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सवर्ण आरक्षण के बीच मंडल रणनीति का दाव चलकर बिहार से ऐसे BJP को साफ करेंगे तेजस्वी

लालू यादव के बेटे तेजस्वी आगामी लोकसभा चुनाव के लिए एक नए सामाजिक समीकरण का ताना-बाना बुनने में जुटे हैं. अपनी इस कोशिश में आरजेडी एक बार फिर मंडल दौर का गणित दोहराने में जुटी है

Updated On: Feb 03, 2019 04:18 PM IST

FP Staff

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सवर्ण आरक्षण के बीच मंडल रणनीति का दाव चलकर बिहार से ऐसे BJP को साफ करेंगे तेजस्वी

बिहार विधानसभा चुनाव 2015 में जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस गठबंधन ने बीजेपी को करारी शिकस्त दी थी. आरजेडी सुप्रीमो ने चुनाव अभियान के दौरान आरक्षण को लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान के सहारे बीजेपी पर जमकर प्रहार किया और चुनाव में उसे धूल चटा दी. हालांकि अब लोकसभा चुनाव राज्य का सियासी समीकरण काफी हद तक बदल चुका है. विधानसभा चुनावों में महागठबंधन का चेहरा रहे नीतीश कुमार अब एनडीए में शामिल हो चुके हैं. वहीं लालू यादव चारा घोटाले में पिछले काफी समय से जेल में हैं.

ऐसे में लालू यादव के बेटे तेजस्वी आगामी लोकसभा चुनाव के लिए एक नए सामाजिक समीकरण का ताना-बाना बुनने में जुटे हैं. अपनी इस कोशिश में आरजेडी एक बार फिर मंडल दौर का गणित दोहराने में जुटी है.

न्यूज 18 हिंदी के अनुसार मोदी सरकार द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए 10% आरक्षण के फैसले ने तेजस्वी के तरकश को नया तीर दे दिया. इस आरक्षण बिल पर संसद में हुई चर्चा से मंडल आधारित पार्टियों की इस रणनीति की एक बानगी मिलती है. आरजेडी, आरएलएसपी, समाजवादी पार्टी और अपना दल ने इस बिल का समर्थन करते हुए जातिगत जनगणना की वर्षों पुरानी मांग दोहराई. इन पार्टियों का कहना है कि जातिगत जनगणना से समाज में विभिन्न तबकों की स्थिति का सही अंदाजा मिल पाएगा और उसी हिसाब शिक्षा एवं सरकारी नौकरियों में उनकी संख्या के आधार पर आरक्षण दिया जाए. वहीं आरजेडी अपने बयानों के जरिये पुरजोर ढंग से लोगों को यह संदेश दे रही है कि गरीब सवर्णों को आरक्षण जातिगत आरक्षण खत्म करने की शुरुआत है.

आरजेडी के साथ आ सकती हैं आरएलएसपी और जीतनराम मांझी की पार्टी

आरजेडी बिहार में मुस्लिम- यादव के अपने पुराने वोट बैंक को और विस्तार देते हुए इसमें दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों को भी शामिल करना चाहती है. उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी और जीतनराम मांझी को साथ लाना इसी कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है. आरजेडी आगामी लोकसभा चुनाव को 80-20 फीसदी की लड़ाई बनाना चाहती है. उसकी कोशिश है कि राज्य में 20 फीसदी अगड़ी जातियों के मुकाबले मुस्लिमों, दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों को एकजुट किया जाए.

बीजेपी ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के नतीजे से सीख लेकर अपने कोर वोटर्स यानी सवर्ण को साथ बनाए रखने के लिए सवर्ण आरक्षण कानून लेकर आई है. हालांकि बिहार और यूपी की सियासी जमीन में जातिगत समीकरण थोड़े अलहदा हैं. ऐसे में एक गलत कदम या एक बयान उसकी चुनावी नैया का बंटाधार कर सकता है.

वहीं आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी-जेडीयू की जोड़ी को बिहार में मात देने के लिए आरजेडी और कांग्रेस दोतरफा रणनीति पर चलती दिख रही हैं. एक तरफ आरजेडी सहित मंडल आधारित अन्य पार्टियां सामाजिक न्याय को लेकर आवाज़ बुलंद कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस अगड़ी जातियों से संपर्क साध रही है.

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