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तीसरे मोर्चे की लड़ाई: ममता बनर्जी के वन टू वन फार्मूले में झोल है

जैसे-जैसे चुनाव पास आएंगे राजनैतिक सरगर्मियां बढ़ेगी और सभी दल अपना हित देखते हुए गठबंधन में हिस्सेदार बनेंगे

Updated On: Mar 29, 2018 01:39 PM IST

Aparna Dwivedi

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तीसरे मोर्चे की लड़ाई: ममता बनर्जी के वन टू वन फार्मूले में झोल है
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साल 2019 में लोकसभा चुनाव में बीजेपी को परास्त करने के लिए टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने एक फार्मूला तैयार किया है. बीजेपी के खिलाफ वन टू वन चुनाव लड़ने का फैसला. ममता के इस फार्मूले का एक बेस है- बीजेपी बनाम सब. और इसका नेतृत्व राज्य के हिसाब से होगा. यानी जिस राज्य में बीजेपी के खिलाफ जो पार्टी मजबूत हो, बाकी सभी पार्टी उसका सहयोग करेगी.

तकनीकी रूप से देखा जाए तो वाकई शानदार विचार है. बीजेपी के खिलाफ अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टी बीजेपी का मुकाबला कर रही हैं. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, दिल्ली में आम आदमी पार्टी. यानी जिस-जिस राज्य में जो क्षेत्रीय पार्टी दमदार है उसके नेतृत्व में बीजेपी के खिलाफ चुनाव लड़ा जाएगा. ऐसे में एकजुट विपक्ष के वोट मिलेंगे और वो बीजेपी का मुकाबला करने के लिए काफी होंगे.

ममता के गणित के हिसाब से जो गठबंधन बनाने की बात हो रही है उसका अंकगणित कुछ ऐसे होगा- कि बीजेपी के पास अभी 31 फीसदी वोट हैं बाकी के 69 फीसदी वोट गैर बीजेपी हैं लेकिन बंटे हुए हैं. अगर ये सारे वोट एक साथ ले आया जाए तो बीजेपी को आसानी से हराया जा सकता है. इस पूरे गणित के लिए वो उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और फूलपूर उपचुनाव का उदाहरण देती हैं जहां पर दो धुर विरोधी पार्टियों ने मिलकर सिर्फ बीजेपी को नहीं हराया बल्कि वहां के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उनके गढ़ में जाकर पटखनी दी.

इसके लिए वो यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी मिलीं और इस फार्मूले के तहत उन्हें भी बीजेपी विरोधी फ्रंट में साथ देने का न्यौता दिया. वैसे भी जिन बारह दलों को साथ लाने की कोशिश कर रही हैं उसमें कांग्रेस शामिल हैं. इसके अलावा वो अपनी पार्टी के अलावा एनसीपी, राष्ट्रीय जनता दल, शिवसेना, टीडीपी, बीजू जनता दल, वाम दल, वाई एस आर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, एआईएमआईएम और डीएमके पर नजर है. वैसे तो वो एआईए डीएमके पर भी थी लेकिन जयललिता के जाने के बाद पन्नीरसेल्वम उतने कद्दावर नेता नहीं है और उनका झुकाव बीजेपी की तरफ है.

लेकिन ममता के इस पूरे फार्मूले में झोल है

पहले उत्तर प्रदेश में एकजुट विपक्ष भले ही दो उपचुनाव में साथ आ गए लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसकी तुलना करना गलत होगा. एक कारण ये है कि उपचुनाव और मुख्य चुनाव में अंतर होता है. मुख्य चुनाव में मुद्दे अलग होते हैं. ऐसे में एक उपचुनाव के बलबूते पर इस फार्मूले को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करना संभव नहीं है. इसका उदाहरण भी बहुजन समाजवादी पार्टी की नेता मायावती ने दे दिया. उन्होंने उत्तर प्रदेश में लोकसभा की कैराना उपचुनाव और विधानसभा की नूरपुर सीट पर समाजवादी पार्टी को समर्थन देने से इंकार कर दिया. इसका कारण बताया जा रहा है कि वो जातीय समीकरण समझना चाहती हैं लेकिन साफ है कि वो बिना बात के खतरा मोल नहीं लेना चाहती. अगर एक राज्य में एक महीने के अंदर ही समीकरण बदल जाते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर सहमति कैसे बनेगी?

mamta in delhi

दूसरा कई राज्यों में यही दल एक दूसरे के धुर विरोधी हैं. अभी तक कई सालों तक एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते आ रहे हैं, एक दूसरे के खिलाफ जहर उगलते रहे हैं. और नहीं तो पश्चिम बंगाल का ही उदाहरण ले लें. ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी वामदलों के खिलाफ चुनाव लड़ती रही हैं. कांग्रेस से उनकी एक नाराजगी ये भी थी कि पिछले विधानसभा में उन्होंने वामदलों का साथ दिया. ऐसे में वो अपने कार्यकर्ता को अपने राज्य में ये कैसे राजी करेंगी कि वो वामदलों और कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ें.

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उत्तर प्रदेश के विधानसभा का ही उदाहरण लें तो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने सालों के विरोध के बाद हाथ मिलाया. लेकिन उन्हें उसका नुकसान ही झेलना पड़ा. उत्तर प्रदेश विधानसभा में बीजेपी ने रिकॉर्ड जीत दर्ज की. और तो और समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों के ही वोट प्रतिशत घट गए. दोनों पार्टियों ने बाद में इसका मंथन किया तो पाया कि अगर गठबंधन नहीं होता तो उनको शायद बेहतर सीटें मिलतीं.

क्षेत्रीय पार्टियों की पहुंच सीमित

तीसरा क्षेत्रीय पार्टियों के सामने एक समस्या है. उनकी पहुंच सीमित होती है. जैसे ममता बनर्जी की पार्टी पश्चिम बंगाल तक ही सीमित है, एनसीपी का दमखम महाराष्ट्र में है. इसी तरह बाकी के क्षेत्रीय दल अपने अपने राज्य में सीमित हो जाते हैं. वहां पर भले ही उनकी तूती बोलती है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान क्षेत्रीय दल के रूप में ही होती है. कुछ राज्यों में दो या तीन क्षेत्रीय दल हैं जो एक दूसरे से लड़ते हैं, ऐसे में उन्हें एक मंच पर लाना मुश्किल काम है. अगर आ भी गए तो उस गठबंधन को निभाना और कठिन हैं.

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चौथा विपक्ष के पास कोई कार्यक्रम नहीं है जिसे वह देश के सामने पेश कर सके. नोटबंदी से लेकर जीएसटी पर सरकार की फजीहत होने के बाद भी विपक्ष देश के सामने कोई कार्यक्रम पेश नहीं कर सका. इसके साथ ही तीसरी कमजोरी विपक्षी पार्टियों के काडर से जुड़ी हुई है. बीते समय में सभी विपक्षी पार्टियों का काडर कमजोर ही हुआ है. वहीं, बीजेपी के पास के मजबूत काडर है.

rahul and mamta in pc

तस्वीर: पीटीआई

नेतृत्व पर होगी बहस

पांचवा और सबसे मुश्किल- नेतृत्व का सवाल. कांग्रेस राहुल गांधी को आगे बढ़ाने में लगी हैं लेकिन कई क्षेत्रीय दलों को वो स्वीकार्य नहीं है. वैसे भी कांग्रेस के अधिवेशन में राहुल गांधी ने गठबंधन का जिक्र भी नहीं किया. पार्टी में गठबंधन के सारे प्रयास सोनिया गांधी कर रही हैं. फिर सवालिया निशान तो अभी भी लगा है क्योंकि राहुल गांधी ने अभी तक कोई चुनाव नहीं जीता है. गुजरात में बेहतर प्रदर्शन था लेकिन जीत नहीं है. तो राजनैतिक उपलब्धि तो अभी जीरो है. ऐसे में विपक्ष राहुल गांधी को अपना सर्वमान्य नेता मानने में दिक्कत महसूस कर रहा है. अगर राहुल गांधी वाले कांग्रेस का नेतृत्व नहीं तो फिर कौन? ममता बनर्जी खुद को नेता के रूप में पेश कर सकती हैं लेकिन उनका जनाधार भी पश्चिम बंगाल तक सीमित है. चंद्रबाबू नायडू भले ही मोल-तोल में माहिर हों लेकिन उनका काम करने का तरीके से कांग्रेस समेत सभी बड़ी पार्टियों को परहेज हो सकता है. फिर नाम आता है मायावती या शरद पवार का. उनकी भी वहीं समस्या है सीमित जनाधार.

ऐसे में ममता का ये फार्मूला बैकफायर कर सकता है. वैसे भी कई राज्यों में कांग्रेस और बीजेपी का सीधा मुकाबला है. ऐसे में कांग्रेस को बैकफुट पर रखने के बाद ये गठबंधन काम करेगा कि नहीं ये तो तय नहीं है. वैसे भी एक दो क्षेत्रीय दलों को हटा दिया जाए तो सभी लोग कांग्रेस के साथ बातचीत का रास्ता खोल कर बैठे हैं. जैसे-जैसे चुनाव पास आएंगे राजनैतिक सरगर्मियां बढ़ेगी और सभी दल अपना हित देखते हुए गठबंधन में हिस्सेदार बनेंगे.

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