुंचीं, जहां बड़ी तादाद में दंगाई इकट्ठा थे.

वे गोधरा में कार सेवकों की मौत का बदला लेना चाहते थे. उन पर भड़काऊ भाषण देने और भीड़ को मौत का नाच खेलने के लिए उकसाने का आरोप लगा. 11 चश्मदीद गवाहों ने दावा किया कि उन्होंने कोडनानी को अपनी कार से उतरते और भीड़ से बात करते देखा. स्पेशल जांच टीम ने कोडनानी के फोन रिकॉर्ड को अपनी बात पुख्ता करने के लिए सबूत के तौर पर पेश किया.

अपनी चार्जशीट में स्पेशल जांच टीम ने कहा कि क्षेत्र की विधायक माया कोडनानी ने विधान सभा में शोक सभा पूरी की. उसके बाद वह नूरानी मस्जिद के पास आईं. यहां उन्होंने भाषण दिया और कहा कि मुस्लिमों को मारो, मुस्लिमों की प्रॉपर्टी तहस-नहस कर दो. लेकिन हाई कोर्ट के मुताबिक ये सारी बातें साबित नहीं होतीं. कोडनानी पहले ही मेडिकल ग्राउंड पर जेल से बाहर थीं. उन्हें कई बीमारियों की वजह से ऐसी छूट मिली थी. अब, कल की ‘मास्टर माइंड’ आज आजाद हैं.

BJP National President Amit Shah in Mysore

उनके पक्ष में गई बातों में एक बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की गवाही भी हो सकती है. अमित शाह ने सितंबर 2017 को हाई कोर्ट में दी गवाही में कहा था कि नरसंहार के रोज कोडनानी गुजरात विधानसभा में थीं. उन्होंने कहा था कि माया कोडनानी नरोडा गाम में नहीं थीं. वो सुबह साढ़े आठ बजे विधान सभा में थीं. उन्होंने कहा था कि 9.30 से 9.45 के बीच मैं सिविल हॉस्पिटल में था. वहां मैंने कोडनानी से मुलाकात की थी. अमित शाह की गवाही ने कोडनानी के बयान को पुख्ता किया था. उन्होंने उस रोज का अपना यही कार्यक्रम बताया था.

जब इस तरह के बिल्कुल विरोधाभासी फैसले आते हैं, तो पहला सवाल यही उठता है कि कौन गलत था और क्यों? ऐसा क्या हुआ कि स्पेशल जांच टीम ने चश्मदीद गवाहों के बयान के आधार पर एक केस फाइल किया. इसकी बदौलत स्पेशल कोर्ट ने 28 साल की सजा सुनाई, जो बाद में भरोसे के लायक नहीं पाया गया. ऐसा क्या था कि विशेष अदालत ने उन्हें महज दंगाइयों के साथ ही नहीं, मास्टर माइंड करार दिया. दूसरी तरफ हाई कोर्ट ने सबूतों को भरोसे लायक नहीं पाया. क्या 2012 से 2017 के बीच कुछ बड़ी तेजी से बदला, जिसने केस को ही ऊपर से नीचे ला दिया? 2017 ही वह साल था, जब गुजरात हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा था.

जो भी वजह हो, केस का एक तरफ से पूरी तरह दूसरी तरफ चला जाना ऐसा है, जो जांच एजेंसियों और अदालतों को लेकर भरोसा नहीं बढ़ाता. अभी तो यह पता नहीं कि सरकार कोडनानी को बरी करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी या नहीं. अगर जाएगी, तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या होगा. लेकिन अभी के लिहाज से जांच के तरीकों और न्याय प्रणाली को लेकर कमियां ही उभरकर सामने आई हैं.

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