live
S M L

मनोहर पर्रिकर का बीजेपी में सियासी कद कई मायनों में काफी बड़ा है

बीजेपी के लिए पर्रिकर को लेकर दांव खेलने की मजबूरी गोवा की सियासी परिस्थितियों के कारण ही पनपी है

Updated On: Jan 25, 2017 05:40 PM IST

Sanjay Singh

0
मनोहर पर्रिकर का बीजेपी में सियासी कद कई मायनों में काफी बड़ा है

मनोहर पर्रिकर का बीजेपी में सियासी कद कई मायनों में बड़ा है बतौर केंद्रीय मंत्री वो शानदार हैं तो पार्टी संगठन में भी उनकी छवि एक जननेता की है.

यही वजह है कि जब बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने उनकी तारीफ की तो इसका राजनीतिक मतलब ये निकाला गया कि गोवा के चुनाव में बीजेपी उनके बगैर अपनी सियासी रणनीति को अमली जामा नहीं पहना सकती है.

इसकी वजह भी बहुत साफ है, दरअसल बीजेपी के पास उनके कद का ना तो कोई नेता है और ना ही कुशल प्रशासक जिसकी सियासी पकड़ महज 40 विधानसभा सीटों वाले राज्य गोवा में मजबूत हो, क्योंकि गोवा की राजनीति में स्थिरता और पारदर्शिता पर हमेशा से भ्रष्टाचार और सियासी उथल पुथल हावी रहा है.

ऐसा लगता है कि गोवा में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर की जरूरत बतौर पार्टी के प्रमुख प्रचारक या आयोजक या फिर पार्टी के प्रमुख चेहरे के रूप में ही नहीं है बल्कि ये भी मुमकिन है कि अगर पार्टी इस राज्य की सत्ता में वापसी करती है तो मनोहर पर्रिकर गोवा की राजनीति में एक बार फिर से सक्रिय हो सकते हैं.

पर्रिकर के अतीत के साथ उनका शानदार राजनीतिक प्रदर्शन जुड़ा हुआ है. पांच साल पहले पर्रिकर ने ही गोवा में कमल खिलाया था. इससे पहले गोवा में लगभग एक तरह की खंडित जनादेश की परंपरा ही चली आ रही थी.

गोवा की अहमियत

गोवा में बीजेपी की जीत कई मायनों में तब अहम थी. चूंकि गोवा में अल्पसंख्यक ईसाइयों की आबादी ज्यादा है और पर्रिकर ने पार्टी के साथ इस समुदाय को जोड़ने में कामयाबी हासिल की. पहली बार तब बीजेपी ने ईसाई समुदाय के आठ लोगों को टिकट दिया था और ये टिकट बंटवारा ईसाइयों की आबादी के करीब-करीब अनुपात में था. पर्रिकर का ये दांव तब काफी कामयाब रहा. बीजेपी की टिकट पर खड़े आठों उम्मीदवार तब चुनाव जीत गए.

नेवी के अफसरों के साथ एक कार्यक्रम में बोलते हुए मनोहर पर्रिकर

नेवी के अफसरों के साथ एक कार्यक्रम में बोलते हुए मनोहर पर्रिकर

पर्रिकर की अहमियत और उनकी सियासी सूझबूझ के अलावा उनका आरएसएस और बीजेपी नेतृत्व के साथ बेहतर संबंध इस बात से समझा जा सकता है कि आईआईटी से पढ़े लिखे बीजेपी के नेता बने पर्रिकर का संबंध वैसे तो गोवा जैसे छोटे राज्य से रहा है, बावजूद इसके बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए उनका नाम आगे बढ़ाया गया.

ये भी पढ़ें:  बेवजह आलोचना करने वाले कपड़े उतारकर नाचें

यहां तक कि नवंबर 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें गोवा से बुलाकर केंद्र में रक्षामंत्री बनाया. साथ ही उन्हें कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्युरिटी का सदस्य बनाया. सुरक्षा संबंधी केंद्रीय कमेटी का सदस्य बनाया गया. यह इस बात को जाहिर करता है कि पर्रिकर का सियासी कद ना सिर्फ बढ़ा बल्कि शीर्ष नेतृत्व में भी वो अहम हिस्सा बनकर उभरे.

बतौर प्रशासक पर्रिकर की छवि तो पहले से ही मजबूत थी लेकिन निजी और राजनीतिक जीवन में साफ सुथरी छवि की वजह से भी उनका सियासी कद काफी बढ़ा. क्योंकि नरेंद्र मोदी रक्षा मंत्रालय एक ऐसे शख्स के हवाले करना चाहते थे जिनकी व्यक्तिगत छवि पर कोई सवाल ना खड़े कर सके.

केंद्र की राजनीति

शुरुआत में पर्रिकर गोवा के मुख्यमंत्री पद को छोड़कर केंद्र की राजनीति में नहीं आना चाहते थे लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वो न नहीं कर सके.

सेना के एक कार्यक्रम के दौरान रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर

सेना के एक कार्यक्रम के दौरान रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर

बीजेपी के लिए दुर्भाग्य ये रहा कि बतौर पर्रिकर के उनके उत्तराधिकारी लक्ष्मीकांत पारसेकर गोवा में फिसड्डी साबित हुए. गोवा में आज हालत ये है कि बीजेपी और उसके कार्यकर्ता दोनों में ही आत्मविश्वास की भारी कमी है.

ऐसे राजनीतिक माहौल के बीच कल गोवा के वास्को में हुई रैली में अमित शाह ने जो बयान दिया उसका सियासी मतलब काफी अहम है.

शाह ने कहा, 'पर्रिकर के तौर पर गोवा ने देश को एक बड़ी पूंजी दी है. वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में रत्न की तरह हैं. दिल्ली में उनकी बहुत जरूरत है तो गोवा में भी उनकी काफी अहमियत है, गोवा की जनता चाहती है कि हम उन्हें वापस गोवा भेज दें. पर्रिकर गोवा वापस आते हैं या फिर वो केंद्र में ही रहते हैं इसका फैसला चुनाव के बाद ही होगा, लेकिन एक बात मैं कहना चाहता हूं कि पर्रिकर जहां भी हों लेकिन गोवा में सरकार उनके नेतृत्व में ही बनेगी. गोवा की जनता इस बात का भरोसा रखे.'

ये भी पढ़ें: गोवा में बीजेपी ने जारी की सूची

बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी जो गोवा के चुनावी प्रभारी भी हैं  उन्होंने भी कुछ दिन पहले पर्रिकर को मुख्यमंत्री बनाए जाने की अटकलों को ये कह कर हवा दिया था, कि गोवा में पार्टी को बहुमत मिलने पर केंद्र से ही बतौर अगला मुख्यमंत्री किसी को राज्य में भेजा जा सकता है.

फर्स्टपोस्ट को बीजेपी के एक नेता ने बताया कि ये बहुत साफ है कि अगर गोवा की सत्ता में बीजेपी की वापसी होती है, तो पर्रिकर रक्षा मंत्री का पद छोड़कर वापस गोवा के मुख्यमंत्री का पदभार संभालेंगे. हालांकि केंद्र में पर्रिकर की जगह कौन लेगा इस बात को लेकर अभी चर्चा नहीं हुई है, क्योंकि इस संभावना से अभी कई किंतु परंतु जुड़े हैं.

बीजेपी के लिए पर्रिकर को लेकर दांव खेलने की मजबूरी गोवा में मौजूदा सियासी परिस्थितियों की वजह से ही पनपी है. दरअसल, भाषा के मुद्दे पर राज्य में आरएसएस और सत्ताधारी बीजेपी एक दूसरे के आमने-सामने हैं...तो कई चर्च नोटबंदी समेत कई मुद्दों पर बीजेपी के खिलाफ हैं और ये बातें बीजेपी की चिंता को बढ़ा रही है.

वेलिंगकर नाराज

बीजेपी नेतृत्व के लिए राज्य के पूर्व आरएसएस प्रमुख सुभाष वेलिंगकर भी कम परेशानी का सबब नहीं बने हुए हैं. वेलिंगकर वैसे तो भगवा खेमे और भारतीय भाषा सुरक्षा मंच से अभी भी जुड़े हुए हैं लेकिन गोवा चुनाव में वो बीजेपी को सबक सिखाने के मूड में हैं.

आरएसएस के सुभाष वेलिंगकर पर्रिकर और बीजेपी से नाराज चल रहे हैं

आरएसएस के सुभाष वेलिंगकर पर्रिकर और बीजेपी से नाराज चल रहे हैं

यही वजह है कि मोदी और शाह की जोड़ी ने नितिन गडकरी को राज्य का चुनावी प्रभारी बनाया, क्योंकि माना जाता है कि गडकरी के रिश्ते आरएसएस के पदाधिकारियों के साथ मधुर हैं और उनमें दूरदर्शिता के साथ समस्याओं को हल करने की बेहतर काबिलियत भी है.

ये भी पढ़ें: कारपेट बॉम्बिंग से विरोधियों पर निशाना

वैसे तो वेलिंगकर का सियासी कद इतना बड़ा नहीं है कि वो बीजेपी को राज्य में खास नुकसान पहुंचा पाएंगे, लेकिन खुद वेलिंगकर और गोवा सुरक्षा मंच जिसे उन्होंने आगे बढ़ाया है गोवा की महाराष्ट्र गोमांतक पार्टी (एमजीपी) का समर्थन कर रहे हैं. ऐसे में कई सीटों पर जहां चुनावी मुकाबला काफी संघर्षपूर्ण होगा वहां बीजेपी के लिए सियासी समीकरण साध पाना कठिन हो जाएगा.

पर्रिकर का गोवा प्रेम किसी से छिपा नहीं है, यहां तक कि दिल्ली के सियासी गलियारे में भी अक्सर ये चर्चा का विषय बन जाता है कि सप्ताह के अंत में पर्रिकर गोवा चले जाते हैं. यहां तक कि पठानकोट और उड़ी में भारतीय सेना के बेस पर आतंकी हमला भी सप्ताह के अंत में ही हुआ था और इन दोनों घटनाओं के दौरान रक्षामंत्री सक्रिय भूमिका में नहीं दिखे थे. इसकी वजह बहुत साफ थी और वो उन दिनों संगठन के काम-काज को देखने के लिए रक्षामंत्री गोवा गए हुए थे.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi