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मनमोहन सिंह केवल आधा सच ही बोले

मोदी को घेरने की कोशिश में मनमोहन सिंह कहीं अपने ही रचे चक्रव्यूह में न फंस जाएं.

Updated On: Nov 26, 2016 08:29 AM IST

R JAGANNATHAN

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मनमोहन सिंह केवल आधा सच ही बोले

वैसे तो मनमोहन सिंह कम ही बोलते हैं. जब भी बोलते हैं सुनने लायक होता है. लेकिन गुरुवार को राज्यसभा में उनके भाषण से निराशा हुई.

उनसे ऐसे किसी महान भाषण की उम्मीद तो नही थी. फिर भी गुरुवार को उन्होंने आधा सच कहा.

नोटबंदी के बाद देशभर में अफरातफरी का माहौल है. जगह-जगह पैसों की किल्लत के चलते आम जनता को होने वाली परेशानियों की खबरें आ रही हैं. इसलिए मनमोहन सिंह का नोटबंदी की तैयारी ठीक से करने का आरोप कुछ हद तक जायज है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसका तुरंत हल निकालने की उनकी सलाह तक भी ठीक है. लेकिन जब मनमोहन सिंह नोटबंदी को संगठित और सरकारी लूट कहते हैं, तब हद पार हो जाती है. यहां से राजनीति शुरू हो जाती है.

संगठित और सरकारी लूट का अगर कोई सही नमूना है तो वह 2जी घोटाला, कोयला घोटाला और कॉमनवैल्थ गेम्स घोटाला है. पूर्व प्रधानमंत्री इन संगठित लूट का हिस्सा रहे हैं.

उन्होंने ए राजा को 2जी घोटाला करने दिया. जानबूझकर आंखे मूंदे रखीं. मनमोहन सिंह कुछ वक्त के लिए कोयला मंत्री भी थे. इसके बावजूद कोयला घोटाला हुआ.

विकास दर आंकलन गलत

सकल घरेलू उत्पाद में दो प्रतिशत की गिरावट का आंकलन भी ठीक नहीं है. चालू वित्त वर्ष खत्म होते-होते इसमें बदलाव की उम्मीद है. अर्थव्यवस्था पर भविष्यवाणी करने वाली दुनिया की बड़ी एजेंसियां मनमोहन सिंह से इत्तेफाक नहीं रखतीं.

गोल्डमैन सैक्स जीडीपी में 1.1 प्रतिशत की गिरावट देख रही है. केयर रेटिंग 0.5-0.3 प्रतिशत, एमके ग्लोबल 0.9, इक्रा 0.4 और आईसीआईसीआई सेक्योरिटीज ने जीडीपी में 0.4 प्रतिशत गिरावट की आशंका जताई है.

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सौजन्य: पीटीआई

केवल बारिंग एंबिट कैपिटल की भविष्यवाणी पूर्व प्रधानमंत्री के दावे से मेल खाती है. बारिंग एंबिट कैपिटल ने 3.3 प्रतिशत गिरावट की आशंका जताई है. हालांकि यह आकलन करने में बारिंग ने गलत तरीका अपनाया था.

मनमोहन सिंह ने आगे आशंका जताई कि नोटबंदी का असर लोगों की मानसिकता पर नकारात्मक पड़ेगा. उनका दावा है कि इससे आम आदमी का देश की मुद्रा और बैंकिंग व्यवस्था से भरोसा उठ जाएगा. उन्होंने प्रधानमंत्री से सवाल किया:’ आप मुझे ऐसे किसी देश का नाम बताइये जहां लोगों को बैंकों में पैसा जमा करने कि लिए तो कहा गया लेकिन उन्हें नोटबंदी के नाम पर अपना ही पैसा निकालने नहीं दिया गया हो....?’

आपके दौर में अधिक नुकसान

यूपीए-2 के दौरान जब महंगाई दर छह फीसद के ऊपर जा रही थी तब मनमोहन सिंह सरकार लगातार नए नोट छाप रही थी. ऐसा करने से मुद्रा का अवमूल्यन होता है और व्यवस्था में भ्रष्टाचार का चलन बढ़ता है. पूर्व प्रधानमंत्री का नोटबंदी और पुराने नोटो को बदलने से बैंकों की साख कमजोर होने के आरोप पर सवाल खड़े हो सकते हैं.

मनमोहन सिंह को हर्षद मेहता कांड भी याद दिलाए जाने की जरुरत है. भारतीय बैंकिंग व्यवस्था का यह अपने तरह का सबसे बड़ा घोटाला था. स्टॉक एक्सचेंज में जब यह घोटाला हुआ था तब 1992 में मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री थे. हर्षद मेहता ने खुलेआम बैंको को लूट कर स्टॉक एक्सचेंज से रातों रात लाखों करोड़ वारे न्यारे किए थे.

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सौजन्य: पीटीआई

जहां तक बात ग्राहकों को अपना पैसा निकालने से रोकने का सवाल है, तो बैंक कभी भी ऐसा कर सकते हैं. अभी भी बैंक एक दिन में निश्चित नकद निकालने की ही अनुमति देते हैं. एटीएम से भी एक दिन में तय मात्रा में ही पैसे निकाले जा सकते हैं. और जब बैंक विफल होते हैं तब भी नकदी पर रोक लगती है.

आपातकाल से आपत्ति क्यों नहीं

आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने भी लोगों के खाते सील करवा दिए थे. ग्राहकों को अपने एकाउंट से पैसे निकालने का हक नही था. आज तो फिर भी तय सीमा में पैसे निकालने की इजाजत सरकार ने दे रखी है. मनमोहन सिंह को आपातकाल से परेशानी नहीं है तो फिर उन्हें इस नियम से परेशानी क्यों है.

मनमोहन सिंह ने ठीक कहा कि इस तरह की रोक आपातकाल के दौरान लगाई जाती है या फिर जब बैंकिंग व्यवस्था धराशाई हो जाए. तो क्या नीतिगत बदलाव के समय ऐसे नियम बनाना तर्कसंगत नहीं है?

हालात सामान्य करने के लिए पीएम मोदी ने आम जनता से 50 दिन मांगे. इसे मनमोहन सिंह ने जायज ठहराया. लेकिन उनकी यह बात भी बिलकुल सही है कि इस समय गरीब पर अत्याचार करने जैसा है. उन्होंने अर्थशास्त्री कींस का उल्लेख करते हुए कहा कि कल किसी ने नहीं देखा इसलिए आज मायने रखता है. राजनीति में आज और ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है.

NarendraModi

सौजन्य: पीटीआई

बहस के लिए पूर्व प्रधानमंत्री के भाषण में कुछ रोचक बातें थी. लेकिन उनके भाषण में पूर्व वित्त मंत्री या रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर की झलक नही दिखी.

उनने भाषण में दमदार तर्कों की कमी थी. नरेंद्र मोदी को घेरने की कोशिश में मनमोहन सिंह कहीं अपने ही रचे चक्रव्यूह में न फंस जाएं.

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