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भोपाल में मायावती: राज्य में नए सियासी गठजोड़ की सुगबुगाहट!

बताया जा रहा है कि अगले विधानसभा के चुनाव में समझौते के लिए कांग्रेस और बीएसपी के बीच बातचीत शुरू हो गई है

Dinesh Gupta Updated On: Nov 25, 2017 09:34 AM IST

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भोपाल में मायावती: राज्य में नए सियासी गठजोड़ की सुगबुगाहट!

उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का सूपड़ा साफ हो चुका है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के समझौते के बाद बीएसपी सुप्रीमो मायवती अलग-थलग पड़ती जा रहीं हैं. अगले साल मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य में विधानसभा के चुनाव होने हैं. मायावती को उम्मीद है कि उनकी पार्टी इन दोनों राज्यों में बेहतर प्रदर्शन करेगी. इसी उम्मीद में मायावती ने शुक्रवार को भोपाल में कार्यकर्ताओं की एक बड़ी रैली कर अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की है.

उन्होंने कहा कि वे भारतीय जनता पार्टी को सरकार से हटाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं. संभावना यह प्रकट की जा रही है कि मायावती मध्यप्रदेश में कांग्रेस से चुनावी समझौता कर सकती हैं. समझौते में सबसे बड़ी बाधा समाजवादी पार्टी को माना जा रहा है. बीजेपी को सत्ता से हटाने के लिए यदि हद को पार करना है तो कांग्रेस के हाथ के साथ-साथ समाजवादी पार्टी की साइकिल का भी सहारा मायावती को स्वीकार करना पड़ सकता है.

ताकत दिखाने आए थे छत्तीसगढ़ के कार्यकर्ता

मायावती के बीएसपी सुप्रीमो बनने के बाद से ही मध्यप्रदेश में पार्टी का जनाधार तेजी से विभाजित हुआ है. मध्यप्रदेश के कुछ इलाके ही ऐसे हैं, जहां कि बीएसपी अच्छी स्थिति में मानी जाती रही है. ये इलाके उत्तरप्रदेश की सीमाओं से लगे हुए हैं. ग्वालियर-चंबल संभाग, रीवा संभाग और सागर संभाग में बीएसपी वोटों का गणित बिगाड़ने में सक्षम मानी जाती है. इन तीनों संभागों में साठ से अधिक विधानसभा की सीटें आती हैं.

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बीएसपी हर चुनाव में इन सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारती रही है. भोपाल और इंदौर जैसे महानगरों में भी बीएसपी का प्रतिबद्ध मतदाता आज भी अपना वोट पार्टी लाइन पर ही देता है. राज्य में पिछले एक दशक से बीएसपी की ताकत लगातार कम हो रही है. फूल सिंह बरैया जब तक पार्टी के अध्यक्ष थे, उन्होंने पार्टी को काफी मजबूत स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया था. वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले बरैया ने बहुजन संघर्ष दल के नाम से एक अलग पार्टी बना ली. बीएसपी से अलग होने के बाद बरैया की ताकत भी घटी.

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भोपाल रैली में भाषण देतीं मायावती

अब इक्का-दुक्का विधानसभा क्षेत्रों में ही उनके समर्थक नजर आते हैं. बरैया ने अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए कुछ समय तक केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी का भी सहारा लिया था. अब उन्होंने पासवान से भी किनारा कर लिया है. उत्तरप्रदेश में बीएसपी को मिली शिकस्त के बाद राज्य में भी बीएसपी कार्यकर्ता का मनोबल टूटा हुआ है. पार्टी का प्रतिबद्ध मतदाता भी नए विकल्पों पर तेजी से सोच रहा है. राज्य में दो ही बड़े राजनीतिक दल हैं. कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी.

भारतीय जनता पार्टी पिछले एक साल से लगातार दलित वर्ग में अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रही है. इसी कोशिश के तहत उज्जैन में पिछले साल संपन्न हुए सिंहस्थ में समरसता स्नान का आयोजन किया गया था. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह खुद इस स्नान के दौरान मौजूद थे. बीजेपी दलितों के लिए सामाजिक समरसता अभियान भी चला रही है.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी आदिवासियों के बाद अपनी गतिविधियों को दलितों पर फोकस कर रहा है. इन कार्यक्रमों के चलते ही मायावती को अपने वोट बैंक में सेंध लगती दिखाई दे रही है. लंबे अर्से के बाद हुई मध्यप्रदेश यात्रा में उनकी घटते जनाधार पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी. सामान्यत: मायावती कार्यक्रम के दिन ही आती हैं.

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इस बार वे एक दिन पहले भोपाल पहुंचीं. छत्तीसगढ़ के नेताओं को भी उन्होंने भोपाल बुला लिया था. मायावती को रैली फेल होने का डर सता रहा था. इसी कारण छत्तीसगढ़ से भी बड़ी संख्या में लोगों को भोपाल लाया गया. रैली में दस लाख लोगों के एकत्रित होने का दावा किया गया था, लेकिन पचास हजार लोग भी वे नहीं जुटा पाईं.

कांग्रेस नेताओं से चल रही है समझौते की बात

मध्यप्रदेश में कांग्रेस भी यह अच्छी समझ गई है कि यदि राज्य में बीजेपी को सत्ता से हटाना है तो विरोधी वोटों का विभाजन रोकना होगा. मध्यप्रदेश में अब तक कांग्रेस और बीएसपी का कोई समझौता नहीं हुआ है. बीजेपी और बीएसपी ने जरूर रणनीतिक समझौता किया था. कांग्रेस की राजनीति का आधार भी दलित और आदिवासी वोटर ही है. दलित और आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटें हमेशा ही कांग्रेस की सरकार बनाने में मदद करती रही हैं.

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बीएसपी की भोपाल रैली की तस्वीर

जबकि मायावती को ज्यादातर सफलता गैर आरक्षित सीटों पर ही मिलती रही है. पिछले विधानसभा चुनाव में दलित-आदिवासी सीटों पर भारतीय जनता पार्टी को अपेक्षा के विपरीत सफलता मिली थी. पार्टी इन सीटों को आगे भी बरकरार रखना चाहती है. बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दलों की दिक्कत दलित चेहरे को लेकर है. दोनों ही दलों में ऐसा कोई चेहरा नहीं है, जो सर्व स्वीकार्य हो.

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बताया जाता है कि अगले विधानसभा के चुनाव में समझौते के लिए कांग्रेस और बीएसपी के बीच बातचीत शुरू हो गई है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ समझौते के फार्मूले पर तेजी से काम कर रहे हैं. संभवत: इसी बातचीत के कारण भोपाल की रैली में मायावती ने कांग्रेस पर कोई हमला नहीं बोला.

उनके भाषण के केंद्र में सिर्फ राम मंदिर और बीजेपी ही रहे. उन्होंने रैली में हिस्सा लेने आए लोगों से कहा कि राम मंदिर से दलितों का कोई भला होने वाला नहीं है. दलितों को अधिकार किसी मंदिर के देवता ने नहीं वरन बाबा साहब अंबेडकर के कारण मिले हैं. मध्यप्रदेश में बीएसपी के वर्तमान में सिर्फ चार विधायक हैं.

पदोन्नति में आरक्षण दे सकता है संजीवनी

मध्यप्रदेश में पिछले डेढ़ दशक से दलित और आदिवासियों को पदोन्नति में आरक्षण दिया जा रहा था. पिछले साल मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इस कानून को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया था. हाईकोर्ट ने आरक्षण का लाभ ले चुके कर्मचारियों को रिवर्ट करने के आदेश भी दिए हैं. इस वर्ग के कर्मचारियों की नाराजगी को दूर करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है. मुख्यमंत्री चौहान ने साफ शब्दों में कहा कि कोई माई का लाल पदोन्नति में आरक्षण नहीं छीन सकता.

Bhopal : Madhya Pradesh Chief Minister Shivraj Singh Chauhan addressing a gathering during his indefinite fast to placate angry farmers at BHEL Dussehra Ground in Bhopal on Saturday. PTI Photo (PTI6_10_2017_000087B)

इसी तरह का बयान दिग्विजय सिंह ने भी उन दिनों दिया था, जब वे राज्य के मुख्यमंत्री थे और पदोन्नति में आरक्षण का कानून बना था. दिग्विजय सिंह ने अपने बयान में कहा था कि उन्हें सवर्णों के वोट नहीं चाहिए. नतीजा वर्ष 2003 में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई. आज तक कांग्रेस का वनवास खत्म नहीं हुआ है.

हाईकोर्ट के फैसले के बाद शिवराज सिंह चौहान के बयान से भी सवर्ण कर्मचारी गुस्से में हैं. उन्होंने सपाक्स नाम से एक अलग कर्मचारी संगठन बना लिया है, जो सुप्रीम कोर्ट में सरकार के खिलाफ केस लड़ रहा है. आरक्षण के मुद्दे ने कर्मचारियों के बीच जाति की एक गहरी खाई बना दी है. मायावती इसका फायदा उठाना चाहती है. मायावती ने रैली में दलित एकता की शपथ भी दिलाई.

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