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मणिपुर चुनावः बीजेपी के लिए आखिरी उम्मीद बनकर इंफाल जाएंगे मोदी

मणिपुर राज्य के गठन के बाद यह पहला मौका है जब बीजेपी सत्ता की संभावना के इतने करीब पहुंची है

Updated On: Feb 19, 2017 10:29 AM IST

Mukesh Bhushan

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मणिपुर चुनावः बीजेपी के लिए आखिरी उम्मीद बनकर इंफाल जाएंगे मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 फरवरी को भारतीय जनता पार्टी की आखिरी उम्मीद बनकर ऐतिहासिक कांग्ला फोर्ट की चुनावीसभा को संबोधित करेंगे.

इस बार मणिपुर में उन्हें जितनी गंभीरता से सुना जाएगा उतनी गंभीरता से शायद ही कभी किसी बीजेपी नेता को सुना गया होगा. इससे पहले 19 फरवरी को गृहमंत्री राजनाथ सिंह की चुनावी सभाएं माहौल समझने के काम आएगी. वजह बिलकुल साफ है.

बीजेपी, 11वीं विधानसभा के लिए हो रहे चुनाव में, सत्ता की संभावना के द्वार पर आकर ठिठक-सी गई है. आखिरी उम्मीद मोदी की ‘बाजीगरी’ पर टिकी है. मोदी की चुनावी सभा से क्या बाहर आएगा, इस पर न सिर्फ मणिपुर बल्कि पड़ोसी राज्य भी कान लगाए बैठे हैं.

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महज तीन महीने पहले ऐसी स्थिति नहीं थी. पंद्रह सालों से राज्य की बागडोर संभाले कांग्रेस के मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के शासन से मुक्ति की उम्मीदें परवान चढ़ रही थीं. राज्य के पिछडे़पन के लिए उनके भ्रष्टाचार को जिम्मेदार ठहराया जा रहा था.

तब मोदी और उनकी बीजेपी से कुछ नई उम्मीदें जग रही थीं. इस हिंदू आदिवासी बहुल राज्य में असम चुनाव के परिणाम दोहराए जाने की संभावना व्यक्त की जा रही थी. असम में भी पहली बार बीजेपी के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ है.

तीन माह में बदल गई स्थिति

तीन महीने के भीतर स्थितियां तेजी से बदल गई हैं. इबोबी सिंह के दांव ने अपना असर दिखा दिया है. राज्य सरकार द्वारा सात नए जिलों की घोषणा के बाद पहाड़ों पर रहनेवाले नगा और कुकी समुदायों के साथ-साथ घाटी की मैतेयी आबादी के जातीय ध्रुवीकरण ने कांग्रेस की स्थिति मजबूत कर दी है.

राज्य का बहुसंख्यक वैष्णव आदिवासी मैतेयी समुदाय भी बीजेपी को शक की निगाह से देखने लगा है. मोदी उनकी शंकाओं के समाधान के लिए क्या कहते-करते हैं, बीजेपी का भविष्य इसी पर टिक गया है.

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क्या राज्य की 60 में से 20 सीटें बीजेपी निकाल पाएगी? यदि ऐसा होता है तो इस बात की पूरी संभावना है कि अन्य सहयोगी दलों के साथ मिलकर वह सरकार बना ले. जैसा 2002 में कांग्रेस ने किया था, फिलहाल तो यह दूर की कौड़ी लग रहा है.

पहली बार बीजेपी इतनी मजबूत

मणिपुर राज्य के गठन के बाद यह पहला मौका है जब बीजेपी सत्ता की संभावना के इतने करीब पहुंची है. उसके राजनीतिक विरोधी इबोबी सिंह का यह बयान कि ‘बीजेपी को 10 से कम सीटें मिलेंगी’, उसके लिए तारीफ से कम नहीं है.

इससे यह भी पता चलता है कि पहली बार इबोबी सिंह को इतनी कड़ी टक्कर मिल रही है. पिछले दो चुनावों में तो कांग्रेस को छोड़कर किसी भी पार्टी को दो अंकों में सीटें नहीं मिलीं हैं.

हालांकि इबोबी सिंह ने यह बात बीजेपी को उसकी औकात दिखाने के लिए कही थी. पर, इससे यह तो पता चलता ही है कि पहली बार बीजेपी कितनी मजबूत हो गई है.

इससे पहले 2002 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने चार सीटें जीती थी. तब 46 सीटों पर उसने अपने उम्मीदवार खड़े किए थे. अब तक का यही उसका सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा है.

पिछले तीन विधानसभा चुनावों में जातीय ध्रुवीकरण के कारण ही कांग्रेस चुनाव जीतती रही है. इसी पुराने हथकंडे को इस बार भी आजमाया जा रहा है. करीब 30 से ज्यादा छोटे-बड़े आदिवासी समुदायों वाले इस राज्य में जातीय अस्मिता काफी संवेदनशील मुद्दा रहा है.

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शंकाओं का समाधान कर पाएंगे मोदी?

प्रधानमंत्री मोदी का विकास और भ्रष्टाचारमुक्त शासन का नारा यहां तभी तक कामयाब दिखा जब तक, जातीय अस्मिता के मुद्दे गरमाहट से दूर थे. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, ऐसे मुद्दों को हवा मिल रही है.

पार्टी के लिए चुनाव के नतीजे इसपर निर्भर करेंगे कि मोदी ऐसे मुद्दों की हवा निकाल पाते हैं या नहीं? उन्हें अपने संबोधन में उन शंकाओं का समाधान करना होगा, जिसके कारण बीजेपी संदिग्ध हो गई है.

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1. नगा शांति समझौताः इस बारे में मोदी क्या कहते हैं, इसपर सबकी निगाह रहेगी. ऑल मणिपुर स्टूडेंट यूनियन ने नगा शांति समझौते के बिंदुओं का खुलासा करने के लिए ‘डिस्क्लोजर कैंपेन’ शुरू कर दिया है.

इस संगठन ने ‘मणिपुर की राजनीतिक अस्मिता की रक्षा के लिए’ यह अभियान शुरू किया है. एएमएसयू को यूनाइटेड कमेटी मणिपुर तथा सिविल सोसायटी का भी साथ है.

नगा शांति-समझौते को लेकर मणिपुर में शंका के बादल तभी से मंडराने लगे थे जब 3 अगस्त 2015 को केंद्र सरकार और नगा उग्रवादी संगठन एनएससीएन  के बीच समझौते के प्रारूप पर हस्ताक्षर किया गया था.

राज्य के लोगों को डर है कि एनएससीएन की बहुचर्चित मांग ‘नगालिम’ के निर्माण के लिए कहीं मणिपुर की राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था से छेड़छाड़ न की जाए.

2. आर्थिक नाकेबंदीः यूनाइटेड नगा काउंसिल के आह्वान पर एक नवंबर 2016 से एनएच-2 व 37 पर आर्थिक नाकेबंदी चल रही है. राज्य में सात नए जिलों के गठन से नाराज यूएनसी से यह नाकेबंदी कर रखी है.

राज्य के मतदाता मोदी से यह जानना चाहेंगे कि उन्होंने नाकेबंदी समाप्त करने के लिए यूएनसी पर असरदार दबाव क्यों नहीं बनाया?

यह माना जा रहा है कि यूएनसी को दरअसल एनएससीएन का समर्थन मिला हुआ है. कांग्रेस यही प्रचारित कर रही है कि एनएससीएन से समझौता करनेवाली केंद्र सरकार चाहे तो नाकेबंदी तुरंत खत्म हो सकती है. पर उसे राज्य की कोई चिंता नहीं है.

पिछले दिनो कांग्रेस विधायक दल ने यूएनसी को अवैध घोषित करने के लिए केंद्र को पत्र लिखा था. घाटी के लोग जरूर जानना चाहेंगे कि केंद्र दुविधा में क्यों रहा?

3. इरोम शर्मिला को 36 करोड़ का ऑफरः पीपुल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस एलायंस यानी प्रजा पार्टी की संयोजक इरोम शर्मिला चानू ने पिछले दिनों बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाया था कि उसे 36 करोड़ का ऑफर दिया गया था.

भ्रष्टाचारमुक्त शासन का दावा करनेवाली पार्टी के लिए यह एक बड़ा झटका था. हालांकि बीजेपी के राष्ट्रीय नेताओं ने इस आरोप से इनकार कर दिया है, लेकिन उनपर शायद ही किसी को भरोसा हो.

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आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट को खत्म करने के लिए 16 सालों तक अनशन करने वाली शर्मिला पर ज्यादा भरोसा स्वाभाविक है. लेकिन मोदी कुछ कहेंगे तो बात अलग होगी. शर्मिला मुख्यमंत्री सिंह को उनके गढ़ में चुनौती दे रही हैं.

बीजेपी की रणनीति को ऐसे लगा चूना

दरअसल, म्यांमार के इस सीमावर्ती राज्य में पहाड़ की 20 सीटों और घाटी की 40 सीटों में सेंध लगाने के लिए बीजेपी दो अलग-अलग रणनीति पर चल रही थी. घाटी में हिंदू आदिवासियों के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए वह अपनी स्थिति मजबूत कर रही थी.

बीजेपी के महासचिव व राज्य प्रभारी राम माधव इस रणनीति के साथ सक्रिय थे. दूसरी तरफ ईसाई बहुल पहाड़ी सीटों पर उग्रवादी संगठनों के बीच शांतिवार्ताओं के माध्यम से यह अपनी पहुंच बढ़ा रही थी.

इसके लिए सरकारी तंत्र यूनाइटेड पीपुल्स फ्रंट और कुकी नेशनल आर्गेनाइजेशन की मांगों पर विचार किया जा रहा था. ये दोनों संगठन को राज्य में करीब 20 छोटे-बड़े सक्रिय उग्रवादी संगठनों का अम्ब्रेला आर्गेनाइजेशन माना जाता है.

ताजा राजनीतिक गतिविधियों ने केएनओ को बीजेपी से दूर कर दिया है. नगा और कुकी समुदायों के लंबे खूनी इतिहास का फायदा उठाते हुए कांग्रेस उसे यह बताने में सफल होती दिखती है कि केंद्र की बीजेपी सरकार का झुकाव नगा संगठन की तरफ है. जबकि, राज्य की कांग्रेस सरकार कुकी बहुल इलाके को नगा प्रभाव से अलग रखने के लिए नए जिले का गठन कर उसके करीब पहुंच गई है.

मैतेयी समुदाय के साथ भी कुकियों का अच्छा संबंध नहीं रहा है. इसलिए चुनाव में या इसके बाद इस समुदाय की क्या भूमिका होगी, इसे लेकर स्थिति साफ नहीं है. पहाड़ की 20 सीटों में से 10-12 सीटों पर कुकी समुदाय के वोट निर्णायक हैं. आनेवाले दिनों में कांग्रेस या बीजेपी कोई भी इन्हें ‘लॉलीपॉप’ पकड़ा कर अपने पक्ष में कर सकता है.

क्षेत्रीय दलों की महत्वपूर्ण भूमिका

यदि बीजेपी घाटी में 20 सीटों पर कब्जा कर लेती है तो अन्य 11 विधायकों को अपने पक्ष में करना उसके लिए कोई मुश्किल नहीं है. सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा 31 है. इसके विपरीत यदि बीजेपी 10 सीटों के भीतर सिमट जाती है तो यही बात कांग्रेस के लिए कही जा सकती है.

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पीएम मोदी की मेरठ-रैली में बीजेपी समर्थकों का अंदाज

इन दो राष्ट्रीय दलों के अतिरिक्त क्षेत्रीय दलों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. घाटी में मणिपुर पीपुल्स पार्टी और कुकी इलाकों में नेशनल पीपुल्स पार्टी का अच्छा जनाधार है. नगा आबादीवाली सीटों पर नगा पीपुल्स फ्रंट को कोई चुनौती शायद ही मिले.

पिछले चुनाव में सात सीटें जीतकर मुख्य विपक्ष की भूमिका में रहनेवाली तृणमूल कांग्रेस का भी राज्य में अच्छा वजूद है. इसके राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुकुल राय ने दावा किया है कि यहां किसी को बहुमत नहीं मिलेगा. ऐसे में सरकार गठन में तृणमूल कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका होगी.

हालांकि, ये क्षेत्रीय दल अपने दम पर जादुई आंकड़ा हासिल करने की स्थिति में कभी नहीं आ सकते, क्योंकि इनका प्रभाव सिर्फ अपनी जनजातियों तक ही सीमित हैं. इसलिए चुनाव के बाद किसी राष्ट्रीय दल के साथ हो जाना इनकी राजनैतिक मजबूरी हो जाती है.

चुनाव परिणाम 11 मार्च को आएगा. तभी पता चलेगा कि ऊंट किस करवट पर बैठा है. यहां 4 और 8 मार्च को दो चरणों में चुनाव होना है.

Manipur Election Results 2017

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