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क्या कमलनाथ-सिंधिया की जोड़ी तोड़ पाएगी शिवराज का जादू

कमलनाथ को प्रदेश कांगे्रस का अध्यक्ष, ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है

Updated On: Apr 26, 2018 07:40 PM IST

Dinesh Gupta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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क्या कमलनाथ-सिंधिया की जोड़ी तोड़ पाएगी शिवराज का जादू

मध्यप्रदेश की राजनीति में हमेशा ही किंग मेकर भूमिका निभाने वाले सांसद कमलनाथ पहली बार राज्य की राजनीति में सक्रिय भूमिका होंगे. कमलनाथ के साथ कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी पार्टी ने साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए दांव पर लगाया है. कमलनाथ-सिंधिया की नियुक्ति के साथ ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने यह साफ इशारा दे दिया है कि पार्टी किसी एक चेहरे पर दांव लगाकर चुनाव में खतरा नहीं उठाना चाहती है.

कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया है. ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है. इन दोनों के साथ पार्टी ने चार कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाए हैं. कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्तियों में कमलनाथ-सिंधिया की पसंद को महत्व मिला है. जातीय संतुलन भी साधने की कोशिश की गई है.

कमलनाथ के कारण कभी मुख्यमंत्री नहीं बन सके थे माधवराव सिंधिया कमलनाथ ने वर्ष 1980 में पहली बार जब मध्यप्रदेश के छिंदवाडा से लोकसभा का चुनाव लड़ा था उस वक्त उनकी उम्र 34 साल थी. अभी वे 72 साल के हैं. मध्यप्रदेश में कमलनाथ की पहचान संजय गांधी के मित्र के तौर थी. संजय गांधी की मित्रता के कारण ही उन्हें कांग्रेस के लिए सबसे सुरक्षित माने जाने वाली छिंदवाड़ा सीट से उम्मीदवार बनाया गया था. कमलनाथ तब से लगातार इस सीट से चुनाव लड़ रहे हैं.

कमलनाथ की गांधी परिवार से नजदीकी के चलते ही 1980 में अर्जुन सिंह राज्य के मुख्यमंत्री बने थे. विधायकों का बहुमत आदिवासी नेता शिवभानु सिंह सोलंकी के साथ था. कमलनाथ के हस्तक्षेप के बाद ही इंदिरा गांधी ने अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला लिया था. राज्य की राजनीति में कमलनाथ को हमेशा ही अर्जुन सिंह-दिग्विजय सिंह का शुभचिंतक माना जाता रहा है. माधवराव सिंधिया और मोतीलाल वोरा को कई मौकों पर कमलनाथ के विरोध का सामना भी करना पड़ा था.

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चुरहट लॉटरी कांड में हाईकोर्ट के फैसले के बाद अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था. राजीव गांधी, माधवराव सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे. विधायकों के बगावती तेवरों के कारण सिंधिया मुख्यमंत्री नहीं बन सके. मोतीलाल वोरा को मुख्यमंत्री बनाया गया. माधवराव सिंधिया और कमलनाथ की जोड़ी कांग्रेस की राजनीति में मोती-माधव एक्सप्रेस के नाम से चर्चित रही है. माधवराव सिंधिया उस वक्त रेल मंत्री थे.

वर्ष 1993 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी माधवराव सिंधिया द्वारा की गई एकता की पहल के कारण हुई थी. सिंधिया ने ग्वालियर जिले के डबरा में एकता सम्मेलन किया था. पिछले 38 साल में कमलनाथ ने कभी भी राज्य की राजनीति में सक्रिय रहने की इच्छा नहीं रखी थी. राजनीतिक विश्लेषक गिरिजाशंकर कहते हैं कि कमलनाथ यदि चाहते तो कभी भी राज्य के मुख्यमंत्री बन सकते थे. कमलनाथ की रूचि राष्ट्रीय राजनीति में रहती है.

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कमलनाथ-सिंधिया की जोड़ी से क्या कांग्रेस को सत्ता में वापस ला सकती है

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री निवास के प्रवेश द्वारा के सामने ही कमलनाथ का सरकारी बंगला है. पिछले दो दशक में कमलनाथ एक-दो मौकों पर ही इस बंगले में गए. लगभग एक वर्ष पूर्व कमलनाथ ने इस बंगले की साज-सज्जा नए सिरे से कराई थी. इसके बाद से ही यह अटकलें चल रहीं थीं कि कमलनाथ राज्य की राजनीति में सक्रिय होने की तैयारी कर रहे हैं. पार्टी का एक गुट ज्योतिरादित्य सिंधिया के चेहरे को आगे रखकर चुनाव लड़ने के लिए राहुल गांधी पर दबाव बनाए हुए थे. इस दबाव के कारण प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बदले जाने का मामला टलता चला गया.

नियुक्ति का मामला टलते जाने के कारण राज्य में कांग्रेस के नेता भी निष्क्रिय हो गए. प्रदेश कांग्रेस के निवर्तमान अध्यक्ष पिछले चार साल में कार्यकर्त्ताओं में अपनी पैठ भी नहीं बना सके. ज्योतिरादित्य सिंधिया के चेहरे का विरोध दिग्विजय सिंह के खेमे की ओर से हो रहा था. कमलनाथ, लगातार किसी एक नाम पर सहमति बनाने की कोशिश में लगे हुए थे. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कमलनाथ को ही प्रदेश की कमान सौंपकर गुटबाजी की संभावनाओं पर काफी हद तक लगाम लगाने की कोशिश की है. कमलनाथ का विरोध करने का प्रयास दिग्विजय सिंह समर्थक भी नहीं करेंगे.

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ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव कैंपेन कमेटी का चेयरमैन बनाया गया है. इस कारण सिंधिया की सहमति भी कमलनाथ के नाम पर मानी जा रही है. कांग्रेस के दिवगंत नेता अर्जुन सिंह के पुत्र एवं प्रतिपक्ष के नेता अजय सिंह भी अपने आपको कमलनाथ के खिलाफ खड़ा नहीं करेंगे. सुरेश पचौरी को भी कमलनाथ का नेतृत्व स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कमलनाथ-सिंधिया की जोड़ी के जरिए राज्य में कांग्रेसी नेताओं के बीच एकता का संदेश भले ही दे दिया है लेकिन, शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ चेहरे को लेकर सवाल अभी भी बना हुआ है. कांगे्रस के नेताओं को पूरे चुनाव अभियान में इस सवाल का सामना करना पड़ेगा कि सरकार बनने पर मुख्यमंत्री कौन बनेगा? कमलनाथ या सिंधिया?

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शिवराज सिंह चौहान-ज्योतिरादित्य सिंधिया

कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्तियों में जातिगत समीकरण

कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया दोनों ही कांग्रेस के ऐसे चेहरे हैं, जिनकी जाति के बारे में लोगों को ज्यादा कुछ पता नहीं है. दोनों ने ही कभी भी वोटों की राजनीति के लिए अपनी जाति की पहचान भी उजागर नहीं की है. कमलनाथ की पहचान वरिष्ठ और अनुभवी नेता के तौर पर है. वही ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण मतदाताओं के बीच लोकप्रिय हैं. सिंधिया की लोकप्रियता के कारण ही उन्हें शिवराज सिंह चौहान की काट के तौर पर देखा जाता रहा है.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पिछले तेरह साल से राज्य के मुख्यमंत्री हैं. राज्य में लगातार चौथी बार बीजेपी की सरकार बनाने के लिए उन्होंने जातीय समीकरणों पर काम करना शुरू किया है. नंदकुमार चौहान के स्थान पर जबलपुर के सांसद राकेश सिंह को बीजपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है. राकेश सिंह ने अपनी जाति के बारे में पदभार संभालने के अगले दिन ही स्पष्ट कर दिया कि वे राजपूत हैं. पिछड़ा वर्ग से नहीं हैं.

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कांग्रेस पार्टी ने बीजेपी की चुनावी जमावट देखने के बाद ही कमलनाथ-सिंधिया की जोड़ी को मैदान में उतारा है. इनके साथ चार कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किए गए हैं. ये सर्वश्री बाला बच्चन, रामनिवास रावत, जीतू पटवारी और सुरेन्द्र चौधरी हैं. सुरेन्द्र चौधरी को छोड़कर सभी वर्तमान में विधायक हैं. चौधरी अनुसूचित जाति वर्ग से हैं. वे दिग्विजय सिंह सरकार में राज्य मंत्री थे. चौधरी सागर जिले के नरयावली से विधायक रहे हैं. उन्हें कमलनाथ-दिग्विजय सिंह का करीबी माना जाता है. चौधरी के जरिए पार्टी बुंदेलखंड के अनुसूचित जाति वर्ग के मतदाताओं को साधना चाहती है. वैसे चौधरी इस क्षेत्र के प्रभावी नेता नहीं माने जाते हैं.

बाला बच्चन आदिवासी वर्ग से हैं. वे मालवा-निमाड़ से आते हैं. कमलनाथ के काफी भरोसमंद माने जाते हैं. जीतू पटवारी भी मालवा अंचल से हैं. कमलनाथ के करीबी हैं. पिछड़ा वर्ग के हैं. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय सचिव भी हैं. रामनिवास रावत चंबल क्षेत्र से हैं. सिंधिया के सबसे भरोसेमंद हैं. रावत पिछड़ा वर्ग से हैं. प्रतिपक्ष के नेता अजय सिंह विंध्य प्रदेश से आते हैं. इस कारण विंध्य प्रदेश से कोई नई नियुक्ति की जरूरत कांगे्रस पार्टी ने नहीं समझी.

कमलनाथ का निर्वाचन क्षेत्र महाकौशल में आता है. जबकि सिंधिया ग्वालियर-चंबल संभाग में प्रभावी हैं. बीजेपी अध्यक्ष राकेश सिंह भी महाकौशल क्षेत्र से ही हैं. इस क्षेत्र में विधानसभा की 66 सीटें आती हैं. अधिकांश सीटें आदिवासी अंचल की हैं. कमलनाथ की क्षेत्र के गौंड आदिवासियों के बीच अच्छी पकड़ मानी जाती है. इस कारण यह माना जा रहा है कि महाकौशल के नतीजे सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका अदा करेंगे.

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