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राजस्थान में कांग्रेस के 'हाथ' से हिला बीजेपी का ‘सिंहासन’, महारानी हारीं या जनता जीती?

राज्य की वसुंधरा सरकार के लिए ये झटका साफ इशारा है कि असंतोष की उपजी लहर को विधानसभा चुनाव तक सुनामी बनने से रोका जाए

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Feb 01, 2018 06:02 PM IST

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राजस्थान में कांग्रेस के 'हाथ' से हिला बीजेपी का ‘सिंहासन’, महारानी हारीं या जनता जीती?

जिस वक्त वित्त मंत्री संसद में देश का बजट पेश कर रहे थे उस समय राजस्थान में हुए 3 उपचुनावों के रुझान भी आ रहे थे. देश की नजर बजट पर थी तो राजस्थान में बीजेपी और कांग्रेस की नजर नतीजों पर. इसकी बड़ी वजह सिर्फ सियासी है क्योंकि इन उपचुनावों को विधानसभा चुनाव से पहले सेमीफाइनल की तरह देखा जा रहा था. बजट के बाद नतीजे भी आ गए लेकिन रूझानों ने पहले ही कांग्रेस का 'हाथ' थाम लिया था. तीनों सीटों पर कांग्रेस को यादगार जीत नसीब हुई. वो जीत जो उसके लिए संजीवनी से कम नहीं. राज्य दर राज्य सिमटती कांग्रेस के लिए राजस्थान की 3 सीटों की जीत कांग्रेस के नए अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए तोहफा है तो प्रदेश कांग्रेस सचिन पायलट के पास अपनी पीठ थपथपाने का मौका भी.

बड़ा सवाल ये है कि क्या राजस्थान की सियासत में उपचुनाव के नतीजों से ये समझा जाए कि राज्य में जनता का ‘महारानी’ पर से विश्वास उठ रहा है?

क्या गैंगस्टर आनंदपाल एनकाउंटर विवाद, फिल्म पद्मावत विवाद और पार्टी के भीतर की कलह की वजह से वसुंधरा सरकार को नुकसान हुआ? वजह जो भी हो लेकिन नतीजा तो पार्टी के लिए निराशाजनक है.

सचिन पायलट तीनों सीटें जीतने के बाद मुख्यमंत्री से इस्तीफा भी मांगने लगे हैं. दरअसल इस युवा नेता के जोश के पीछे कई वजहें हैं. अरसे बाद कांग्रेस को बीजेपी से सीटें छीनने का मौका मिला है. गुजरात में इसकी शुरुआत हुई तो अब राजस्थान के रण में ये दिन देखने को मिला. भले ही ये उपचुनावों में मिली जीत है लेकिन उपचुनाव के नतीजों की अहमियत को दरकिनार नहीं किया जा सकता है. इनकी अहमियत तब और बढ़ जाती है जब कोई सत्ताधारी पार्टी अपनी जीती हुई सीटें गंवा दे. भले ही बीजेपी इसे कांग्रेस की तात्कालिक उपलब्धि माने लेकिन कांग्रेस इस जीत की सीढ़ी पर पांव रखकर विधानसभा चुनाव को अगले चुनाव में भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी. इसी साल के आखिर में विधानसभा चुनाव हैं तो अगले साल लोकसभा चुनाव भी होने हैं. कांग्रेस को ऐसी ही संजीवनी की तलाश थी जो अजमेर-अलवर और मंडलगढ़ के मैदान में मिल गई.

PM Modi's rally in Sanand

साल 2014 में मोदी-लहर में बीजेपी ने लोकसभा की सारी सीटें जीत कर इतिहास रचा था. लेकिन कब्जे वाली इन दो सीटों पर मिली हार के बाद बीजेपी को फिक्रमंद होने की जरूत है क्योंकि विधानसभा की सीट भी वो हारी है. जाहिर तौर पर नतीजों से सबक लेते हुए बीजेपी अपनी रणनीति में बदलाव करेगी क्योंकि ऐसा भी नहीं कि उसने इन चुनावों को हल्के में लिया हो. भले ही अलवर की सीट पर बीजेपी के चुनाव प्रचार में ज्यादा जोर नहीं दिखा लेकिन अजमेर की सीट को लेकर बीजपी ने पूरा जोर लगाया था.

पिछले साल अजमेर के बीजेपी सांसद सांवर लाल जाट और अलवर से बीजेपी सांसद चांदनाथ योगी के निधन के बाद ये सीटें खाली हुई थीं. वहीं मंडलगढ़ विधानसभा सीट बीजेपी  विधायक कीर्ति कुमारी के निधन की वजह से खाली हुई थी. बीजेपी ने अजमेर में बिना कोई सियासी रिस्क उठाए सीधे ही सांवर लाल जाट के बेटे रामस्वरूप लांबा को ही अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था. बीजेपी को उम्मीद थी कि पारंपरिक सीट पर सहानुभूति वोट भी साथ देंगे. बीजेपी के सामने कांग्रेस ने रघु शर्मा को उतारा. रघु शर्मा इससे पहले जयपुर से भी लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं. रघु शर्मा राजनीतिक रूप से कद्दावर नेता माने जाते हैं और अजमेर जिले के सावर गांव के निवासी होने की वजह से अजमेर की जनता से उनका भी सीधा कनेक्शन है. इसे देखते हुए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अजमेर में रोड शो के जरिए वोटरों को लुभाने की भरपूर कोशिश की. लेकिन अजमेर की राजनीति ने ऐसी करवट बदली कि बीजेपी के हाथ से उसकी जीती हुई सीट ही निकल गई. उपचुनावों को तभी जनता के मूड के इंडिकेटर के रूप में देखा जाता है.

Chief Minister of Rajasthan Raje and Gujjar leader Bainsla walk back after news conference in Jaipur

यही हाल अलवर सीट पर भी हुआ. अलवर सीट से बीजेपी ने डॉ. जसवंत सिंह यादव को उम्मीदवार बनाया था जो कि वसुंधरा सरकार में श्रम मंत्री हैं. जबकि कांग्रेस ने भी यहां यादव फैक्टर का इस्तेमाल करते हुए डॉ. करण सिंह यादव को मैदान में उतारा है. अलवर लोकसभा में यादवों का ही दबदबा देखा गया है क्योकि यहां तीन लाख यादव वोटर हैं. यहां के चुनावी इतिहास को देखें तो सात बार यादव उम्मीदवार जीता है जबकि 8 बार गैर यादव यहां से चुनाव जीत सका है. यहां मेव समाज, एससी जाट, मीणा, ब्राह्मण, वैश्य, गुर्जर, राजपूत और माली समाज के वोटर हैं. बीजेपी इसी जातिगणित में उलझ कर रह गई.

rahul in somnath

मांडलगढ़ में विधानसभा के उपचुनाव में बीजेपी के शक्ति सिंह हाडा और कांग्रेस के विवेक धाकड़ के बीच कांटे की लड़ाई चली. लेकिन विवेक ही कांग्रेस के लिए धाकड़ साबित हुए. बीजेपी के किले से सीट निकाल लाए. अब पराजय से बीजेपी के माथे पर चिंता की लकीरें खुल कर उभर आई हैं. सत्ताधारी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी. राज्य की वसुंधरा सरकार के लिए ये झटका साफ इशारा है कि असंतोष की उपजी लहर को विधानसभा चुनाव तक सुनामी बनने से रोका जाए. क्योंकि इससे पहले राजस्थान के निकाय उपचुनाव में भी बीजेपी को झटका मिल चुका है. तब कांग्रेस ने चार सीटों पर कब्जा किया था. सीएम वसुंधरा के बेटे दुष्यंत के गढ़ मे ही बीजेपी ने 2 सीटें गंवा दी थीं. जिसके बाद राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने नतीजों को बीजेपी की राज्य में उल्टी गिनती बताया था.

अब उपचुनावो में मिली जीत कांग्रेस को राजस्थान में आने वाले चुनावी समर में कमर कसने का टॉनिक दे गई है. वैसे भी राजस्थान में हर पांच साल में सरकार बदलने का वोटर का रिवाज है. ऐसे में कांग्रेस के पास वापसी का मौका है. लेकिन कांग्रेस को राज्य में चुनावी सियासत के अलावा एक भीतरी रस्साकशी से भी दो चार होना पड़ेगा. राज्य में सचिन पायलट बनाम अशोक गहलोत के बीच महत्वाकांक्षाओं की खींचतान भी है.

गुजरात प्रभारी के तौर पर राज्य के पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने अच्छा प्रदर्शन किया था. जिसके बाद उनका पार्टी के भीतर सियासी कद बढ़ा है. ऐसे में उनकी बढ़ती ताकत युवा नेता सचिन पायलट की सियासी महत्वाकांक्षाओं को झटका दे सकती है. भविष्य में अगर विधानसभा चुनावों में नतीजे कांग्रेस के पक्ष में आए तो सीएम पद को लेकर पार्टी के दो धड़ों में तलवारें खिंच सकती हैं. फिलहाल उपचुनाव में तीनों सीटें जीतने के बाद कांग्रेस के पास अब गहलोत के विकल्प के तौर पर युवा सचिन पायलट सामने हैं.

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