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महाराष्ट्र किसान कर्जमाफी: स्कूली छात्रों से भरवाया गया है बैंकों का गोपनीय डेटा

इस लापरवाही के चलते न सिर्फ डेटा के लीक होने की संभावना है, साथ ही बड़े पैमाने पर गलतियां भी हुई हैं

Updated On: Dec 17, 2017 10:35 AM IST

Neerad Pandharipande

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महाराष्ट्र किसान कर्जमाफी: स्कूली छात्रों से भरवाया गया है बैंकों का गोपनीय डेटा

यवतमाल: महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस ने सूबे के सदन में भले ही यह मान लिया हो कि 34 हजार करोड़ की कर्जमाफी की योजना की राह ब्यौरे की ढेर सारी गलतियों के कारण बीच राह में रुक गयी है लेकिन उनके कहने से इसका अंदाजा नहीं होता कि बैंकों ने कर्जमाफी के योग्य किसानों के ब्यौरे हासिल करने में किस हद तक मनमानी की.

फर्स्टपोस्ट को अपनी जारी जांच-पड़ताल में कुछ नई जानकारियां मिली हैं और इनसे पता चलता है कि बैंकों के नये कर्जमाफी की योजना के लिए किसानों के ब्यौरे की इंट्री का काम कॉलेज के छात्रों और हाल-फिलहाल कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने वाले नौजवानों को आउटसोर्स कर दिया. डेटा इंट्री के लिहाज से इन सभी को लोगों की निजी और संवेदनशील किस्म की जानकारियां हासिल थीं तो भी ऐसी जानकारी को सार्वजनिक ना करने के वादे पर इनसे कोई दस्तखत नहीं लिए गए और ना ही कोई औपचारिक करार हुआ.

शायद फड़नवीस को इस बात का अंदाजा नहीं है कि बैंकों ने किस हद तक कर्जमाफी की प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ किया है, तभी उन्होंने सदन में अपनी पसंदीदा योजना के बीच राह रुकने की जिम्मेवारी ली या फिर यह भी हो सकता है कि वे विवाद के मसले को ज्यादा तूल ना देते हुए बैंकों को अपने साथ मिलाकर रखना चाहते हों ताकि कर्जमाफी की योजना अमली जामा पहन सके.

नीचे जो जानकारियां लिखी गई हैं उन्हें यवतमाल जिले में दो दिनों की अवधि में कई साक्षात्कारों(इंटरव्यू) के जरिए जुटाया गया. ये जानकारियां एक बैंक की अंदरुनी व्यवस्था के नाकारा होने का पता देती है साथ ही दो अहम बातों की तरफ इशारा करती हैं जिनपर ध्यान देना जरुरी है :

  1. बैंकों ने आंकड़ों की जांच-परख के लिए युवा फ्रीलांसर्स 13 अक्तूबर को बहाल किए यानी 18 अक्तूबर की तारीख से महज पांच दिन पहले. 18 अक्तूबर को कर्जमाफी की योजना पूरे ताम-झाम के साथ शुरु की जानी थी. इससे संकेत मिलता है कि कर्जमाफी की योजना के लाभार्थियों की सूची बैंकों की वजह से नाकारा बनी, हालांकि बैंकों के पास सूची तैयार करने के लिए चार महीने का समय था और एक बात यह भी है कि यह सूची पहले ही दिन तैयार रहनी चाहिए थी क्योंकि सरकार ने बैंकों से हासिल सूचना के आधार पर ही कर्जमाफी की राशि 34 हजार करोड़ रखी थी.
  2. यवतमाल अपने आप में कहीं ज्यादा बड़ी दिक्कतों का प्रतीक जिला है. साक्षात्कार में शामिल कुछ लोगों ने बताया कि आस-पास के जिलों के बैंकों ने भी आंकड़ों के सत्यापन के लिए एक सा तरीका अपनाया. फर्स्टपोस्ट अपने अगले लेख में इस दावे की जांच करेगा.
बेशक सारा दोष यवतमाल जिले के बैंकों पर डाल देना ठीक नहीं लेकिन यह कहना भी असंगत नहीं कि आंकड़ों के सत्यापन के लिए शार्टकट तरीका अपनाने के कारण सूची में वो सारी गड़बड़ियां हुईं जिनका फर्स्टपोस्ट ने अपने हाल के लेखों में खुलासा किया है या फिर जिसकी तरफ शिवसेना के विधायक प्रकाश अबिटकर ने हाल में सदन में इशारा किया. अबिटकर ने महाराष्ट्र की सदन में कहा कि कर्जमाफी का लाभ उन लोगों को दिया गया है जो इसके योग्य नहीं. उन्होंने कहा कि कर्जमाफी का लाभार्थी मुझे भी मान लिया गया है और मुझे प्रोत्साहन राशि के रुप में 25000 रुपये मिले हैं जबकि मैंने कर्जमाफी के लिए कोई आवेदन नहीं दिया था और ना ही विधायक होने के नाते मैं इस योजना का लाभार्थी होने के काबिल हूं.

यह रिपोर्ट सरकार की कर्जमाफी की योजना के एक अन्य अहम पहलू की तरफ ध्यान दिलाती है : कर्जमाफी की योजना का एक बुनियादी सिद्धांत था कि पूरी प्रक्रिया डिजिटाइजेशन(कंप्यूटरीकृत) के जरिए अंजाम दी जायेगी लेकिन इस सिद्धांत से किनारा कर लिया गया. यवतमाल में हमने देखा कि बैंकों ने इस बुनियादी सिद्धांत को ही उलट दिया. प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए वही पुराना उलझाऊ और गलतियों के अंदेशे वाला हाथ से आंकड़े भरने का तरीका अमल में लाया गया और यह तरीका फड़नवीस के घोषित उद्देश्यों के एकदम उलट था.

कर्ज अपने आप में ही बड़ा जाल है.

काम पर रखे गये छात्रों को आंकड़े की हार्डकॉपी दी गई और कहा गया कि प्रति लोन अकाउंट 5 से 6 रुपये की दर पर माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल शीट पर सूचनाओं को दर्ज कर दीजिए. आंकड़ों को दर्ज करने के काम पर रखे गये बहुत से नौजवान बमुश्किल 4 घंटे रोजाना सो पाते थे. कइयों ने तो इस काम के दौरान एक दिन में 700 किसानों के लोन अकाउंट की जानकारी एक्सेल शीट पर दर्ज कीं. कॉलेज के इन छात्रों ने बैंकों में बैंक-अधिकारियों के साथ मिलकर डेटा इंट्री का यह तमाशा अंजाम दिया. फर्स्टपोस्ट ने जितने भी फ्रीलांसर्स का इंटरव्यू किया, सबने कहा कि हमारे पास इतना समय ही नहीं था जो हम देखें कि दर्ज आंकड़ों में कोई गलती है या नहीं या कहीं एक ही प्रविष्टि बार-बार तो नहीं दर्ज की जा रही है. फर्स्टपोस्ट की यह रिपोर्ट आपको बताती है कि लाभार्थियों की सूची में इन दोनों गलतियों की भरमार है.

यवतमाल के पखड़वाडा के एक बैंक अधिकारी ने फर्स्टपोस्ट से कहा “ काम बहुत ज्यादा था. बैंक में मौजूद कर्मचारियों की तादाद इतनी नहीं है कि हम काम को पूरा कर पाते इसलिए हमने एमएस-सीआईटी ( महाराष्ट्र नॉलेज कारपोरेशन से संचालित सूचना प्रौद्योगिकी के पाठ्यक्रम) के छात्रों और एमएस एक्सेल शीट जानने वाले अन्य युवाओं से कहा कि इस काम में जुटिए.” हमने जितने भी बैंक अधिकारियों का साक्षात्कार लिया उनमें कोई भी ऑन रिकॉर्ड बोलने को तैयार नहीं था.

क्या कहते हैं डेटा एंट्री करने वाले

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प्रतीकात्मक तस्वीर

यवतमाल डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक के लिए एक्सेल शीट पर डेटा भरने के काम में मदद करने वाले एक फ्रीलांसर हैं कुणाल इचलवर. वे गणित के विद्यार्थी हैं. उन्होंने 13 अक्तूबर के दिन से तीन-चार दिनों के लिए अस्थायी तौर पर डेटा इंट्री का काम किया. इचलवर ने फर्स्टपोस्ट से कहा कि "चौबीस घंटे में हम महज 4 घंटे सो पाते थे, बाकी समय हमें काम करना होता था. उस वक्त हमारे जैसे करीब 25-30 लोग डेटा इंट्री के काम में लगे थे. मैंने बड़ी तेजी से काम किया और एक दिन-एक रात के भीतर 600-700 नाम और उनके ब्यौरे दर्ज किए.

बीएससी की पढ़ाई करते हुए ही इचलवर ने एमएस-सीआईटी का कोर्स किया है और इचलवर बताते हैं कि इस कोर्स को करने के ही कारण उनके एक दोस्त ने कहा कि बैंक के लिए डेटा इंट्री का काम कर लो. वे बताते हैं कि किसानों के खातों से संबंधित जानकारी अस्थायी कर्मचारियों को हार्डकॉपी के रुप में दी गई थी और इसके ब्यौरे को कंप्यूटराइज्ड सिस्टम में डालना था. इचलवर को हर नाम की इंट्री के लिए 6 रुपये मिले हालांकि उन्हें पहले कहा गया था कि इस काम के लिए 10 रुपये के हिसाब से भुगतान मिलेगा.

जिसे तेज गति से काम पूरा हुआ उसी का नतीजा था कि पूरी प्रक्रिया गलतियों से भर गई. बैंक के एक पूर्व संविदा कर्मचारी(कांट्रैक्चुअल एम्पलाई) सुधीर टथे अब इन गलतियों को सुधारने में बैंक की मदद कर रहे हैं. टथे पखड़वाडा में एक प्राइवेट कंप्यूटर सेंटर चलाते हैं.

इचलवर और टथे पूरी इस पूरी प्रक्रिया के भीतर एक सिरे को दूसरे सिरे से जोड़ने वाली धुरी(कॉग) की तरह है. दोनों ने हमें डेटा इंट्री के पूरे अभियान की हर छोटी-छोटी बात को समझने में मदद की जबकि नागपुर के अमोल जिद्देवर जैसे कुछ नौजवानों ने हमें बताया कि आखिर कर्जमाफी के लिए आंकड़ों को तैयार करने से जुड़ा पूरा सिस्टम क्योंकर बीमारी का शिकार हुआ. अमोल 26 साल के हैं और उन्होंने बी.कॉम किया है, साथ ही सी++ नाम की कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा की पढ़ाई भी. यवतमाल डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक के लिए पूरी प्रक्रिया के दौरान तकनीक के किसी भी उलझे नुक्ते को सुलझाने के लिए वही एकमात्र संकटमोचक थे.

अमोल जिद्देवर के मुताबिक जिस बैंक के लिए वे काम कर रहे थे वहां सरकार ने काम को पूरा करने के लिए बड़ी कठिन डेडलाइन निर्धारित कर रखी थी. तकरीबन 7500 अर्जियों के ब्यौरे महज 3 दिन में भरे जाने थे. सरकार ने 13 अक्टूबर को बैंक को सूची भेजी और इसके बाद ही यह काम तय हुआ. चूंकि ब्यौरों को 66 कॉलम में भरा जाना था इसलिए किसी नाम से जुड़े पूरे ब्यौरे को भरने में औसतन 15 मिनट का वक्त लगता था. बैंक ने इस काम के लिए 11 व्यक्ति बहाल किए थे. काम पूरे तीन-चार दिन तक चौबीसो घंटे जारी रहा. फ्रीलांसर से कहा गया कि शुरुआती 46 कॉलम को भरना है और शेष कॉलम में ‘लागू नहीं’ ( नॉट एप्लीकेबल) लिखना है.

चूंकि एक ही डेटा सेट पर कुल 11 लोग एक साथ लगे थे इसलिए गलती होने की आशंका बहुत ज्यादा थी. सरकार ने जो ऑनलाइन फार्म दिए थे उनमें क्रम संख्या(सीरियल नंबर) तथा कॉलम के शीर्षक कुछ मामलों में अलग-अलग कंप्यूटर पर अलग-अलग नजर आ रहे थे. इस कारण अलग-अलग कंप्यूटर के डेटा को एक में मिलाना खुद में बहुत कठिन चुनौती थी और जिद्देवर का कहना है कि अक्सर इस काम का बड़ा हिस्सा हाथ से करना पड़ता था.

कुछ गलतियां असावधानी के कारण हुईं. काम पर रखे गये अस्थायी कर्मचारियों को बैंकों ने आंकड़े हार्डकॉपी में दिए थे जो हाथ से लिखे हुए थे. इसमें अगर किसी एक व्यक्ति के एक से ज्यादा अकाउंट थे तो उसमें ‘उपर्युक्त के जैसा’(सेम ऐज एवॉव) का प्रविष्टि ना होने के कारण भी गलतियों की गुंजाइश पैदा हुई. जिद्देवर ने एक उदाहरण के सहारे इस बात को समझाया:

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गलतियों का असर

अब यहां अगर आंकड़ों को दर्ज करने वाला व्यक्ति यह देखने में चूक जाये कि तीसरी पंक्ति में सेम ऐज एवॉव का चिह्न गायब है तो फिर एबीसी की जगह डीईएफ नाम के दर्ज हो जाने की संभावना ज्यादा है. ऐसा होने पर एबीसी के नाम पर दो अकाउंट दर्ज हो जायेंगे जबकि उसके नाम पर तीन अकाइंट हैं और डीईएफ के नाम पर एक लोन अकाउंट दर्ज होगा जबकि उसके दो लोन अकाउंट हैं. और इसके बाद के सारे नाम तथा लोन अकाउंट आपस में उलझ जायेंगे. ध्यान रखने की बात ये भी है कि ऊपर सिर्फ दो कॉलम दिखाये गये हैं जबकि असली फार्म में 66 कॉलम थे.

इसके अलावे, अस्थायी कर्मचारी एक पन्ने का काम पूरा कर ले तो उसे पन्ने के ऊपर “कंपलिटेड’(पूरा हुआ) लिखना होता था अगर कोई फ्रीलांसर ऐसा ना कर पाये तो बड़ी संभावना है कि किसी दूसरे कर्मचारी को वही पन्ना फिर से डेटा इंट्री के लिए दे दिया जाय. इस कारण भी एक ही नाम से कई प्रविष्टियों दर्ज होने की गुंजाइश बनती है.

जिद्देवर ने कहा कि “ जो आंकड़े दर्ज करने थे वे बड़े जटिल थे और काम को पूरा करने के लिए समय बड़ा कम था सो काम में बहुत सारी गलतियां रह गईं. दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि दोष किसका है क्योंकि भ्रम की स्थिति बहुत ज्यादा है. लेकिन ऐसा होने के कारण मामले से जुड़े तमाम पक्ष—किसान, बैंक अधिकारी तथा हम जैसे लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ा है.”

हालात की व्याख्या के लिए “कठिनाई” शब्द का इस्तेमाल तनिक हल्का कहा जायेगा. जो कुछ खुलकर सामने आ रहा है उससे फड़नवीस की चलायी इस कर्जमाफी की योजना की बुनियादी कमियां सामने आ रही है ; कदम लगातार गलत दिशा में उठे, फैसले कच्ची जानकारियों के आधार पर लिए गए, राजनीतिक बाध्यताओं ने अपना रंग दिखाया और बैंकों के अधकचरे फैसले ने इन सबके साथ मिलकर एक ऐसी नीति का कबाड़ा कर दिया जो बहुत संगत और मजबूत जान पड़ रही थी.

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