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नरोदा पाटिया दंगा मामला: इन वजहों से बरी हुईं माया कोडनानी

पेशे से डॉक्टर माया कोडनानी अब अपने अस्पताल का रुख न कर स्थानीय राजनीति में फिर सक्रिय होंगी

Ravi kant Singh Updated On: Apr 20, 2018 02:12 PM IST

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नरोदा पाटिया दंगा मामला: इन वजहों से बरी हुईं माया कोडनानी

नरोदा पाटिया दंगा मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने शुक्रवार को अपना फैसला सुना दिया. पूर्व मंत्री माया कोडनानी को निर्दोष बताते हुए बरी कर दिया गया है, जबकि बजरंग दल के नेता बाबू बजरंगी की सजा बरकरार रखी गई है.

कोडनानी के बरी होने के बाद लोग दबी जुबान यह पूछने लगे हैं कि जब उसी केस में बाबू बजरंगी ताउम्र जेल में रहेंगे तो कोडनानी बरी कैसे हो गईं. यह सवाल पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने भी खड़ा किया है. तहसीन पूनावाला के उस ट्वीट पर भी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं जिसमें उन्होंने कहा कि 'निर्दोष महिलाओं और बच्चों को मारा गया लेकिन इसके बावजूद माया कोडनानी को महिला और बाल विकास मंत्री बनाया गया. इससे क्या फर्क पड़ता है कि हाइकोर्ट क्या कहता है. माया कोडनानी जेल से बाहर होंगी जैसे वो पहले थीं.'

सोशल मीडिया पर पता नहीं ऐसी कितनी टिपप्णिया हैं. खैर, कोर्ट का फैसला है तो सम्मान जरूर होना चाहिए.

मामले में आगे बढ़ें, उससे पहले यह जानना जरूरी है कि उस वक्त हुआ क्या था और शुक्रवार के फैसले में क्या हुआ. इस मामले की पिछली सुनवाई पिछले साल अगस्त में हुई थी. तब एसआईटी ने कोर्ट में कहा था कि घटना के अगले दिन विधानसभा में एक शोक सभा आयोजित थी. उसमें शामिल होने के बाद माया कोडनानी नरोदा इलाके में गई थीं. इलाके का दौरा करने के बाद उन्होंने अल्पसंख्यकों पर हमले के लिए उकसाया था.

फोटो रॉयटर्स से

फोटो रॉयटर्स से

एसआईटी की रिपोर्ट यह भी बताती है कि माया कोडनानी के वहां से चले जाने के बाद लोग दंगों पर उतर गए. जबकि दूसरी ओर स्पेशल कोर्ट में याचिका दायर कर कोडनानी ने कहा था कि एसआईटी के पास उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है.

एक दिलचस्प बात और. जैसा कि कुछ मीडिया रिपोर्टों में बताया जा रहा कि दंगे के 6 साल बाद कुछ गवाहों ने कोडनानी का नाम लिया. इनमें कुछ गवाह ऐसे हैं जिनके कथित तौर पर तीस्ता सितलवाड़ से रिश्ते थे. इनमें कुछ पर दंगे में मारे लोगों के शव अवैध ढंग से दफनाने के आरोप लगे. और पीड़ितों की भलाई के लिए जो ट्रस्ट बना, उसके फंड में भी कुछ गवाहों के धांधली करने की खबरें आईं.

साक्ष्य नहीं तो सजा भी नहीं

कोडनानी ने उस वक्त एसआईटी में जो बात कही, गुजरात हाईकोर्ट ने शुक्रवार को अपने फैसले में यही कहा है. कोर्ट के मुताबिक कोडनानी के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिले, जिस कारण उन्हें 'संदेह का लाभ' देते हुए बरी कर दिया गया. इसमें कोई एतराज नहीं होना चाहिए कि जब साक्ष्य नहीं तो सजा किस आधार पर दी जाए?

कोडनानी को निर्दोष बताते हुए कोर्ट ने दंगों के दौरान कोई आपराधिक षडयंत्र नहीं पाया. इतना ही नहीं, किसी भी गवाह को भरोसेमंद नहीं माना गया. पिछले साल बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी इस मामले में अपना बयान दर्ज कराया था. अहमदाबाद के सेशन कोर्ट में अपने बयान में शाह ने कहा कि 28 फरवरी को 8.30 बजे कोडनानी विधानसभा में मौजूद थीं, जबकि उस वक्त उन्हें नरोदा में दंगे का 'सूत्रधार' बताया गया था.

अब पीड़ितों के इंसाफ का क्या होगा?

लेकिन एक मौजूं सवाल जरूर है कि भारत राष्ट्र राज्य साबरमती एक्सप्रेस की बोगी नंबर एस-6 वाली वह घटना कैसे भूल सकता है, जिसमें 59 कारसेवकों को जिंदा जलाया गया था. कोई उस घटना को कैसे भूल सकता है कि उन 59 लोगों के नरसंहार के बाद गुजरात के कई इलाकों में सांप्रदायिक दंगे भड़के. कोई कैसे भूल सकता है कि उन दंगों में 1000 लोगों की जान चली गई. लेकिन कोडनानी अब आरोपमुक्त हैं, वे अब उसी राजनीति में उतरेंगी, जिसके लिए जानी जाती थीं.

पेशे से डॉक्टर माया कोडनानी अब अपने अस्पताल का रुख न कर स्थानीय राजनीति में फिर सक्रिय होंगी. जिस वाकपटुता की वजह से वे बीजेपी में लोकप्रिय हुईं और 1998 में वो नरोदा से विधायक-मंत्री बनीं, अब उनकी वही धार वाली राजनीति शुरू होगी. लेकिन उनके फैसले पर लोग सवालिया निशान जरूर लगाएंगे. लोग जरूर पूछेंगे कि जो पहली महिला मौजूदा विधायक थीं और जिसे गोधरा दंगों के बाद सजा हुई, वे अब 'निर्दोष' कैसे हैं?

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