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बंगाल पंचायत चुनाव: आखिर पंचायत चुनावों में मरने-मारने को क्यों उतारू हैं कार्यकर्ता

पंचायत स्तर पर जो पार्टी जितनी मजबूत होगी, विधानसभा या लोकसभा चुनावों में उसका असर उतना ही प्रगाढ़ होगा

Updated On: May 16, 2018 10:36 PM IST

Ravi kant Singh

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बंगाल पंचायत चुनाव: आखिर पंचायत चुनावों में मरने-मारने को क्यों उतारू हैं कार्यकर्ता

अब वो दिन नहीं रहे जब पंचायत चुनाव को महज मुखिया या प्रधान पद से जोड़ कर देखा जाता था. इसका दायरा व्यापक हो चला है जिसकी कड़ी सीधा विधायकी या सांसदी के चुनाव से जुड़ती है. मतलब, पंचायत स्तर पर जो पार्टी जितनी मजबूत होगी, विधानसभा या लोकसभा चुनावों में उसका असर उतना ही प्रगाढ़ होगा.

देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव की अहमियत ज्यादा है. वजह है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति की बुनियाद पंचायत चुनावों में ही है. गांवों में हर पार्टी के विश्वस्त और पक्के कैडर होते हैं. ये कैडर पंचायत चुनाव हो, विधानसभा चुनाव हो या फिर लोकसभा चुनाव हो... हर हाल में वोर्ट अपनी पार्टी को ही देते हैं. लिहाजा पंचायत चुनावों में जो उम्मीदवार कैडर बेस बनाने और उनका भरोसा जीतने में कामयाब हो जाता है, वहीं से उसकी आगे की राजनीतिक राह साफ हो जाती है. यही वजह है कि पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवार जी-जान लगा देते हैं.

झारखंड, बंगाल बने नजराना

इस फैक्ट को पुख्ता करने के लिए हाल में बीते झारखंड पंचायत चुनाव का उदाहण ले सकते हैं. उस चुनाव से रघुवर दास और बीजेपी की प्रतिष्ठा को जोड़ा गया. कैंपेनिंग ऐसे हुई जैसे कोई बड़ा रण मारने की तैयारी हो. अंततः रघुवर दास की पार्टी बीजेपी अच्छे खासे वोटों से जीती लेकिन विरोधियों ने खिलाफत का ऐसा माहौल बनाया जैसे कि वहां वोटों का बहुत बड़ा गड़बड़झाला हुआ हो. राजनीति में एक बात आम है कि प्रतिपक्षी पार्टियां जितना विरोध में उतरती हैं, पक्ष की पार्टियों को उतना मौका मिलता है माहौल बनाने का. ऐसा झारखंड में भी हुआ और बंगाल में भी हो रहा है.

West Bengal Panchayat Election

एक बात यहां जान लेना जरूरी है कि इन निचले चुनावों में जीत-हार का सारा खेल वोट शेयर से जोड़ कर देखा जाता है. सीटें अपनी जगह हैं लेकिन वोट शेयर में एक मामूली बदलाव भी किसी पार्टी को अर्श से फर्श पर और फर्श से अर्श पर पहुंचा सकता है. पंचायत चुनावों में जो भी मार-काट या गलाकाट होड़ देख रहे हैं, वह सब वोट शेयर पर अपने-अपने कब्जे का खेल है.

बूथ जीतो तो जानें

वोट शेयर बढ़ाने के लिए पार्टियां करें तो क्या करें? इसका जवाब हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने नमो ऐप के सहारे दे दिया है. उन्होंने कर्नाटक के बीजेपी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए गुरुमंत्र दिया कि जो नेता बूथ जीतेगा, वही आम चुनाव जीतेगा. तो फिर क्यों न पंचायत स्तर पर चुनाव जीतकर अपनी बूथ स्तरीय राजनीति चमकाई जाए. बंगाल में यही हो रहा है. पंचायत में जो पार्टी विजयी होकर उभरेगी, वही पार्टी कोलकाता में राज करेगी या दिल्ली के तख्तो-ताज पर बैठने वाले का फैसला कराएगी.

अभी हाल में एक खबर आई कि बंगाल में पंचायत की कई सीटें ऐसी हैं जिसपर ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी निर्विरोध चुनाव जीत गई. ऐसा चुनावों से बहुत पहले हो गया. एक चौंकाने वाली जानकारी यह भी है कि आज तृममूल जो भी हथकंडा अपना रही है, कभी वहां की वामपंथी सरकारें भी अपनाती रही हैं. कह सकते हैं कि पंचायती स्तर पर पकड़ बनाने के लिए ममता बनर्जी की पार्टी वही कह रही है जो ज्योति दा या बुद्धदेब की सरकार करती रही है. लेकिन बीजेपी को इससे ऐतराज है.

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सांप्रदायिक कार्ड काफी नहीं

बीजेपी को पता है कि सांप्रदायिक कार्ड भर खेल जाने से बंगाल के रसोगुल्ला पसंद कार्यकर्ता अचानक 'कमल' को पसंद नहीं करने लगेंगे. इस नापसंदगी को धरातल पर उतारने के लिए वही कुछ करना होगा जो पूर्व की बंगाल सरकारें करती आई हैं. यह काम इतना आसान नहीं है क्योंकि जिन वोटरों को सदियों से सुविधा देकर या लोभ देकर अपने पाले में रखा गया है, उन्हें अपनी ओर खींचने के लिए कई हथकंडे अपनाने होंगे. आज बंगाल के पंचायत चुनाव में इतने लोग मर रहे हैं, तो जान लें, वह इसी खींचतान की वजह से है. और यह तबतक चलता रहेगा जबतक या तो लेफ्ट या फिर बीजेपी वहां अपने को एक प्रतिष्ठित विपक्ष के तौर पर न जमा ले.

इतिहास गवाह है कि पहले शायद ही पंचायत चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट से लेकर चुनाव आयोग तक इतना हंगामा मचा हो. तारीख पर तारीख लिए गए हों और खुद कोई मुख्यमंत्री चुनाव आयोग को इस प्रकार 'खलनायक'  की तरह देख रही हों. दरअसल, राज्य चुनाव आयोग ने जब तीन चरणों में चुनाव कराने का ऐलान किया, तभी से इस पर विवाद शुरू हो गया. विपक्षी बीजेपी, कांग्रेस और सीपीएम ने पहले तो सुरक्षा का सवाल उठाते हुए चुनावों के दौरान केंद्रीय बलों की तैनाती की मांग उठाई. उसके बाद नामांकन पत्र दाखिल करने की प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा के आरोप लगे.

सीट नहीं वोट शेयर की लड़ाई

जहां-तहां हिंसा भी पसरी. ऐसी हिंसा जो चुनाव पूर्व शुरू होकर चुनाव के दिन तक लोगों के जान लेने पर उतारू रही. दक्षिण 24 परगना, मालदह, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, पश्चिम मिदनापुर, हावड़ा समेत कई जिलों में चुनाव से पहले लोगों ने एक दूसरे पर हमले किए. चुनाव आते-आते मामला इतना बिगड़ा कि चुनाव के दिन बंगाल की पूरी धरती रक्तरंजित जान पड़ी और कई लोग काल के गाल में समा गए.

पार्टियों के लिए लोग मरते हैं और पार्टियां अपना वोट शेयर बढ़ाती हैं. यही वोट  शेयर बूथ जीतने में काम आता है और बूथ राजगद्दी तक पहुंचाता है. यही है बंगाल या झारखंड पंचायत चुनावों का फलसफा.

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