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दिग्विजय की समन्वय यात्रा क्या मध्य प्रदेश में कांग्रेस को संजीवनी दे पाएगी?

दिग्विजय सिंह ने ओरछा के रामलला के मंदिर से अपनी समन्वय यात्रा शुरू की है, जिसमें वो पार्टी को अगले विधानसभा चुनावों के लिए तैयार कर रहे हैं

Updated On: Jun 01, 2018 02:22 PM IST

Dinesh Gupta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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दिग्विजय की समन्वय यात्रा क्या मध्य प्रदेश में कांग्रेस को संजीवनी दे पाएगी?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश में कांंग्रेस के नेताओं के बीच एकता का जो फार्मूला तय किया है, उसमें मुख्यमंत्री पद के लिए एक नहीं कई दावेदार उभरकर सामने आ गए हैं. एक नहीं अनेक दावेदारों के बीच समन्वय स्थापित करने की जिम्मेदारी पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को सौंपी गई है. दिग्विजय सिंह ने ओरछा के रामलला के मंदिर से अपनी समन्वय यात्रा शुरू की है. पिछले दो चुनावों में कांग्रेस को पराजित करने में दिग्विजय सिंह के समर्थकों की भूमिका काफी अहम रही थी.

समन्वय समिति में हैं हर गुट के नेता

मध्यप्रदेश में कांग्रेस के चार बड़े गुट हैं. इन गुटों के नेता सर्वश्री कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, सुरेश पचौरी और ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं. इन नेताओं की गुटबाजी के कारण पहली बार कांंग्रेस लगातार 15 साल से सत्ता से बाहर है. गुटबाजी के कारण कांग्रेस का जनाधार भी प्रदेश में तेजी से गिरा है. वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 71 सीटें मिलीं थीं. कांग्रेस को 36.04 प्रतिशत वोट मिले थे. जबकि भारतीय जनता पार्टी को 36.38 प्रतिशत वोट के साथ 143 सीटें मिलीं थीं. इससे पहले वर्ष 2003 में उमा भारती के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने 173 सीटें 42.50 प्रतिशत मतों के साथ हासिल की थीं.

कांग्रेस को मात्र 38 सीटों से संतोष करना पड़ा था. वर्ष 2003 में प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ही थे. चुनाव में कांंग्रेस पार्टी की हार के बाद दिग्विजय सिंह 10 साल तक प्रदेश की राजनीति से दूर रहे. वर्ष 2008 का विधानसभा चुनाव सुरेश पचौरी के नेतृत्व में लड़ा गया था. वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने आदिवासी कार्ड खेला. कांतिलाल भूरिया के नेतृत्व में लड़े गए चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 58 सीटें ही मिलीं. उसका वोट प्रतिशत 36.38 रहा. जबकि बीजेपी को 44.85 प्रतिशत वोट मिले थे.

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पिछले दो चुनावों से दिग्विजय सिंह समर्थकों पर भीतरघात करने के आरोप लगते रहे हैं. उम्मीदवारों के चयन में भी गुटबाजी हमेशा ही हावी रही है. गुटबाजी के कारण चुनाव के वक्त नाराज नेता घरों में बैठ जाते हैं. वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सुरेश पचौरी ने अपने समर्थकों को टिकट दिए तो दूसरे नेताओं के समर्थकों ने चुनाव हरवा दिया. इसी तरह वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में कांतिलाल भूरिया को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने से रोकने के लिए सभी बड़े नेताओं ने चुनाव हरवा दिया.

यही वजह है कि वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सीटें वर्ष 2008 की तुलना में कम आईं. प्रदेश में दिग्विजय सिंह अकेले ऐसे नेता हैं, जिनके समर्थकों की संख्या अन्य नेताओं की तुलना में ज्यादा है. उनकी पकड़ प्रदेश के हर हिस्से में है. संभवत: यही कारण है कि राहुल गांधी ने उन्हें सभी नेताओं के बीच तालमेल बनाने की जिम्मा सौंपा है. दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में बनाई गई समन्वय समिति में हर गुट के नेताओं की पसंद को जगह दी गई. दिग्विजय सिंह के धुर विरोधी माने जाने वाले सत्यव्रत चतुर्वेदी भी इस समिति के सदस्य हैं. सत्यव्रत चतुर्वेदी समन्वय समिति की भोपाल में हुई बैठक में नहीं आए थे. बुंदेलखंड की एकता यात्रा में वे जरूर मौजूद थे. समिति में राजेंद्र सिंह गौतम को सदस्य बनाए जाने से नाराज मंदसौर कांग्रेस के मीनाक्षी नटराजन समर्थक नेताओं ने अपने-अपने पदों से इस्तीफे दे दिए.

जीतने वालों को टिकट देने पर जोर

दिग्विजय सिंह यह स्पष्ट कर चुके हैं कि वे मुख्यमंत्री की कुर्सी की रेस में शामिल नहीं हैं. उन्होंने पहली ही बैठक में यह साफ कर दिया कि समिति का कोई सदस्य टिकट की मांग भी नहीं करेगा. तेरह सदस्यीय समिति के कई चेहरे ऐसे हैं, जो विधानसभा टिकट पाने की इच्छा रखते हैं. इनमें बिसाहू लाल सिंह, विभा पटेल, हरि सिंह नरवरिया और सुनील सूद का नाम प्रमुख है. प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कमलनाथ ने कई जिलों के अध्यक्षों के सिर्फ इस आधार पर बदल दिया क्योंकि वे विधानसभा चुनाव के टिकट के इच्छुक थे. शहडोल जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बनाए गए सुभाष गुप्ता की नियुक्ति के खिलाफ वहां के कांग्रेसी हैं.

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सुभाष गुप्ता पर नगरीय निकाय के चुनाव में पार्टी के खिलाफ काम करने का आरोप है. प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष अरुण यादव ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया था. कमलनाथ ने बीस जिला अध्यक्षों की नियुक्ति गुटबाजी के आधार पर ही की. कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के क्षेत्र में उनकी पसंद के आधार पर अध्यक्ष बनाए गए. भोपाल में सुरेश पचौरी के समर्थकों को जगह दी गई. होशंगाबाद में कपिल फौजदार को अध्यक्ष बनाए जाने से नाराज पूर्व अध्यक्ष ने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी खुलकर प्रकट की. बैतूल में सुनील शर्मा को अध्यक्ष बनाए जाने से वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विनोद डागा नाराज हो गए हैं. कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की अध्यक्षता में चुनाव प्रचार समिति बनाई गई है. इस समिति में भी गुटबाजी की झलक दिखाई देती है.

अलग-थलग चल रहे हैं अरुण यादव और अजय सिंह

अरुण यादव प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद से नाराज चल रहे हैं. दिग्विजय सिंह उन्हें दो बार मनाने की कोशिश कर चुके हैं. पहली बार तब जब कमलनाथ ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष का कार्यभार ग्रहण किया था. अरुण यादव मान भी गए और कार्यक्रम में शामिल भी हुए. लेकिन, कमलनाथ ने जब खंडवा जिले के पूर्व विधायक राजनारायण सिंह पूनिया को पार्टी में वापस लिया तो अरुण यादव फिर से नाराज हो गए.

खंडवा,अरुण यादव का संसदीय क्षेत्र है. राजनारायण सिंह उनके परंपरागत विरोधी हैं. अरुण यादव ने कमलनाथ के फैसले पर सार्वजनिक मंच से नाराजगी जाहिर करते हुए कहां कि बरसाती मेढक टर्र-टर्र करने आ गए हैं. दिग्विजय सिंह को एक बार फिर अरुण यादव को मनाने उनके घर जाना पड़ा. अरुण यादव, ज्योतिरादित्य सिंधिया की अध्यक्षता वाली चुनाव प्रचार समिति में सदस्य हैं. राहुल गांधी द्वारा बनाई गईं आधा दर्जन समितियों में प्रतिपक्ष के नेता अजय सिंह के नाम और पद का उल्लेख कहीं नहीं किया गया है. इस बारे में दिग्विजय सिंह ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि वे प्रतिपक्ष के नेता के नाते हर समिति में सदस्य हैं. अजय सिंह और अरुण यादव राज्य में न्याय यात्रा निकाल रहे थे. अरुण यादव को अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद अब अजय सिंह अकेले ही विंध्य में न्याय यात्रा निकाल रहे हैं.

एकता पर टिका है दिग्विजय सिंह का भविष्य

विंध्य की राजनीति में अजय सिंह के समांतर उनके मामा और विधानसभा के उपाध्यक्ष राजेंद्र सिंह को पार्टी में महत्व मिल रहा है. राजेंद्र सिंह को चुनाव घोषणा पत्र समिति का अध्यक्ष बनाया गया है. दोनों के राजनीतिक रिश्ते ठीक नहीं है. दोनों को एक मंच पर लाना दिग्विजय सिंह के लिए बड़ी चुनौती है. दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया से भी अपने रिश्तों में सुधार की पहल की है. ओरछा के रामलला मंदिर से एकता यात्रा शुरू करने के दो दिन पहले दिग्विजय सिंह ने दिल्ली में सिंधिया से उनके घर जाकर मुलाकात की थी. सिंधिया, इससे पहले दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह के आमंत्रण पर राघोगढ़ के किले में लंच के लिए गए थे. महल और किले के बीच मतभेद सालों पुराने हैं. प्रदेश में कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने के लिए महल और किले के रिश्तों में जमी बर्फ पिघलती है तो कांग्रेस को ग्वालियर और चंबल संभाग में काफी लाभ की उम्मीद है.

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