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मन की बात: जन-जन के लिए तो नहीं लगती

सोसायटी पिरामिड के सबसे निचले पायदान के लोगों की पूरी तरह अनदेखी.

Updated On: Nov 28, 2016 07:37 AM IST

Pratima Sharma Pratima Sharma
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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मन की बात: जन-जन के लिए तो नहीं लगती

प्रधानमंत्री ने 8 नवंबर को 500 और 1000 रुपए के नोट बैन करने के बाद जितनी जगह भाषण दिया, उन सबमें इसके फायदे गिनाए. 27 नवंबर रविवार को 'मन की बात' कार्यक्रम में भी उनके पास कहने के लिए यही विषय था.

क..ख...ग...भी नहीं आता, हम क्या करें ?

ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री का नोटबंदी करने का यह फैसला पूरी तरह गलत है. लेकिन कैशलेस और लेस कैश सोसायटी की क्रांति का श्रेय लेने के चक्कर में वह यह भूल गए कि देश की बहुत बड़ी आबादी इंटरनेट, मोबाइल फोन तो क्या क..ख...ग...पढ़ना भी नहीं जानती. भारत को कैशलेस या लेस कैश सोसायटी बनाने का सपना देखते हुए सोसायटी पिरामिड के सबसे निचले पायदान के लोगों की पूरी तरह अनदेखी की गई है.

आखिरी पायदान

पिरामिड के आखिरी पायदान के लोगों की पूछ नहीं

2011 में हुए 15वें जनगणना में देश में साक्षरता की दर औसत 70.04 फीसदी थी. यानी देश की 30 फीसदी जनता के लिए काला अक्षर भैंस बराबर है. ऐसी जनता को प्रधानमंत्री जी कैशलेस या लेस कैश सोसायटी की क्रांति में शामिल करना चाहते हैं.

यह तो बिल्कुल वही बात हुई कि सेना को बगैर हथियार दिए सीमा पर लड़ने के लिए भेजा दिया जाए.

अभी तक देश ने 100 फीसदी साक्षरता का टारगेट भी हासिल नहीं किया है. ऐसे में कैशलेस सोसायटी की क्रांति की बात करना गरीब जनता के साथ किसी मजाक से कम नहीं है.

प्रधानमंत्री मन की बात कार्यक्रम में कहते हैं,'आप मेरे सच्चे सिपाही हो, सच्चे साथी हो. देश को आर्थिक फंचाई पर ले जाने का अवसर आया है. मेरे नौवजवानों आप मेरी मदद कर सकते हो.'

'डिजिटल वर्ल्ड अनुभव जितना आपको है पुरानी पीढ़ी को नहीं है. आप आॅनलाइन काम करना जानते हो. लेकिन आज देश जिस महान कार्य को करना चाहता है वह है कैशलेस सोसायटी का.'

'यह ठीक है कि शतप्रतिशत कैशलेस सोसायटी संभव नहीं होती. लेकिन क्यों न भारत को लेस कैशलेस सोसायटी बनाना शुरू करे. फिर कैशलेस सोसायटी की मंजिल दूर नहीं होगी. मुझे इसमें आपकी मदद चाहिए. मुझे विश्वास है कि आप मुझे कभी निराश नहीं करेंगे क्योंकि हम सब हिंदुस्तान के गरीब की जिंदगी बदलने की इच्छा रखते हैं.'

नरेंद्र मोदी ने युवा पीढ़ी से जो मदद मांगी है, युवाओं को यह मदद करने से कोई गुरेज भी नहीं है. लेकिन देश की 30 फीसदी जनता जो अपना नाम तक नहीं लिख पाती उनकी दिक्कतें कैसे दूर होंगी.

कैसे पूरे होंगे हवा-हवाई ख्वाब !

'मन की बात' कार्यक्रम में प्रधानमंत्री बताते हैं कि बैंकों का ईवालेट है. प्रधानमंत्री कहते हैं,

'जन-धन योजना के तहत भारत के करोड़ों-करोड़ गरीब परिवार के पास रूपे कार्ड है. 8 नवंबर से पहले रूपे कार्ड का इस्तेमाल कम होता था. लेकिन 8 नवंबर को नोटबंदी के फैसले के बाद गरीबों ने रूपे कार्ड इस्तेमाल करना शुरू किया और इसमें करीब करीब 300 फीसदी का उछाल आया.'

प्रधानमंत्री के इस बयान से लगता है कि वे सच में राम राज में जी रहे हैं. लेकिन मोदी जी को राम-राज से हकीकत की दुनिया में लाने के लिए सिर्फ एक ही आंकड़ा काफी है. वह यह है कि 8 नवंबर को नोटबंदी के ऐलान के बाद जन धन खातों में 21,000 करोड़ रुपए जमा हुए हैं.

अगर नोटबंदी के फैसले के बाद गरीब जनता रूपे कार्ड का इस्तेमाल करके कैशलेस सोसायटी को बढ़ावा दे रही है तो यह पक्का है कि जन धन खातों में जमा हुए 21,000 करोड़ रुपए उन्हीं के होंगे.

वर्चुअल तो नहीं कैशलेस सोसायटी का सपना 

मन की बात बताते हुए प्रधानमंत्री जी यहीं नहीं ठहरे. उन्होंने कहा, 'एक बढ़िया प्लैटफॉर्म है यूपीआई कार्ड. इससे आप शॉपिंग कर सकते हैं. पैसे भेज सकते हैं और ले भी सकते हैं. और ये काम इतना सिंपल है जितना की आप व्हाट्सअप भेजते हैं. कुछ भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति न हो उसे भी व्हाट्सअप मेसेज भेजना आता है.'

प्रधानमंत्री जी की आपकी बात सही है. अशिक्षित व्यक्ति भी व्हाट्स के मेसेज भेजता है. लेकिन रुपए-पैसे का लेनदेन करने के लिए एसएमएस करना और व्हाट्सअप पर जोक्स फॉरवर्ड करना क्या एक जैसा है.

इंटरनेट सोसायटी के ग्लोबल इंटरनेट मैप के मुताबिक इंटरनेट पेनेट्रेशन के मामले में भारत दुनिया भर में 139वें नंबर पर है. लेकिन ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री जी अपने डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को लेकर कुछ ज्यादा ही गंभीर हैं. यही वजह है कि वे देश की गरीब-लाचार जनता की मजबूरी समझने के बजाय भारत को एक झटके में कैशलेस सोसायटी के वर्चुअल वर्ल्ड में ले जाना चाहते हैं.

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