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मणिपुर में बीजेपी गुल खिलाएगी या कमल?

तकरीबन 120 दिनों से आर्थिक नाकेबंदी की वजह से सुलगते मणिपुर में चुनाव ने गर्माहट को बढ़ा दिया है

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Mar 02, 2017 10:25 PM IST

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मणिपुर में बीजेपी गुल खिलाएगी या कमल?

आर्थिक नाकेबंदी की हिंसा में झुलसते मणिपुर में 4 मार्च को पहले चरण में 38 सीटों पर मतदान हो रहा है.

तकरीबन 120 दिनों से आर्थिक नाकेबंदी की वजह से सुलगते मणिपुर में चुनाव ने गर्माहट को बढ़ा दिया है.

पंद्रह साल से जमी कांग्रेस के सीएम इकराम इबोबी सिंह इस बार भी कांग्रेस को जिताने के गणित पर जोर लगाए हुए हैं. लेकिन उनकी गणितीय चाल ने ही मणिपुर में  जातियों को जमीन की जंग में झोंक दिया.

राजनीतिक फायदे के लिए के लिये इबोबी सरकार ने 7 नए जिलों के गठन का ऐलान किया. 2 नए जिले नगा बहुल इलाकों में बनाए गए. इन जिलों का गठन कूकी समुदाय के वोट बैंक को देखकर किया गया.

दरअसल मणिपुर में 3 लाख कूकी हैं और ये समुदाय अलग जिले की काफी समय से मांग कर रहा था. इन दो नए जिलों में  विधानसभा की 6 सीटें हैं. इबोबी सरकार की चुनावी नीति है कि जमीन का बंटवारा कर जातियों के एकमुश्त वोट बटोरे जाएं.

इबोबी सरकार ने कूकी और मैतेई समुदाय के वोट पक्के करने के लिए दांव चला. लेकिन जिलों के एलान पर  कूकी और नगा समुदायों के बीच तनाव बढ़ गया.

यूएनसी से जुड़े नगा समूहों का आरोप है कि इबोबी सरकार नगाओं की सहमति या जानकारी के बिना उनकी जमीनें बांट रही है. आर्थिक नाकेबंदी की चपेट में घाटी का वो इलाका आ गया जो कि मैतेई बहुल है.

सदर हिल कांगपोकपी और जिरीबाम जिलों के विरोध में नगा-कुकी और मैतई समूहों के बीच टकराव बढ़ता चला गया. आर्थिक नाकेबंदी ने राज्य की कमर तोड़ कर रख दी.

नेशनल हाइवे 2 और नेशनल हाइवे 37 ब्लॉक होने की वजह से मणिपुर में जरूरी सामान की बेहद किल्लत हो चुकी हैं. पेट्रोल, दूध, राशन और सब्जी की कमी बाजारों में साफ देखी जा रही है.

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नगा-कूकी तनाव का फायदा किसे?

नगा-कूकी तनाव में सीधे तौर पर कांग्रेस को फायदा मिलेगा. जहां एक तरफ उसने कुकी समुदाय को खुश करने की कोशिश की, वहीं कांग्रेस की दूसरी मजबूती मैतेई समुदाय का वोट बेस है. मणिपुर में 63 प्रतिशत मैतेई हैं.

खुद कांग्रेस के सीएम इकराम इबोबी सिंह भी मैतेई समुदाय से हैं. मैतेई समुदाय के 65 फीसदी लोग इंफाल में रहते हैं. मणिपुर की सियासत में पहाड़ी और घाटी का समीकरण हावी रहा है.

इबोबी सरकार पर पहाड़ों के विकास की अनदेखी का आरोप लगता रहा है. इबोबी सरकार पर केवल मैतेई समुदाय के विकास के आरोप लगते रहे हैं. यही एक बड़ी वजह है जिस पर पहाड़ी और घाटी के लोगों के बीच राजनीतिक रस्साकशी जारी है.

विधानसभा की 60 में से 40 सीटें घाटी में हैं जबकि 20 सीटें पहाड़ पर हैं. राज्य की 35 फीसदी नगा-कुकी जनजाति पहाड़ी इलाकों में रहती है. जिलों के ऐलान के जरिए कुकी समुदाय को कांग्रेस ने अपने पाले में खींचने का काम किया है.

कांग्रेस का वर्चस्व पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों से भी समझा जा सकता है. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 60 में से 42 सीटें हासिल की थीं. इस बार भी कांग्रेस का मैतेई और कूकी वोटरों पर जोर है.

केंद्र-नगा शांति समझौते पर कांग्रेस हमलावार क्यों?

लेकिन इस बार कांग्रेस के लिए बीजेपी बड़ी चुनौती बन कर उभरी है. बीजेपी मणिपुर के जातीय समीकरणों को साधने में जुटी हुई है. वहीं राज्य में तकरीबन 125 दिनों से चल रही आर्थिक नाकेबंदी को भी बीजेपी अपने पक्ष में भुनाने में लगी हुई है.

बीजेपी को उम्मीद है कि राज्य की सत्ता विरोधी लहर पर सवार हो कर इबोबी को कुर्सी से उतारा जा सकता है. हाल ही में बीजेपी को इंफाल के म्यूनिसिपल चुनाव में 27 में से 10 सीटें मिली हैं. अब जबकि नगा समुदाय सरकार से नाराज है तो बीजेपी के लिये पहाड़ी का हिस्सा वोट जुटाने के काम आ सकता है.

लेकिन मणिपुर की सियासत का गणित उत्तराखंड की तरह आसानी से सुलझाया नहीं जा सकता. बीजेपी के लिये कांग्रेस ने दूसरी मुश्किल खड़ी कर दी है. साल 2015 में केंद्र सरकार और नगा शांति समझौते को लेकर कांग्रेस ने हमलावर रुख अपनाया है.

कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र-नगा शांति समझौते की बातों को सार्वजनिक न कर केंद्र सरकार राज्य की अखंडता के साथ समझौता कर रही है. दरअसल राज्य में ये हवा बन रही है कि शांति समझौते की आड़ में नगा बहुल इलाकों को अलग नगा राज्य का हिस्सा बनाने पर सहमति बन चुकी है.

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हालांकि बीजेपी ने इसका जोरदार विरोध किया है. गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी साफ किया है कि मणिपुर की अखंडता के साथ कोई समझौता नहीं किया गया है. वहीं पीएम मोदी ने मणिपुर में चुनावी रैली में कांग्रेस पर समझौते के नाम पर दुष्प्रचार करने का आरोप लगाया है.

जबकि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने चुनावी मंच से मांग की है कि केंद्र-नगा शांति समझौते को सार्वजनिक किया जाए. खास बात ये है कि मणिपुर में कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में भी केंद्र-नगा शांति समझौते की बातों को सार्वजनिक करने की मांग की है.

बीजेपी के लिए कितना कारगर होगा सत्ता विरोधी लहर 

वहीं एक दूसरा पक्ष ये भी है कि एनएससीएन-आईएम को यूनाइटेड नगा कौंसिल से जुड़ा हुआ माना जाता है. ऐसे में आर्थिक नाकेबंदी की आंच बीजेपी पर भी आ रही है. कांग्रेस ये साबित करने की कोशिश कर रही है आर्थिक नाकेबंदी के पीछे नगा समूहों को कहीं न कहीं से केंद्र से मदद मिल रही है.

जबकि बीजेपी इस आरोप को सिरे से खारिज कर रही है. लेकिन अभी जो मणिपुर में हालात हैं वो इबोबी सरकार के लिये सत्ता विरोधी लहर से कम नहीं हैं.

बीजेपी भ्रष्टाचारमुक्त और सुशासन की सरकार देने का वादा कर रही है. साथ ही उसके प्रचार में ये भी मुद्दा बेहद खास है कि वो सत्ता में आने पर पहाड़ी और घाटी के बीच रिश्तों को पटरी पर लाने की कोशिश करेगी.

अब देखना ये है कि मणिपुर में मुद्दों पर इबोबी सरकार घिरेगी या फिर जातीय गणित बिठा कर मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी चुनाव जीतने में कामयाब होंगे.

लेकिन आर्थिक नाकेबंदी के चलते आरोपों के कठघरे में फिलहाल इबोबी सरकार दिखाई दे रही है जिसने 7 जिलों का ऐलान कर मणिपुर को अस्थिरता की तरफ झोंक दिया.

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