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राजनीति के ‘ग्रेट सरवाइवर’ हैं मनमोहन सिंह

राजनीति में मनमोहन सिंह को ‘ग्रेट सरवाइवर’ ही माना जाएगा.

Updated On: Nov 27, 2016 07:26 AM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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राजनीति के ‘ग्रेट सरवाइवर’ हैं मनमोहन सिंह

‘राजनेता कींस की तुलना अर्थशास्त्री प्रोफेसर कींस से नहीं की जा सकती है.’ अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कींस के आलोचक उनके बारे मे अक्सर ये कहते थे. ऐसा माना जाता है कि कींस ने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को एक बार नहीं बल्कि दो बार मुश्किल दौर से उबारा था.

मनमोहन सिंह ने राज्य सभा में नोटबंदी पर बहस में हिस्सा लेते हुए कींस का जिक्र किया. कींस का जिक्र आते ही लगा कि जैसे प्रोफेसर सिंह उम्मीदें बढ़ गईं. लगा कि वो नोटबंदी के पीछे के अर्थशास्त्र पर विस्तार से अपनी बात रखेंगे. लेकिन मनमोहन सिंह ने निराश किया. उन्होंने ब्रिटेन के इस महान अर्थशास्त्री के राजनीतिक पहलू का जिक्र किया और कहा ‘हम में से किसी ने कल नहीं देखा’.

अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को भी राजनेता मनमोहन से ज्यादा तवज्जों शायद इसीलिए दी जाती थी. सदन में भाषण खत्म होते-होते मनमोहन  10 जनपथ के कारिंदे से ज्यादा और कुछ नहीं नजर आए. अपने भाषण में भी उनकी यह असमंजस साफ नजर आया. उन्होंने नोटबंद का विरोध तो नहीं किया लेकिन इसे लूट का संगठित तरीका बता दिया.

मनमोहन सिंह अपने कैरियर के दौरान बड़े पदों पर रहे हैं. वो भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे, योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे और वित्त मंत्री रहे. यही नहीं, नरेंद्र मोदी से ठीक पहले वो देश के प्रधानमंत्री थे. मनमोहन सिंह जवाहर लाल नेहरु और इंदिरा गांधी के बाद लगातार दस साल देश के प्रधानमंत्री रहे.

ऐसे में उनसे उम्मीद की जा रही थी कि वो सरकार की नीति, खास कर उसका आर्थिक पक्ष देश के सामने रखेंगे. और एक विशेषज्ञ के तौर पर इसकी  आलोचनात्मक समीक्षा करेंगे. लेकिन अफसोस कि मनमोहन सिंह ने वही राग अलापा जो अरविंद केजरीवाल, शरद यादव, रामगोपाल और ममता बनर्जी जैसे क्षेत्रीय नेताओं ने छेड़ा था.

अपेक्षा पर खरे नहीं

इसमें कोई दोराय नहीं है कि नोटबंदी से आम आदमी को काफी तकलीफ हुई है और उनमें मन में इसे लेकर नाराजगी भी है. पहली नजर में यह साफ है कि इसे बहुत कम तैयारी के साथ लागू किया गया है.

Manmohan Singh

असंगठित क्षेत्र में तो नोटबंदी की वजह से हाहाकार मच गया है. लाखों की मजदूरी मारी गई है. ये अब वापस अपने शहर, अपने गांव लौटने को मजबूर हो गए हैं. स्वेदेशी आंदोलन से जुड़े विचारक गोविंदाचार्य के की माने तो पंजाब से बिहार जाने वाले ट्रेनों में इन दिनों पैर रखने की जगह नहीं मिलेगी.

राजनीति में आरोप प्रत्यारोप चलते रहे हैं. लेकिन मनमोहन सिंह जैसी शख्सियत से सामान्य बहस से उपर के तर्कों की अपेक्षा की जाती है. मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री से नोटबंदी के असर और इससे उबरने के सुझावों की उम्मीद थी. लेकिन उन्होंने निराश किया. ऐसा लगा जैसे राजनीतिज्ञ मनमोहन ने अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को अपने वश में ले लिया हो.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब मनमोहन सिंह ने अपनी राजनीति के लिए अर्थशास्त्र का सहारा लिया हो. इसके पहले भी प्रधानमंत्री के तौर पर उनकी अंतिम प्रेस कांफ्रेंस याद कीजिए. इसमें उन्होंने एक बात कही कि इतिहास लिखने वाले उनके साथ न्याय करेंगे. (http://www.governancenow.com/news/regular-story/pms-history-lesson-he-last-mughal-modern-politics).

ऐसा कह कर मनमोहन अपने पुराने कामों के दम पर प्रधानमंत्री कार्यकाल की समीक्षा करावाना चाहते थे. जबकि उनके आलोचक उस समय उनके काम के आधार पर समीक्षा कर रहे थे.

इतिहास की हकीकत मनमोहन अर्थशास्त्र की तरह ही बारीकी से समझते हैं. उन्हें इस बात का आभास है कि इतिहास की पड़ताल बिना किसी लाग-लपेट, डर या पक्षपात के होती है. उनका दस साल का कार्यकाल ऐसा था जिसमें प्रधानमंत्री पद की गरिमा पर ही सवालो के घेरे में आ गए थे. यह पद एक परिवार का पूरक हो चुका था.

क्या इस बात से कोई इंकार करेगा कि मनमोहन सिंह का इकबाल साउथ ब्लॉक और 7 आरसीआर के बार कहीं नहीं चलता था? उनके मंत्रीमंडल में मनमौजी मंत्रियों की कोई कमी नहीं थी. 2जी और कोयला घोटाला सत्ता के कई केंद्र उभरने का नतीजा थे.

अपना पतन देखते रहे

मनमोहन सिंह के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि अमेरिका के साथ परमाणु समझौता ही माना जाएगा. लेकिन इसे भी राजनेता के तौर पर उनके पतन की शुरुआत की तरह देखा जाएगा. इसी समय संसद मे वोट के बदले नोट कांड हुआ. सदन में जब नोट लहराए जा रहे थे तब मनमोहन मूक दर्शक बने देख रहे थे. उनके चेहरे पर शिकन तक महूसस नहीं हुई.

ManmohanSingh_NarendraModi

सौजन्य: पीटीआई

यह कहना गलत नहीं होगा कि मनमोहन सिहं ने प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी एक नौकरशाह की तरह निभाई. यही वजह थी की वो कांग्रेसी संस्कृति में आसानी आत्मसात हो पाए.

रिचर्ड डेवनपोर्ट-हाइंस की किताब ’यूनिवर्सल मैन, द सेवन लाइव्स ऑफ जॉन मेनार्ड कींस’ में कींस ने महान अर्थशास्त्री मार्शल के बारे में बताया  है:

‘इस महान अर्थशास्त्री के पास अविलक्षण प्रतिभा होगी. इस स्तर तक पहुंचने के लिए आपको इनमें कई कलाओं का समावेश एक साथ पाया जाता है. कींस अर्थशास्त्री के साथ साथ गणितज्ञ, इतिहासकार, दर्शनशास्त्री और राजनीतिज्ञ हैं. प्रतिकों को समझ कर उन्हें शब्द दे सकते हैं. वे सामान्य तरीके से असामान्य और ठोस निष्कर्ष एक ही समय में निकाल लेते हैं. वर्तमान को इतिहास के आधार पर भविष्य के लिहाज से समझ लेते हैं. किसी व्यक्ति का व्यवहार या उसकी निष्ठा कींस के परे नहीं है. वे एक कलाकार की तरह दुनिया नावाकिफ और साफगोई रख सकते हैं. इसके साथ वो एक जमीन से जुड़े नेता भी हो सकते हैं.’

कोई गलतफहमी न पाले. कींस की बात दुनिया के महानतम अर्थशास्त्री मार्शल की मौत के बाद उन्हें याद करते हुए कह रहे थे.

अगर हम इन पैमानों के देखें यहां मनमोहन सिंह फिट बैठते हैं. हालांकि राजनीति में मनमोहन सिंह को ‘ग्रेट सरवाइवर’ ही माना जाएगा.

 

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