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मराठा आरक्षण: आग फैलेगी तो दूर तलक जाएगी और चपेट में होगी बीजेपी

महाराष्ट्र में जिस तरह के परिदृश्य बन रहे हैं, आने वाले महीनों में वह निश्चित ही राजनीतिक और चुनावी स्वरूप अख्तियार करेंगे

Updated On: Nov 17, 2018 04:50 PM IST

Nilanjan Mukhopadhyay

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मराठा आरक्षण: आग फैलेगी तो दूर तलक जाएगी और चपेट में होगी बीजेपी

महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार एक साथ कई जगहों पर आग के साथ खेल रही है और ये आग सिर्फ महाराष्ट्र तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कहीं पर भी बीजेपी को नुकसान पहुंचाने की क्षमता है. 2014 में जब यह सरकार सत्ता में आई, तभी से एक तरफ जहां विभिन्न समुदाय के लोगों ने आरक्षण के लिए आंदोलन किया, वहीं दूसरी तरफ सामान्य श्रेणी के लोग या जो पहले से ही कोटा सूची में हैं, अपना हिस्सा कम किए जाने को लेकर नाराज होते चले गए.

संघ परिवार इस कठिन परिस्थिति से परिचित है. संघ यह समझ रहा है कि आरक्षण के मुद्दे पर दोनों तरफ के लोगों के बीच निराशा का माहौल है. लोग बहुत सख्ती के साथ इस मुद्दे पर दो हिस्सों में बंटे हुए हैं. आरएसएस ने जब 2015 में आरक्षण नीति की समीक्षा की बात की थी तब उससे सवर्ण जातियों के मन में आशा की किरण जगी थी. उन्हें लगा था कि अब आरक्षण को लेकर एक समीक्षात्मक बहस शुरू होगी. हाल के महीनों में, केसरिया पार्टी सवर्ण जातियों के बीच बढ़ती उदासीनता को लेकर दुविधा में फंसी है.

हाल ही में मोहन भागवत ने अपने कैडर से नोटा के खिलाफ अभियन चलाने की अपील की है ताकि 'उपलब्ध सबसे खराब' चुनने के बजाय 'उपलब्ध सर्वोत्तम' को चुना जा सके. जाहिर है, इस अपील से यह संकेत मिलता है कि संघ को अपने पारंपरिक मतदाताओं का समर्थन खोने की खासी चिंता सता रही है.

निराश सवर्ण

उनकी चिंता इस तथ्य से जाहिर होती है कि सवर्ण या ऊपरी जाति के अधिकांश लोग आरक्षण पर हो रही राजनीति से कितने निराश है. इतना ही नहीं, सवर्ण जाति के बहुत सारे लोगों ने कई राज्यों में ओबीसी के साथ हाथ भी मिला लिया है. सवर्ण जातियों ने यह कदम अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम में संशोधन के विरोध में उठाया हैं.

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प्रदर्शनकारियों के मन में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने को लेकर भी गुस्सा है. वह भी तब जब इस बात के पर्याप्त सबूत मिले हैं कि गैर-दलितों को निशाना बनाने के लिए इस कानून का दुरुपयोग हुआ है. प्रदर्शनकारियों के लिए इस फैसले को पलटने का काम बहुत हद तक तुष्टिकरण की राजनीति का ही एक रूप था.

परंपरागत रूप से ऊपरी जातियों ने बीजेपी का समर्थन किया है और हाल के वर्षों में पार्टी ने महत्वपूर्ण ओबीसी उप-जातियों में अपनी पैठ बनाई है. कोर बीजेपी समर्थकों के बावजूद, जैसा भागवत के अभियान से दिखता है, ऊपरी जातियों ने नोटा का विकल्प चुनकर वोट न करने की इच्छा का प्रदर्शन किया है. ऐसा इसलिए कि उनके पसंद की पार्टी दलितों को खुश करने में लगी हुई है.

बीजेपी के लिए हानिकारक

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की इस घोषणा कि, मराठों के पास 1 दिसंबर को उत्साहित होने का एक कारण होगा, के बाद ऊपरी जाति की चिंता और बढ़ेगी. इस बात की संभावना है कि मुख्यमंत्री मराठों को आरक्षण प्रदान करने के अपने आश्वासन को पूरा करने जा रहे हैं. यह अन्य जातियों को दिए जा रहे आरक्षण से अलग आरक्षण होगा. इससे ऊपरी जाति के लोगों का गुस्सा और भी बढ़ेगा क्योंकि इस कदम से 'सामान्य' कोटा और कम हो सकता है. इस तरह का निर्णय 2019 लोकसभा चुनाव में और आने वाले राज्य के चुनावों में, विशेष रूप से कड़े मुकाबले वाले निर्वाचन क्षेत्रों में, बीजेपी के लिए बेहद हानिकारक हो सकता है.

मराठा आरक्षण आंदोलन के दौरान की एक तस्वीर

मराठा आरक्षण आंदोलन के दौरान की एक तस्वीर

यह एक अलग मामला है कि महाराष्ट्र सरकार अपने किए गए वादे को पूरा करने में सक्षम नहीं हो सकती है. फिर भी चुनावी मौसम में कहा जा सकता है कि बीजेपी भी कांग्रेस की तर्ज पर समझौतावदी राजनीति करने का काम कर रही है.

एकमात्र अंतर यह है कि अल्पसंख्यकों की जगह, बीजेपी को उस नए वोट बैंक का फायदा मिल सकता है, जो ऊपरी जातियों को चुनौती पेश कर रहा है और उन्हें हाशिए पर डाल रहा है. एससी/एसटी अधिनियम में संशोधन को लेकर जो प्रतिक्रिया दिखी, उससे लगता है कि इस मुद्दे में महाराष्ट्र से आगे फैलने की संभावना है और यह राष्ट्रीय स्तर पर फैल सकता है.

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बीजेपी के पास महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग (एमएसबीसीसी) की सिफारिशों का हथियार है कि मराठा सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े हैं और पिछड़े वर्ग का स्टेटस पाने के लिए सभी मानकों को पूरा करते हैं.

एमएसबीसीसी की रिपोर्ट में उन मराठों का प्रतिशत दिखाया गया है, जो या तो गरीबी रेखा से नीचे हैं, छोटे और सीमांत भूमि धारक है या यहां तक कि मिट्टी के घरों में रहते हैं. आरक्षण का हकदार होने के लिए ये सब आवश्यक आधार से अधिक है. सवर्ण का तर्क है कि उनकी जाति के भी अधिकांश लोग ऐसी ही स्थिति में रहते है.

यह घोषणा महाराष्ट्र में दलितों को भी क्रोधित करेगी क्योंकि वे लंबे समय से मराठों के साथ संघर्ष करते रहे हैं और इस ताकतवर समुदाय को विशेषाधिकार दिए जाने का विरोध करते रहे हैं. बीजेपी की समस्या और बढ़ जाती है क्योंकि दलितों और आरक्षण के अन्य लाभार्थियों से मराठाओं का एक वर्ग नाराज है. ये वर्ग सोचता है कि दलितों और आरक्षण के अन्य लाभार्थियों ने उनसे अधिक आर्थिक और राजनीतिक लाभ हासिल कर लिया है.

फडणवीस सरकार ने घोषणा की कि वह मौजूदा ओबीसी सूची में मराठों को शामिल करने का इरादा नहीं रखती है और इसके लिए वह संवैधानिक रूप से स्वीकार्य 50% की सीमा से अलग एक विशेष प्रावधान करेगी.

मराठा बनाम अन्य

हालांकि, इस तरह के किसी भी विधायी कदम को निर्विवाद रूप से कानूनी और न्यायिक चुनौती का सामना करना होगा. अभी महाराष्ट्र में, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी और वीजेएनटी (विमुक्त जाति और नोमाडिक जनजाति) को 52% आरक्षण पहले से ही उपलब्ध कराया जा रहा है. मराठों के लिए 16% आरक्षण के बाद, सामान्य श्रेणी का कोटा 48% से घटकर 32% हो जाएगा, जिससे सामान्य श्रेणी के लोगों का गुस्सा और भी बढ़ जाएगा.

मराठा भी राज्य में बीजेपी को समर्थन देने से पहले स्थिति को देखेंगे. उनके सामने अब कांग्रेस का पुनरुत्थान और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का भी विकल्प होगा. 2014 में, कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने जल्दी-जल्दी में एक अध्यादेश जारी कर मराठों को 16% प्रतिशत आरक्षण दिया था.

फडणवीस सरकार के पद संभालने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस निर्णय को खारिज कर दिया था. मराठा इस बार निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि 2014 में कांग्रेस-एनसीपी के फैसले की तरह ही यह भी एक और चुनावी फैसला है.

एक संभावना यह है कि फडणवीस सरकार न्यायिक जांच से बचने के लिए मराठों के आरक्षण का मामला संविधान की नौवीं अनुसूची में डाल सकती है. यह दो कारणों से खतरनाक है. सबसे पहले तो यह आरक्षण का लाभ उठा रहे ओबीसी को परेशान करेगा. साथ ही यह दलितों और सवर्ण जातियों को भी क्रोधित करेगा क्योंकि सामाजिक रूप से प्रभावी मराठा और अधिक सशक्त हो जाएंगे.

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दूसरा, नौवीं अनुसूची में शामिल करना एक जोखिम भरा प्रस्ताव है, क्योंकि 2007 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि संविधान की इस अनुसूची में नए कानूनों को सम्मिलित करने से उसे प्रतिरक्षा प्रदान नहीं की जा सकती है.

अन्य राज्यों में भी उठेगी मांग

महाराष्ट्र के अलावा, गुजरात, राजस्थान और हरियाणा में भी आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन का हवाला देते हुए प्रमुख जातियां आरक्षण की मांग करती रही हैं. यह इन राज्यों में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक एजेंडा रहा है. यह किसी को मालूम नहीं है कि यह मुद्दा कब किस राज्य में उभरकर सामने आ जाएगा, क्योंकि सबके बीच सिकुड़ते लाभ का हिस्सा पाने की प्रतिस्पर्धा काफी मजबूत होती जा रही है.

फडणवीस सरकार की घोषणा गुजरात में पटेल आरक्षण और हरियाणा में जाटों की मांग को गति प्रदान करेगी. गुजरात में ठाकोर समुदाय द्वारा समर्थित पटेल विरोधी आंदोलन ने दिखाया है कि प्रत्येक आरक्षण समर्थक आंदोलन ने एक प्रतिरोधी आंदोलन पैदा किया है.

राजस्थान में बीजेपी सरकार ने आगामी चुनाव को देखते हुए जुलाई में एक आदेश जारी किया, जिसमें गुज्जर समेत पांच जातियों को ओबीसी श्रेणी के तहत आरक्षण पाने का हकदार माना गया. विधानसभा चुनाव में इस निर्णय के प्रभाव का भी परीक्षण हो जाएगा.

2014 से, बीजेपी विभिन्न राज्यों में सामाजिक रूप से प्रभावी जातियों के साथ जुड़ने में असफल रही है, जो आरक्षण हासिल कर अपनी आर्थिक और राजनीतिक हिस्सेदारी को फिर से पाना चाहते हैं.

आरक्षण का मुद्दा बहु-स्तरीय है. इस मुद्दे पर समग्रता से चर्चा करने की बात की शुरुआत करने के बाद अब संघ परिवार ने भी तभी कुछ बोलने या करने का विकल्प चुना है, जब सामने संकट हो. महाराष्ट्र में जिस तरह के परिदृश्य बन रहे हैं, आने वाले महीनों में वह निश्चित ही राजनीतिक और चुनावी स्वरूप अख्तियार करेंगे.

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