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ए. राजा की किताब से मनमोहन सिंह की ‘निजी ईमानदारी’ का चोला तार-तार

अगर कांग्रेस सहमत है कि 2जी में 'ना कोई घोटाला' और 'ना कोई अवैधानिकता' थी तो मनमोहन सार्वजनिक रूप से राजा के समर्थन में क्यों नहीं सामने आते, जैसा कि डीएमके नेता ने ख्वाहिश जताई है?

Sreemoy Talukdar Updated On: Jan 13, 2018 02:11 PM IST

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ए. राजा की किताब से मनमोहन सिंह की ‘निजी ईमानदारी’ का चोला तार-तार

सीबीआई कोर्ट ने 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सारे आरोपियों को बरी कर दिया है, लेकिन पूर्व केंद्रीय टेलीकॉम मंत्री ए. राजा की पूरी सच्चाई सामने लाने वाली किताब मनमोहन सिंह के इर्द-गिर्द बुने गए ‘व्यक्तिगत ईमानदारी’ के मिथक को ठीक से उजागर कर देती है. किताब- 2जी सागा अनफोल्ड- अभी दुकानों पर पहुंची है, लेकिन सीएनएन न्यूज18 पर चलाए गए इसके एक्सक्लूसिव अंश और डीएमके नेता के बरी होने के बाद के घटनाक्रम पूर्व प्रधानमंत्री का ईमानदार आकलन पेश करते हैं. मनमोहन सिंह की सुविचारित तरीके से गढ़ी गई छवि- कि वह एक ईमानदार (भले ही असहाय) शख्स हैं, जो आसपास बेईमान लोगों से घिरा है- की अब धज्जियां उड़ चुकी हैं.

मुद्दा यह नहीं है कि 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में बड़े पैमाने पर अनियमितता की गई थी या नहीं. यह मामला अदालत में चलता रहेगा. मुद्दा यह है कि क्या मनमोहन सिंह, जिनकी ईमानदारी की कसमें खाई जाती हैं, क्या स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया में अपने शामिल होने को लेकर उनके बयानों में एकरूपता है?

ए. राजा ने किए हैं कई दावे

राजा मनमोहन सिंह के लंबे समय से किए जा रहे बचाव- कि वह घटनाक्रम से नावाकिफ हैं- को सीधे चुनौती देते हैं और अपनी किताब में दावा करते हैं कि प्रधानमंत्री को उनके सभी कदमों से 'पूरी तरह वाकिफ' रखा गया था. अगर यह सच है तो मनमोहन के 'आर्म्स लेंथ (एक दूसरे के फैसलों से आजाद)' के बचाव के तर्क को खारिज कर देता है.

याद करें कि जनवरी 2008 में राजा के स्पेक्ट्रम आवंटन करने के मात्र 13 दिन बाद- जैसा कि एक आरटीआई में खुलासा हुआ है- मनमोहन ने पीएमओ को निर्देश दिया था वह टेलीकॉम मंत्रालय को लिखे कि राजा के फैसलों से उनके दफ्तर को 'एक दूसरे के फैसलों से आजाद (आर्म्स लेंथ )' रखा जाए. इसके अनुसार प्रधानमंत्री के निजी सचिव ने लिखाः 'प्रधानमंत्री विभाग को अनौपचारिक रूप से सूचित करना चाहते हैं कि कोई औपचारिक पत्र व्यवहार ना हो और चाहते हैं कि पीएमओ को कृपया इसके फैसलों से अलग रखा जाए.'

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक दो दिन बाद मनमोहन के पीएस ने दर्ज किया कि स्पेक्ट्रम आवंटन पर नोट 'अनौपचारिक रूप से डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकॉम सचिव के साथ साझा किए गए. हम फाइल रख सकते हैं.' यह अखबार आगे लिखता है कि 'पीएमओ का नोट स्टार्टअप स्पेक्ट्रम की नीलामी की बात नहीं करता, जिससे स्पेक्ट्रम की कमी को लेकर सवाल उठते हैं और राजा के टेलीकॉम मंत्री रहते नीतियों में फेरबदल की गुंजाइश छोड़ देता है.'

'मनमोहन को आशंका थी'

जैसा कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में टेलीकॉम मंत्री रह चुके अरुण शौरी ने 2011 में इकोनॉमिक टाइम्स से कहा था, यह साफ तौर पर जताता है कि मनमोहन सिंह या तो राजा के उठाए जाने वाले कदमों के बारे में जानते थे या कम से कम उन्हें लेकर आशंकित थे. वह सवाल उठाते हैं, 'वह (मनमोहन) यह निर्देश अपने अफसरों को क्यों देते, जब तक कि वह नहीं जानते थे कि कुछ संदिग्ध चल रहा है और उन्हें इससे दूर रहना चाहिए? मेरे ख्याल में उन्हें पूरी जानकारी थी और उन्हें गंभीर आशंका थी कि बहुत चिंताजनक हो गया है और उनकी चिंता सिर्फ इतनी थी कि इस गंदगी से दूर रहा जाए. यह ऐसा नहीं है जैसा एक प्रधानमंत्री से करने की अपेक्षा की जाती है.'

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बाद में 2011 इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संपादकों के साथ एक साक्षात्कार में पूर्व प्रधानमंत्री ने, राजा के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाने के लिए 'गठबंधन की मजबूरियों' की आड़ ली और साफ तौर से इनकार किया कि उनको 'पहले आओ, पहले पाओ' सिद्धांत की जानकारी थी.

मनमोहन ने बातचीत के दौरान कहा, 'किसने लाइसेंस पाया… पहले आओ, पहले पाओ स्कीम कैसे लागू की गई… इस पर मुझसे कभी चर्चा नहीं की गई, ना ही यह मामला मेरे सामने कैबिनेट में लाया गया. यह पूरी तरह टेलीकॉम मंत्री का फैसला था.' इससे खारिज कर देने का ऐसा सत्याभास मिलता है, जिसे मनमोहन अपने कृत्य (या अकृत्य) की आलोचना को कुंद करने के लिए अब तक आवरण के तौर पर करते थे. यह मुमकिन है कि पूर्व प्रधानमंत्री द्वारा ‘पहले आओ, पहले पाओ’ प्रक्रिया से अनभिज्ञता जताने में उन्होंने पूरा सच नहीं बोला हो, जैसा कि मीडिया में बताया गया था.

साल 2013 द हिंदू में शालिनी सिंह ने लिखा, 'पीएमओ की फाइल संख्या 180/31/C/26/OS.ESI, Vol. IV से अब तक अनदेखे दस्तावेजों का एक पुलिंदा निकल रहा है कि प्रधानमंत्री ने 26 दिसंबर को ए.राजा द्वारा पहले आओ पहले पाओ नीति में बदलाव के बारे में लिखित सूचना प्राप्त होने के बाद, 29 दिसंबर 2007 को निर्देश दिया था कि पत्र का 'प्राथमिकता से परीक्षण' किया जाए.'

manmohan singh

'पीएमओ ले रहा था फॉलोअप'

इनकार करने के बचाव की राजा ने कस के खबर ली है. उनकी किताब के सार (जिसकी एक प्रति सीएनएन-न्यूज18 के पास है) ने मनमोहन के इस दावे को तार-तार कर दिया है कि उन्हें अंधेरे में रखा गया. डीएमके नेता का दावा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री से 'कई मुलाकातें' कीं और पीएमओ 'इस मामले की निगरानी कर रहा था और फॉलोअप ले रहा था, जिससे यह आरोप झूठा साबित होता है कि प्रधानमंत्री को बरगलाया गया या उन्हें अंधेरे में रखा गया.' पूर्व टेलीकॉम मंत्री यह भी शिकायत करते हैं कि 'हमेशा टेलीकॉम मंत्रालय के सभी फैसलों में शामिल होने के बाद भी प्रधानमंत्री' कभी भी उनकी मदद को आगे नहीं आए. राजा की किताब में कुछ अन्य खुलासे हैं-

'2 नवंबर 2007, को मैंने विभाग में 2जी लाइसेंसिंग/स्पेक्ट्रम से जुड़ी घटनाओं और फैसलों से अवगत कराने के लिए प्रधानमंत्री (मनमोहन सिंह) को पत्र लिखा.' (पेज- 70)

'बाद में नवंबर माह में मैंने पत्रों में वर्णित विषयों और मौजूदा नियम और विनियमों पर आगे चर्चा करने के लिए प्रधानमंत्री से मुलाकात की.' (पेज- 74)

'विभाग की फाइल में दर्ज टिप्पणियों को उद्धृत करते हुए मैंने उनको हर बात विस्तार से समझाई. मैंने इस बात की तरफ उनका ध्यान खींचा कि ट्राई द्वारा प्रस्तावित ग्राहक आधार बढ़ाने का मापदंड सीओएआई (सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया) द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर आधारित था.' (पेज- 74)

'प्रधानमंत्री ने मुझे बढ़े हुए ग्राहक आधार मापदंड के बारे में और समझाने को कहा. प्रधानमंत्री ने आश्चर्य जताया कि उन्हें बार-बार गलत सूचना दी गई कि स्पेक्ट्रम उपलब्ध नहीं है.' (पेज 74)

'प्रधानमंत्री ने अपनी कुर्सी पर पहलू बदला, सवालिया निगाहों से मेरी तरफ देखा और पूछा, 'क्या ऐसा है? मुझे बताया गया है कि टेलीकॉम सेक्टर के विकास में रुकावट की वजह स्पेक्ट्रम की उपलब्धता नहीं होना है… यह कैसे मुमकिन है कि इतने सारे लोगों को बांटने के लिए इतना ढेर सारा स्पेक्ट्रम उपलब्ध है?' (पेज75)

'मेरी सफाई को ध्यान और धैर्य से सुनने के बाद प्रधानमंत्री ने मुझे बताया कि उनका पत्र मंत्रालय में हो रही गड़बड़ियों के बारे में प्रेस में छप रही खबरों से प्रभावित होकर लिखा गया था. मुझे अपने पत्रों में बताई गई प्रक्रिया पर आगे बढ़ने में उनकी सहमति मिल गई.' (पेज- 77)

'पत्रों को देखने के बाद पीएम ने मुझे एक अच्छा सुझाव दिया, 'आपकी कोशिशों में कोई गलती नहीं है, और आपके पास अपने हर कदम का कानूनी औचित्य है.' (पेज 85)

अंत की कुछ लाइनों को विस्तार देने की जरूरत है. अगर मनमोहन संतुष्ट थे कि राजा ने 'कुछ गलत नहीं' किया और यह कि टेलीकॉम मंत्री का कदम 'कानूनन सही' (जैसा कि डीएमके नेता ने अपनी किताब में दावा किया है) था, तो पूर्व प्रधानमंत्री ने 2011 में पत्रकारों से ऐसा क्यों कहा था कि उन पर यूपीए-2 में राजा को टेलीकॉम मंत्री बनाए रखने का दबाव था क्योंकि 'गठबंधन सरकार में साझीदार दलों के नेताओं की पसंद को स्वीकार करना होता है ?'

a raja

ए. राजा ने जाहिर की है कड़वाहट

वस्तुतः ऐसा लगता है कि अगर मनमोहन सीएजी रिपोर्ट, विपक्ष के आरोपों और मीडिया के दबाव से उठे राजनीतिक तूफान का सामना कर पाने में नाकाम रहे और राजा को मंझधार में छोड़ दिया. डीएमके नेता ने मनमोहन के बर्ताव पर अपनी कड़वाहट जाहिर की है. वह लिखते हैं: 'जबकि सरकार के अंगों ने (सीवीसी, सीबीआई, जेपीसी, सुप्रीम कोर्ट) मेरी बात सुनने से इनकार दिया था, मेरे पूरी तरह न्यायोचित कदमों का बचाव करने में डॉ. मनमोहन सिंह की प्रकट खामोशी से मुझे ऐसा लगा जैसे पूरे देश की सामूहिक अंतरात्मा खामोश हो गई थी.'

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यह देखना रोचक है कि, जबकि स्पेक्ट्रम आवंटन प्रक्रिया में स्पेशल कोर्ट ने राजा को सभी गड़बड़ियों के आरोप से बरी कर दिया है, पूर्व प्रधानमंत्री अब भी अपने पूर्व मंत्री का समर्थन करने या उनको पद छोड़ने के लिए बाध्य करने के लिए माफी मांगने के लिए खुद को तैयार नहीं कर पा रहे हैं.

जाहिर तौर पर राजा अदालत के फैसले से अपना पक्ष साबित हुआ मान रहे हैं और मनमोहन की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति से अपनी ईमानदारी की बहाली चाहते हैं. हालांकि बरी होने के बाद मनमोहन को लिखे उनके आधिकारिक पत्र में संयमित और सतर्क रुख अपनाया गया है, राजा लिखते हैं: 'मैं उन बाध्यताओं को समझता हूं जिन्होंने आपको सार्वजनिक रूप से मेरा समर्थन करने से रोका. आज मैं सही साबित हुआ हूं. आशा है कि आप स्वीकार करेंगे कि मैं हमेशा- कुछ वरिष्ठ कैबिनेट सहयोगियों के उलट- आपके प्रति वफादार और ईमानदार बना रहा- और सुनिश्चित किया कि आपको मुकदमे की कार्यवाही के दौरान निजी शर्मिंदगी का सामना ना करना हो…अब जबकि 2जी के बारे में सच सबके सामने आ गया है तो शायद आप भी मेरे समर्थन नें आगे आएं, जो कि आप पहले नहीं कर सके थे.'

इसके जवाब में मनमोहन सिंह इतना ही लिख सके, 'आपके पत्र के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया.. मैं बहुत खुश हूं कि आप 2जी मामले में बरी हो कर निकले. आप और आपके परिवार ने इस प्रक्रिया में बहुत कुछ सहा, लेकिन सच की जीत से आपके सभी मित्रों को राहत मिली है.'

अगर कांग्रेस सहमत है कि 2जी में 'ना कोई घोटाला' और 'ना कोई अवैधानिकता' थी तो मनमोहन सार्वजनिक रूप से राजा के समर्थन में क्यों नहीं सामने आते, जैसा कि डीएमके नेता ने ख्वाहिश जताई है? शायद इसकी वजह है कि मनमोहन अपनी स्थिति की तार्किक मुश्किल के जाल में फंसने से बचना चाहते हैं. राजा के कदमों के समर्थन और स्वीकारोक्ति से वह झूठ सामने आ जाएगा, जो उन्होंने बार-बार बोला कि टेलीकॉम मंत्रालय के कदमों से उनका 'कोई संबंध नहीं था.'

राजा को पद छोड़ने के लिए कहने पर माफी मांगना राजनीतिक रूप से अविवेकपूर्ण होगा, क्योंकि कांग्रेस दावा करती है कि 'कोई घोटाला हुआ ही नहीं था.' इससे वह आरोप सच साबित हो जाएगा कि मनमोहन 'कमजोर पीएम' थे.

अंत में हम मनमोहन की ईमानदारी के बारे में एक शहरी मिथक के साथ खड़े हैं. हालांकि नतीजा निकालना मुश्किल नहीं है.

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