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ममता का केजरीवाल को समर्थन, तीसरे मोर्चे के नेता के रूप में खुद को पेश करने की कवायद

तृणमूल सुप्रीमो ने कांग्रेस नेतृत्व के उस दावे को भी परोक्ष रूप से चुनौती दे दी है कि विपक्षी एकता को लेकर किसी भी पहल में कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व ही अगुवा की भूमिका में है या रहेगा

Sanjay Singh Updated On: Jun 19, 2018 08:19 AM IST

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ममता का केजरीवाल को समर्थन, तीसरे मोर्चे के नेता के रूप में खुद को पेश करने की कवायद

ममता बनर्जी ने काफी स्मार्ट तरीके से अरविंद केजरीवाल के धरने का इस्तेमाल करते हुए प्रस्तावित 'फेडरल फ्रंट' के नेतृत्व के लिए खुद को आगे ला खड़ा किया है. उन्होंने पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री के धरने के समर्थन में अलग-अलग पार्टियों और विचारधारा के तीन मुख्यमंत्रियों (चंद्रबाबू नायडू, एच डी कुमारस्वामी और पिनराई विजयन) को अपने साथ किया और उसके बाद नीति आयोग की बैठक के मौके पर इन तमाम नेताओं के साथ मिलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने इस मुद्दे को उठाया. इन तमाम कवायदों के जरिए ममता ने तमाम संबंधित धड़ों (विपक्षी कुनबे) , खास तौर पर कांग्रेस को जरूरी संदेश दे दिया है.

कांग्रेस के नेतृत्व को लगातार दे रही हैं चुनौती

पहली बात यह है कि उन्होंने दिल्ली के उप-राज्यपाल अनिल बैजल को चिट्ठी लिखने से पहले और इन मुख्यमंत्रियों (ऊपर जिनका जिक्र किया गया है) द्वारा केजरीवाल के घर जाकर उनकी पत्नी सुनीता से मुलाकात किए जाने के मामले में कांग्रेस नेतृत्व से सलाह-मशवरा नहीं किया. कम से कम सार्वजनिक तौर पर इस बात को लेकर किसी तरह की जानकारी या सूचना नहीं है.

इन तमाम मुख्यमंत्रियों द्वारा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के घर जाकर उनकी पत्नी से मुलाकात के जरिए मोटे तौर पर यह संदेश दिया गया है कि वे और बड़े पैमाने पर जनता दिल्ली के उप-राज्यपाल, केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ लड़ाई में आम आदमी पार्टी और उसकी अगुवाई वाली दिल्ली सरकार के साथ खड़ी है.

ऐसा करने के साथ ही ममता बनर्जी ने कांग्रेस में अपने भरोसे में कमी का प्रस्ताव पेश कर दिया है. साथ ही, तृणमूल सुप्रीमो ने कांग्रेस नेतृत्व के उस दावे को भी परोक्ष रूप से चुनौती दे दी है कि विपक्षी एकता को लेकर किसी भी पहल में कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व ही अगुवा की भूमिका में है या रहेगा.

हकीकत यह है कि कांग्रेस के सबसे नए सहयोगी और कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी ने अपनी आधिकारिक सहयोगी पार्टी (कांग्रेस) के बजाए ममता बनर्जी के साथ खड़े होने का विकल्प चुना. यह बात राहुल गांधी और उनकी टीम के लिए चिंता की बात होनी चाहिए.

New Delhi: West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee, Karnataka CM H D Kumaraswamy, Kerela CM Pinarayi Vijayan and Andhra Pradesh CM N Chandrababu Naidu during a meeting with wife of Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal, Sunita, at her residence, in New Delhi on Saturday, June 16, 2018. (PTI Photo/twitter) (PTI6_16_2018_000202B)

नीति आयोग की बैठक के मौके पर कुमारस्वामी को भी काफी गर्मजोशी के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हाथ मिलाते देखा गया. इस मौके पर वह ममता, नायडू और विजयन के साथ भी दिख रहे थे. इस तस्वीर का अपना अर्थ, अपनी व्याख्या है. जब बैठक शुरू हुई, तो कांग्रेस शासित राज्य का कोई भी मुख्यमंत्री नजर नहीं आ रहा था.

दूसरा संदेश यह है कि दिल्ली में ममता की दो दिनों की सक्रियता ने कांग्रेस के अलग-थलग पड़ने के मामले को सामने लाकर रख दिया है. कांग्रेस की तरफ से जिस महागठबंधन का दावा किया जा रहा है, वह कम से कम फिलहाल तो मुश्किल में नजर आ रहा है.

हालांकि, इस बात में कोई शक नहीं कि केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के खिलाफ इस तरह का रुख अख्यितार करने के लिए कांग्रेस के पास ठोस वजहें हैं, लेकिन खुद को उदारवादी-धर्मनिरपेक्ष बताने वालों ने इस पूरे मामले में उसे खलनायक की तरह पेश किया है. उदारवादी पक्ष की दलील है कि अगर भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस पार्टी कुमारस्वामी के साथ मिलकर उसकी जूनियर सहयोगी की तरह काम कर सकती है, तो दिल्ली में वह केजरीवाल के सहायक की भूमिका क्यों नहीं अदा कर सकती है?

**BEST QUALITY AVAILABLE** New Delhi: Prime Minister Narendra Modi shakes hands with Karnataka CM H D Kumaraswamy, as West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee, Kerela CM Pinarayi Vijayan and Andhra Pradesh CM N Chandrababu Naidu look on during governing council meeting of NITI Aayog, in New Delhi on Sunday, June 17, 2018. (PTI Photo) (PTI6_17_2018_000051B)

सुर्खियां बटोरने के लिए नीति आयोग की बैठक का इस्तेमाल किया

तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ने इस मौके का फायदा उठाया और राष्ट्रीय सुर्खियां बटोरने के लिए नीति आयोग की बैठक और इस मौके के मद्देनजर हुई गतिविधियों का इस्तेमाल किया. ममता बनर्जी ने खुद को इस तरह से पेश किया कि फिलहाल और 2019 में लड़ाई के लिए उनके पास मोदी के खिलाफ बाकी क्षेत्रीय पार्टियों के आला नेताओं को जुटाने की क्षमता है.

इस पूरे घटनाक्रम का जो तीसरा संदेश है, वह शायद शनिवार की शाम और रविवार की दोपहर का सबसे दिलचस्प पहलू था. 'चार मुख्यमंत्रियों' की तस्वीर के फ्रेम में ममता बनर्जी के साथ सीपीएम के दिग्गज नेता और केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन मौजूद थे. सीपीएम के संगठन से जुड़े मौजूदा ढांचे में केरल की लॉबी का ही पार्टी के नीतिगत फैसलों पर सबसे ज्यादा असर है.

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हालांकि, सीपीएम अब भी पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का विरोध कर रही है, लेकिन ममता और विजयन के एक साथ आने के अपने मायने हैं. बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और समाजवादी पार्टी (एसपी) के गठबंधन के दौर में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी)- मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के गठबंधन की संभावना से सीधे तौर पर इनकार नहीं किया जा सकता. अगर ऐसा होता है, तो इससे राज्य (पश्चिम बंगाल) और राज्य के बाहर ममता बनर्जी को अपनी स्थिति और मजबूत करने में मदद मिलेगी.

सीपीएम के साथ पींगे बढ़ाने से भी ममता को परहेज नहीं!

चौथी बात यह है कि सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने बीते रविवार को राजधानी के मंडी हाउस इलाके में आयोजित आप के विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा लिया. यह काफी अहम संदेश है. येचुरी जहां आप और सीपीएम के कार्यकर्ताओं के साथ कड़ी धूप में पसीना बहा रहे थे, वहीं आप नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने एक एसयूवी के ऊपर चढ़कर येचुरी का जिक्र करते हुए इस मामले में समर्थन मुहैया कराने के लिए उनका शुक्रिया अदा किया.

पांचवां यह कि ममता बनर्जी पिछले कुछ वक्त से क्षेत्रीय ताकतों की एकता को लेकर बात कर रही हैं और इस सिलसिले में वह तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस), तेलुगूदेसम पार्टी (टीडीपी), जेडी(एस), आप और अन्य क्षेत्रीय दलों से बात करती रही हैं. हालांकि, वह बड़े पैमाने पर विपक्षी गठबंधन समेत अहम मुद्दों पर कांग्रेस के साथ बातचीत शुरू करने को लेकर अब तक तनिक भी उत्सुक नहीं दिखी हैं. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर यह कहा था कि वह सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर महाभियोग का प्रस्ताव पेश करने के कांग्रेस के फैसले से खिलाफ हैं. इसके अलावा, ममता बनर्जी ने यह भी संकेत दिए थे कि राहुल गांधी के नेतृत्व में उन्हें भरोसा नहीं है.

rahul and mamta in pc

तस्वीर: पीटीआई

सोनिया-राहुल के साथ नहीं बन रही केमिस्ट्री

यहां तक कि एच डी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह के मौके पर बेंगलुरु में बड़े पैमाने पर पेश की गई विपक्षी एकजुटता कार्यक्रम में भी ममता बनर्जी कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व- सोनिया और राहुल गांधी के साथ दिखने के लिए पहल करने के बजाए वहां मौजूद बाकी क्षेत्रीय नेताओं के साथ ज्यादा सहजता के साथ बातचीत कर रही थीं.

दरअसल, इस मौके पर सोनिया गांधी के साथ तस्वीर खिंचाने को लेकर पहल मायावती की तरफ से की गई थी. न तो ममता बनर्जी ने खुद से इसके लिए कोशिश की थी और न ही इस संबंध में सोनिया गांधी ने पहल की थी. राहुल गांधी के साथ उनकी नहीं के बराबर बातचीत हुई थी. खास तौर पर मंच पर कुछ ऐसा ही दिख रहा था. ममता ने नई दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल में राहुल गांधी की तरफ से आयोजित इफ्तार पार्टी में भी हिस्सा नहीं लिया.

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क्या वह मोदी-अमित शाह की अगुवाई वाली बीजेपी के खिलाफ गैर-कांग्रेसी गठबंधन की तलाश कर रही हैं? फिलहाल इसका जवाब तलाश पाना मुश्किल है, लेकिन ममता एक तरह से साफ कर रही हैं कि वह राहुल गांधी की सहायक या जूनियर की भूमिका निभाने को इच्छुक नहीं हैं. 16वीं लोकसभा में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के पास 34 सांसद हैं, जबकि कांग्रेस के पास मूल रूप से 44 सांसद थे.

छठा यह कि सीएनएन-न्यूज 18 की खबर के मुताबिक सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ने नीति आयोग की बैठक के बाद बीते रविवार को ममता बनर्जी के साथ मुलाकात की. कांग्रेस पार्टी ने खास एजेंडे को ध्यान में रखकर इस बैठक का आयोजन किया. राज्यसभा के उपसभापति पद के लिए ममता का समर्थन मांगने के लिए यह मुलाकात की गई थी. राज्यसभा के मौजूदा उपसभापति पी जे कुरियन का राज्यसभा सांसद के तौर पर कार्यकाल खत्म होने के बाद यह पद खाली हो जाएगा. कांग्रेस पार्टी ने उन्हें एक और कार्यकाल के लिए नॉमिनेट नहीं किया है.

जाहिर तौर पर भारतीय जनता पार्टी चाहेगी कि उस पद पर इसी पार्टी का कोई सदस्य काबिज हो. बीजेपी अब ऊपरी सदन में सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन अगर सभी विपक्षी पार्टियां मिलकर बीजेपी के उम्मीदवार का विरोध करें, तो केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के लिए इसमें मुश्किल हो सकती है. ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा में 13 सांसद हैं. कांग्रेस के लिए दुर्भाग्य की बात यह रही कि ममता ने इस मामले में कांग्रेस को समर्थन का आश्वासन नहीं दिया है.

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