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मणिपुर में नगाओं के साथ संबंधों पर 'मेईती' वोटर परेशान, कांग्रेस को फायदा मुमकिन

अगर इबोबी सिंह एक बार और चुनाव जीत जाते हैं तो चौथी बार मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड बना लेंगे.

Updated On: Mar 03, 2017 05:33 PM IST

Seema Guha

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मणिपुर में नगाओं के साथ संबंधों पर 'मेईती' वोटर परेशान, कांग्रेस को फायदा मुमकिन

असम में पिछले साल शानदार चुनावी जीत के बाद बीजेपी इस बार मणिपुर में सियासी उलट-फेर की उम्मीद लगाए हुए है. उत्तर-पूर्व में मणिपुर इकलौता ऐसा राज्य है जहां कांग्रेस की सरकार है. एक तरह से कहें तो मणिपुर उत्तर-पूर्व में कांग्रेस का आखिरी किला है.

मणिपुर में चुनाव 4 और 8 मार्च को होना है. यहां पिछले तीन चुनावों से ओकराम इबोबी सिंह चुनाव जीतकर राज कर रहे हैं बीजेपी को लगता है कि उन्हें सत्ता से हटाने का ये सुनहरा मौका है.

ऐसा इसलिए भी कि मणिपुर के मेइती जनजाति के लोग अधिकतर हिंदू हैं. 2014 के चुनावों से देश में बह रही हिंदुत्व की लहर को देखते हुए ऐसी उम्मीद की जा रही है कि मणिपुर के लोगों के लिए बीजेपी पहली पसंद होगी.

मगर मणिपुर में बीजेपी के पक्ष में ऐसा कोई माहौल नहीं दिख रहा है. कांग्रेस यहां बढ़त बनाए हुए है. हालांकि, उसे सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत मिलेगा या नहीं, ये कहना मुश्किल है. इस बार मणिपुर में त्रिशंकु विधानसभा के आसार हैं.

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फिलहाल, इस वक्त कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही बहुमत हासिल करने का दावा कर रहे हैं. हालांकि स्थानीय मुद्दे इन चुनावों में हावी हैं. कांग्रेस से कई नेता शामिल होने के बावजूद, बीजेपी के पास मुख्यमंत्री पद के लिए कोई लोकप्रिय चेहरा नहीं है.

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मणिपुर के इंफाल में एक रैली को संबोधित करते अमित शाह (तस्वीर-पीटीआई)

मोदी की लोकप्रियता

राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काफी लोकप्रिय हैं. उनकी सभाओं में भीड़ भी जुटती है. लेकिन लोगों को ये भी पता है कि वो राज्य में सरकार नहीं चलाएंगे. 60 सदस्यों वाली विधानसभा में पिछली बार बीजेपी के केवल दो विधायक थे. दोनों ही विधायक 2015 के उप चुनाव में जीते थे. मणिपुर में बीजेपी का संगठन भी मजबूत नहीं है.

राज्य के मेईती जनजाति के लोगों को लगता है कि बीजेपी, ईसाई जनजाति के लोगों के साथ है. इसकी वजह है ये है कि पड़ोसी राज्य नगालैंड में राज कर रहा नगा पीपुल्स फ्रंट बीजेपी के साथ है. मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में नगा, कुकी और जोमिया समेत कुछ और छोटी जनजातियों के लोग रहते हैं.

नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड यानी एनएससीएन-इसाक मुइवा (NSCN-IM) लंबे वक्त से मणिपुर के नगा बहुल इलाकों को नागालैंड में मिलाने की मांग करता रहा है

मणिपुर के तंगखुल इलाके में एनएससीएन की काफी मजबूत पकड़ है. केंद्र सरकार और एनएससीएन के बीच बातचीत में ये एक प्रमुख मुद्दा रहा है. एक आजाद नगालैंड की मांग के बदले में एनएससीएन ग्रेटर नगालैंड की मांग उठाता रहा है जिसमें मणिपुर के इलाके भी शामिल हैं. मेईती जनजाति के लोगों को लगता है कि बीजेपी नगाओं की इस मांग को मान सकती है.

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मणिपुर में चुनावी सभा में स्थानीय नेताओं के साथ अमित शाह (तस्वीर-पीटीआई)

समझौते से डर

3 अगस्त 2015 को केंद्र और एनएससीएन के बीच जो समझौता हुआ था, उसे लेकर भी मणिपुर के लोग काफी आशंकित हैं. अभी तक इस समझौते की बातें सार्वजनिक नहीं की गई हैं. कांग्रेस चुनाव में जोरशोर से ये मुद्दा उठा रही है.

हालांकि, गृहमंत्री राजनाथ सिंह से लेकर प्रकाश जावडेकर और दूसरे नेताओं ने मेइती लोगों को ये भरोसा देने की कोशिश की है कि मणिपुर का बंटवारा नहीं होने दिया जाएगा. मगर स्थानीय लोग इस पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं.

स्थानीय राजनीति के जानकार बबलू लोइतोंगबाम कहते हैं, 'इस चुनाव में कांग्रेस आगे है क्योंकि बीजेपी ये नहीं बता पा रही है कि नगा नेताओं के साथ हुआ समझौता छुपाया क्यों जा रहा है. मणिपुर के लोग राज्य के बंटवारे के खिलाफ हैं'.

पिछले साल दिसंबर में इबोबी सिंह ने मणिपुर में नए जिलों की मांग को पूरा किया था. अब राज्य में 9 के बजाय 16 जिले हो गए हैं. इबोबी सिंह का दावा था कि दूर-दराज के इलाकों में प्रशासन सुधारने के लिए ऐसा कदम उठाया गया. लेकिन मणिपुर के नगा इस बात से बेहद खफा हैं.

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यूनाइटेड नगा काउंसिल की अगुवाई में नगा जनजाति के लोग इबोबी सिंह और कांग्रेस पर आरोप लगा रहे हैं कि वो नगा बहुल इलाकों का बंटवारा कर रहे हैं. हालांकि, नए जिले बनाए जाने का असर सिर्फ एक नगा बहुल जिले पर हुआ है.

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इंफाल में पैदल डोर-टू-डोर कैंपेन के दौरान अमित शाह (तस्वीर-पीटीआई)

लेकिन, स्थानीय नगा पीपुल्स फ्रंट ने एनएससीएन-आईएम की की मदद से नेशनल हाइवे ब्लॉक किया हुआ है. मणिपुर, पूर्वोत्तर के तमाम राज्यों की तरह हाइवे से सप्लाई पर निर्भर है. आर्थिक नाकेबंदी की वजह से मणिपुर का बुरा हाल है. नगा लोग पहले भी नाकेबंदी के हथियार का कामयाबी से इस्तेमाल कर चुके हैं. इसी वजह से मेइती जनजाति के लोग नगा लोगों के विरोध में हैं.

मणिपुर में कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला है. मगर नगा पीपुल्स फ्रंट भी 15 पहा़ड़ी सीटों पर चुनाव लड़ रहा है.

इरोम शर्मिला भी मैदान में

मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला भी इस बार चुनाव लड़ रही हैं. वो इससे पहले आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर्स एक्ट को हटाने की मांग को लेकर एक दशक तक भूख हड़ताल करके सुर्खियों में रह चुकी हैं.

बिना किसी संगठन और पैसे के इरोम की लड़ाई एकदम अकेले की लड़ाई है. लेकिन उनका संगठन पीपुल्स रिसर्जेंस ऐंड जस्टिस अलायंस, पांच सीटों पर चुनाव लड़ रहा है. अगर उन्होंने 2016 में अचानक भूख हड़ताल खत्म नहीं की होती, तो उन्हें काफी समर्थन मिल सकता था.

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मणिपुर की आयरन लेडी कही जाने वाली इरोम शर्मिला भी चुनाव मैदान में हैं

मेइती लोगों के वोट हासिल करने के लिए पीएम मोदी ने एक रैली में कहा था कि बीजेपी की सरकार बनते ही आर्थिक नाकेबंदी खत्म हो जाएगी. मुख्यमंत्री इबोबी सिंह ने इस बयान पर कहा कि बीजेपी ने नगा नेताओं के साथ मिलकर जानबूझकर ये आर्थिक नाकेबंदी की है.

हिंदूवादी पार्टी होने के नाते मेइती के बीजेपी के साथ आने की पूरी उम्मीदें हैं. मगर नगाओं के साथ पार्टी के रिश्ते होने के शक के चलते ये जनजाति, बीजेपी से खफा है

यही वजह है कि कांग्रेस को बढ़त मिलने की उम्मीद है.

मणिपुर में 40 सीटें घाटी में और 20 सीटें पहाड़ी इलाकों में हैं. नगा लोगों के बारे में कहा जा रहा है कि वो कांग्रेस के खिलाफ वोट करेंगे. लेकिन वो बीजेपी को वोट देंगे या नगा पीपुल्स फ्रंट को ये कह पाना मुश्किल है.

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बीजेपी के हक में सबसे बड़ी बात ये है कि वो केंद्र में सरकार चला रही है. पूर्वोत्तर के ज्यादातर राज्य उसी पार्टी के साथ होते हैं जो केंद्र की सत्ता में होती है. फिलहाल कांग्रेस की केंद्र की सत्ता में वापसी की किसी को उम्मीद नहीं दिख रही है.

चार और आठ मार्च को जब मणिपुर के वोटर वोट डालने जाएंगे तब शायद उनके दिमाग में ये सब बातें चल रहीं होंगी. लेकिन अगर इबोबी सिंह एक बार और चुनाव जीत जाते हैं तो चौथी बार मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड बना लेंगे.

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