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मनमोहन ‘मौन’ ही बेहतर हैं

हजारों सवालों से अच्छी है मेरी खामोशी, ना जाने कितने सवालों की आबरू रखी

Updated On: Nov 27, 2016 08:17 AM IST

Sanjay Singh

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मनमोहन ‘मौन’ ही बेहतर हैं

8 नवंबर को सरकार के नोट बैन के एलान के बाद एक दोस्त ने मुझे एक मैसेज फॉरवर्ड किया. उसमें लिखा था, 'कुछ भी कहो भाइयों, मनमोहन सिंह देवता आदमी (प्रधानमंत्री) था'. इस मैसेज से एक बाद तो साफ थी कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के राज में आपको कुछ भी करने की आजादी थी. फिर चाहे कोई काली करतूत हो या गैरकानूनी काम.

मनमोहन की अर्थशास्त्र की डिग्री और राजनैतिक तजुर्बे ने उन्हें ये कहने से हमेशा रोका कि न खाऊंगा न खाने दूंगा. इसीलिए वो हमेशा हर तरफ हो रहे गलत कामों से आंखें मूंदे रहे. किसी भी गलत काम को होने से रोकने की कोशिश नहीं की. घोटाले पर घोटाले होते रहे. मगर मनमोहन मौन रहे. उनकी नजर में तो 2008 में उनकी सरकार नोट फॉर वोट घोटाले से नहीं बची थी, बल्कि उसे तो भगवान ने बचा लिया था.

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अगर कभी किसी ने मनमोहन सिंह से सवाल किया भी कि इन घोटालों पर घोटालों के लिए जिम्मेदार कौन है, तो, वो उसकी जिम्मेदार गठबंधन की मजबूरियों पर डाल देते. और अगर चौतरफा दबाव पड़ने लगता. जैसे सीएजी की रिपोर्ट में कॉमनवेल्थ घोटाला, कोयला घोटाला और दूसरे घोटालों की तरफ उंगली उठी तो मनमोहन सिंह ने एक शेर पढ़ा:

‘हजारों सवालों से अच्छी है मेरी खामोशी, ना जाने कितने सवालों की आबरू रखी’.

इस शेर की आड़ में उन्होंने खुद को छुपा लिया. इस तरीके से मनमोहन एक देवता बने रहे. उनके समर्थक ये जानते थे कि वो हर पाप के लिए माफ कर देंगे.

मौन रहकर किसकी आबरु बचाई

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Photo: Getty Images

ये देखना दिलचस्प है कि आज कुछ लोगों को मनमोहन एक अच्छे अर्थशास्त्री, काबिल प्रशासक, समझदार राजनेता और शानदार वक्ता दिख रहे हैं. लेकिन वो शायद भूल गए कि मनमोहन सिंह अपने दस साल के राज में देश के सबसे बड़े लूट-राज की सदारत करने वाले प्रधानमंत्री थे. उन्हें शायद ये भी याद नहीं कि जनता ने उनकी इस करतूत की सजा उन्हें शर्मनाक हार के तौर पर दी थी, जब मनमोहन की पार्टी के महज 44 सांसद चुनकर आ सके थे.

मनमोहन अपने दस साल के राज में प्रधानमंत्री तो थे, मगर, उनके पास कोई ताकत नहीं थी, कोई अधिकार नहीं था. इसीलिए उनका नाम ‘मौनमोहन’ पड़ गया था. वो तो उस कुर्सी से चिपक गए थे, जो उन्हें दस जनपथ की कृपा से मिल गई थी.

पद की सुविधाओं के एवज में वो हमेशा गांधी परिवार के प्रति अपनी वफादारी दिखाते रहे. फिर चाहे वो खामोश रहे हों, या कुछ बोला हो, देखा-सुना हो या अपने आस-पास मची लूट से नावाकिफ रहे हों.

इसीलिए जब नोट बंदी को लेकर ग़ुलाम नबी आज़ाद, आनंद शर्मा, सत्यव्रत चतुर्वेदी जैसे कांग्रेसी नेताओं के अलावा शरद यादव, नरेश अग्रवाल, डेरेक ओ ब्रायन और सीताराम येचुरी जैसे दूसरी पार्टी के नेताओं ने कहा कि मनमोहन सिंह को बोलने का मौका मिलना चाहिए, तो देश अचंभे में पड़ गया.

लोग सोच में पड़ गए कि मनमोहन अगर बोलेंगे तो क्या बोलेंगे? हालांकि सबको उम्मीद यही थी कि वो कांग्रेस में अपनी आका के मन की बात ही संसद में कहेंगे. यहां ये याद रखने वाली बात है कि मनमोहन को हमेशा ओवररेटेड अर्थशास्त्री माना गया. साथ ही उन्हें हमेशा एक राजनेता के तौर पर कम करके आंका गया.

अपमान सहते रहें, उफ्फ न करें

मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में अपने भाषण की शुरुआत अच्छी की. उन्होंने कहा कि, ‘पीएम मोदी कहते रहे हैं कि काले धन पर चोट के लिए, नकली नोटों का कारोबार रोकने के लिए, नक्सलवाद और आतंकवाद की रोकथाम के लिए नोट बैन जरूरी है. मैं उनकी बात से असहमत नहीं हूं’. लेकिन इसके बाद मनमोहन ने भाषण का गियर बदला और जता दिया कि वो ऐसे राजनेता हैं जिन्हें हर हाल में अपनी चमड़ी बचाना आता है.

ManmohanSingh

Photo: Getty Images

उनके शब्दों पर गौर कीजिए, ‘कुछ लोग कहते हैं कि नोट बैन से थोड़े समय दिक्कत होगी मगर ये आगे चलकर देश का बहुत भला करेगा. मुझे इन बातों से अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड केन्स की याद आती है, जिन्होंने कहा था कि आगे चलकर हम सब मर जाएंगे. इसीलिए जरूरी है कि सरकार को लोगों की दिक्कत पर ध्यान देना चाहिए, जो रातों-रात नोट बैन से बेहाल हैं’.

मनमोहन सिंह के कहने का मतलब ये था कि किसी भी प्रधानमंत्री को देश के भले के लिए कोई बड़ा फ़ैसला नहीं लेना चाहिए. उसे सिर्फ मौजूदा हालात का ख्याल होना चाहिए और हर हाल में प्रधानमंत्री को अपनी कुर्सी बचाने की कोशिश करना चाहिए.

कहने का मतलब ये कि मनमोहन के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यथास्थिति बनाए रखनी चाहिए. उन्हें दूर की नहीं सोचनी चाहिए क्योंकि आगे चलकर वो रहें न रहें. इसलिए दूरंदेशी का कोई फायदा नहीं. सो प्रधानमंत्री मोदी को भी मनमोहन सिंह की तरह सिर्फ इसकी जुगत लगानी चाहिए कि कुर्सी से कैसे चिपके रहें.

मनमोहन सिंह अपने तजुर्बे से ये बातें कर रहे थे. तभी तो वो प्रधानमंत्री बने रहने के लिए अपमान पर अपमान सहते रहे. कभी उनकी पार्टी के साथी तो कभी उनके आका राहुल गांधी मनमोहन की सरकार का अध्यादेश उस वक्त सरेआम फाड़ रहे थे, जब मनमोहन सिंह अमेरिका में वहां के राष्ट्रपति से मिलने वाले थे. मनमोहन के अंदर के राजनेता ने ये सारा अपमान चुपचाप सह लिया. यही नहीं वो राहुल गांधी की तारीफों के पुल बांधते रहे.

और जो मनमोहन सिंह ने नोट बैन के बारे में कहा कि ये आम आदमी की संगठित तरीके से लूट है, तो इस बारे में जितना कम कहा जाए उतना कम है. मनमोहन सिंह के राज में हुए घोटाले खुद ही अपनी कहानी बयां करते हैं.

और जब मनमोहन ने कहा, ‘नोट बैन से हमारे देश के गरीब और कमजोर होंगे, लोगों का करेंसी सिस्टम से भरोसा उठेगा और बैंकिंग से यकीन खत्म हो जाएगा’. तो, उन्हें अपने दिन याद कर लेने चाहिए, जब गद्दें में, दीवारों में और सोफे के अंदर लोग नोट छुपाकर रखते थे.

करारा जवाब मिलेगा

NarendraModi

Photo: Getty Images

वरिष्ठ पत्रकार आर जगन्नाथन ने फ़र्स्ट पोस्ट पर भी लिखा था कि नोटबंदी से लोगों का बैंकिंग सिस्टम से भरोसा उठ जाएगा, इस दावे पर यकीन करना मुश्किल है. यूपीए के राज में जब महंगाई चरम पर थी. लगातार नोट छापे जा रहे थे, वित्तीय घाटा बढ़ रहा था, तब हमारी मुद्रा को ज्यादा नुकसान हुआ था. इसके मुकाबले नोट बैन से भारतीय करेंसी को कम ही नुकसान हुआ है.

मनमोहन को याद करना चाहिए कि कि देश का पहला बड़ा घोटाला उस वक़्त हुआ था जब वो वित्त मंत्री थे. जब हर्षद मेहता ने बैंक के पैसे से शेयर बाजार में लूट मचाई थी.

और जब वो लोगों के पैसे निकालने पर लगी पाबंदियों की बात करते हैं तो ऐसा तो हमेशा ही होता आया है. नोट बैन से पहले भी बैंक, एटीएम से पैसे निकालने की सीमा तय करते थे. बैंकों से पैसे निकालने पर हमेशा कुछ शर्तें लागू होती रही हैं.

मनमोहन सिंह और विपक्ष के दूसरे नेताओं को इस बात का भरोसा होना चाहिए कि जब प्रधानमंत्री मोदी संसद में नोट बैन पर बोलेंगे, तो वो उनके हर आरोप और सलाह का मुंहतोड़ जवाब देंगे.

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