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राजस्थान: 2013 के घोषणापत्र में किए कई वायदों को बीजेपी ने क्यों भुला दिया

राजस्थान विधानसभा का चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है, कांग्रेस और बीजेपी सरीखी इलाके की बड़ी पार्टियां अपने चुनावी घोषणा-पत्रों को मांजने-चमकाने की कोशिशें तेज करती जा रही हैं.

Updated On: Nov 09, 2018 04:51 PM IST

Rangoli Agrawal

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राजस्थान: 2013 के घोषणापत्र में किए कई वायदों को बीजेपी ने क्यों भुला दिया
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राजस्थान विधानसभा का चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है, कांग्रेस और बीजेपी सरीखी इलाके की बड़ी पार्टियां अपने चुनावी घोषणा-पत्रों को मांजने-चमकाने की कोशिशें तेज करती जा रही हैं. दूसरे राज्यों में किए गए चुनावी वादों को देखने-परखने के साथ-साथ कुछ खास फोन नंबरों के सहारे लोगों से सुझाव भी मांगे जा रहे हैं. इलाके के ये दो बड़े सियासी दल अपने संसाधनों के एक बड़े हिस्से का इस्तेमाल 7 दिसंबर को होने जा रहे चुनाव के घोषणा-पत्र की तैयारी में कर रही हैं.

बहरहाल, बीजेपी के सामने एक चुनौती अपने उन वादों के पुनरावलोकन की है जो उसने 2013 के चुनावी घोषणा में किये थे. इन्हीं वादों ने लोगों को पार्टी की तरफ खींचा और लोगों ने 2013 के चुनाव में पार्टी को 200 में से 162 सीटों पर जीत दिलाई.

महिला एवं बाल विकास

अगस्त महीने में प्रकाशित सेंटर फॉर कम्युनिटी इकॉनॉमिक्स एंड डेवलपमेंट कंसल्टेंट सोसायटी (CECOEDECON) की रिपोर्ट के मुताबिक यौन-उत्पीड़न के मामलों के निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट ना बना पाना सूबे की मौजूदा सरकार की एक बड़ी चूक है. रिपोर्ट के अनुसार वित्त आयोग ने राजस्थान को फास्ट ट्रैक कोर्ट्स की स्थापना के लिए 214 करोड़ रुपए आवंटित किए थे. लेकिन अभी तक ऐसा एक भी कोर्ट नहीं बन पाया है.

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राजस्थान महिला आयोग के अध्यक्ष सुमन शर्मा का कहना है, 'फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना का काम कानूनी पचड़ों के कारण रुका. हमने नियुक्तियां कीं लेकिन बहालियां नहीं हो सकीं क्योंकि जजों और वकीलों की संख्या कम है. इस कारण ज्यूडिशियल पैनल अधूरा रहा.' उन्होंने यह भी कहा, 'हमने 35,000 महिला कांस्टेबल नियुक्त किए और राजस्थान में पोस्को के 56 कोर्ट बनाए जो एक बड़ी उपलब्धि है.'

सेंटर फॉर कम्युनिटी इकॉनॉमिक्स एंड डेवलपमेंट कंसल्टेंट सोसायटी की रिपोर्ट में ध्यान दिलाया गया है कि चुनावी घोषणा-पत्र में हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में स्त्री-रोगों से संबंधित एक स्पेशलिस्ट डॉक्टर बहाल करने का वादा किया गया था. लेकिन यह काम किसी भी जिले में ना हो सका. सुमन शर्मा इसका कारण बताते हुए कहती हैं, 'हमने 5000 डॉक्टर्स की भर्ती निकाली थी लेकिन 1300 डाक्टर्स ही लिए जा सके क्योंकि जरूरत स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स की थी.'

महिलाओं के प्रति संवेदनशील रुख अपनाते हुए जेंडर सेंसेटिव बजट बनाने के मामले में भी सरकार उम्मीदों के अनुरूप काम नहीं कर पाई. CECOEDECON की रिपोर्ट के लेखकों में शामिल बरखा माथुर ने बताया, 'साल 2015-16 के बजट के कुल रकम में 1.2 फीसद का आवंटन महिलाओं से संबंधित मुद्दों के लिए हुआ था. यह अगले साल के बजट में घटकर 1.02 प्रतिशत हो गया और साल 2017-18 के बजट मे कम होकर 1 फीसद पर आ गया है.'

स्वास्थ्य सुविधा

स्वास्थ्य में भी स्थिति कोई बहुत बेहतर नहीं. वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली सरकार ने वादा किया था कि राज्य के स्वास्थ्य सूचकांक को सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों के अनुरूप एक वांछित स्तर तक पहुंचा दिया जाएगा लेकिन सरकार ऐसा कर पाने में नाकाम रही. रिपोर्ट में कहा गया है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने सतत विकास लक्ष्य (सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स) के तहत जो मानक निर्धारित किए हैं उस तक सूचकांक को ऊपर उठाने के कोई प्रयास नहीं हुए.

स्वास्थ्य के मामले में पार्टी के कामकाज के बारे में सवाल पूछने पर सूबे की बीजेपी के प्रवक्ता लक्ष्मीकांत भारद्वाज ने बना-बनाया जवाब दोहराया, 'स्वास्थ्य सूचकांक में सम्पूर्ण सुधार के लिए बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी है. हमें इसके बारे में सोचना होगा. बुनियादी विचार है कि हर पंचायत में लोगों को प्राथमिक स्तर की स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराई जा सके. हमने भामाशाह बीमा योजना के तहत मरीजों को मौद्रिक (मॉनीटरी) बीमा-कवर प्रदान किया है ताकि उपचार का खर्च उठाने के लिए उन्हें अपनी जमीन-जायदाद ना बेचनी पड़े.'

ऊपर जिन मसलों का जिक्र किया गया है उनके अतिरिक्त 2013 के मेनिफेस्टो में यह भी कहा गया था कि बीजेपी की सरकार बनी तो पार्टी सड़क दुर्घटनाओं में घायल हुए लोगों के शीघ्र और कारगर उपचार के लिए कदम उठाएगी. लेकिन इस मोर्चे पर भी किसी उपाय की घोषणा नहीं हुई.

एक अहम बात यह कि बीजेपी ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तथा सरकारी जिला अस्पतालों में गुणात्मक सुधार के लिए एक आयोग बनाने का वादा किया था. यह भी कहा गया था कि सम्पूर्ण आकलन के आधार पर अस्पतालों का दर्जा तय किया जायेगा और गुणत्ता के लिहाज से बेहतर प्रदर्शन करने वाले अस्पतालों को अवार्ड दिया जाएगा. संस्था CECOEDECON की रिपोर्ट से पता चलता है कि ऐसा कोई आयोग अभी तक नहीं बना है.

रिपोर्ट के मुताबिक, 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (ग्रामीण और शहरी) के तहत खर्च की गई रकम मिशन को आवंटित बजट की तुलना में बहुत कम है.'

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कृषि

राजस्थान के आर्थिक सर्वेक्षण (2017-18) के मुताबिक सूबे की जीडीपी में कृषि का योगदान वित्तवर्ष (2017-18) में 24.76 फीसद का रहा. लेकिन इस क्षेत्र के विकास के लिए कुल बजट राशि में से 3.5 फीसद का ही आबंटन हुआ. पिछले वित्तवर्ष की तुलना में यह कम है. पिछले वित्तवर्ष में कुल बजट राशि का 4.01 फीसद हिस्सा कृषि क्षेत्र के विकास के लिए आबंटित हुआ था.

राज्य के कृषिमंत्री प्रभुलाल सैनी का कहना है, 'हमने बागवानी (हार्टीकल्चर) के मद में बजट राशि बढ़ा दी है क्योंकि हम समेकित और विविधीकरण वाली खेती पर जोर दे रहे हैं. किसानों की आमदनी 2022 तक दोगुनी करने के लिए हमने किसानों को परंपरागत खेती की जगह अलग-अलग फसलों की खेती की तरफ मोड़ा है. हमें विभिन्न राष्ट्रीय योजनाओं जैसे राष्ट्रीय वानिकी मिशन तथा अन्य मिशनों के जरिए अतिरिक्त रकम मिली है. बजट में खेती के लिए आबंटन बढ़ाने की निश्चित ही जरुरत है.'

साल 2013 के मेनिफेस्टो की जमीनी स्तर पर मौजूद हालात से तुलना करके संस्था( CECOEDECON) की रिपोर्ट में कहा गया है कि बीजेपी ने राजस्थान में कर्जमाफी का वादा किया था और अपने शासन के दौरान इससे जुड़ी कई घोषणाएं कीं लेकिन इन बातों को अमली जामा पहनाने के लिए कोई ठोस योजना नहीं बन पायी. रिपोर्ट के मुताबिक कर्जमाफी के मकसद से एक समिति का गठन हुआ है जो कर्जमाफी के लिए दिशानिर्देश सुनिश्चित करेगी.

इस मसले पर सवाल पूछने पर कृषिमंत्री प्रभुलाल सैनी ने कहा, 'हमने रकम उनके बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिया है. बहरहाल, किसानों को ये बात समझ में नहीं आयी है. वे चाहते हैं कि रकम हमेशा उनके हाथ में मिले. कर्ज की रकम तो उसी खाते में माफ की जा सकती है जिस खाते से कर्ज का भुगतान किया गया हो.'

इसके अतिरिक्त, कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों के लिए अधिनियम बनाने की दिशा में कोई ठोस पहलकदमी नहीं हुई है जबकि ऐसा वादा किया गया था. कृषि से संबंधित क्षेत्रों में पशुपालन तथा खेती-बाड़ी से जुड़े अन्य काम शामिल हैं.

बीजेपी ने वादा किया था कि पुष्प-उद्यानिकी (फ्लोरिकल्चर) का विभाग कायम किया जायेगा. कृषिमंत्री सैनी का कहना है, 'हमने नए किस्म के फ्लोरीकल्चर के लिए दो केंद्रों की आधारशिला रखी है. इनमें से एक माउंट आबू में है और एक सवाई माधोपुर में है. इसकी मंजूरी दो माह पहले दी गई. स्थापित होने जा रहे दोनों केंद्रों के लिए कुल बजट 20 करोड़ रुपए का है. मात्र समेकित कृषि के मोर्चे पर ही काम होना शेष है. हम इस ओर ध्यान लगा रहे हैं.' सैनी की बातों से पता चलता है वादे पर काम एकदम ही नहीं हुआ हो, ऐसी बात नहीं.

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संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार जिन वादों को पूरा करने में नाकाम रही उनमें एक वादा ऐसी फसलों को बढ़ावा देने का था जिनमें पानी का इस्तेमाल कम होता है. बंजर भूमि के विकास तथा पशुओं के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई का भी वादा किया गया था जो पूरा नहीं हुआ.

कुछ वादे पूरे हुए हैं. ऐसे ही वादों में शामिल है अंतरराष्ट्रीय बाजार में फल और सब्जी को बढ़ावा देना. इसके लिए ग्लोबल राजस्थान एग्रीटेक मीट का आयोजन हुआ था. इस आयोजन की वजह से स्मार्ट फार्म्स की स्थापना हुई. वादे के अनुरूप स्कूलों में स्वास्थ्य जांच तथा टीकाकरण का काम हुआ है. स्कूलों में लड़के-लड़कियों की संख्या के अनुपात में अन्तर को कम करने के प्रयास हुए हैं. कई जिलों के मुख्यालय में एक महिला पुलिस ऑफिसर की नियुक्ति की गई है तथा 50 लाख से ज्यादा की तादाद में भामाशाह खाते खुलवाए गए हैं. बहरहाल, रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि खातों में रकम पहुंची भी है या नहीं, इसकी पुष्टि नहीं की जा सकी.

(लेखिका जयपुर में रहती और स्वतंत्र लेखन करती हैं तथा जमीनी स्तर के संवाददाताओं के अखिल भारतीय नेटवर्क 101Reporters.com की सदस्य हैं.)

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