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MP विधानसभा चुनाव: सवर्णों को छोड़कर ओबीसी-दलित गठबंधन को साधने की कोशिश

पिछले सप्ताह कांग्रेस-बीजेपी के नेताओं के समक्ष सवर्ण वर्ग के छिटपुट प्रदर्शन के बाद आंदोलन ने पूरे प्रदेश को अपने चपेट में ले लिया है

Updated On: Sep 05, 2018 04:38 PM IST

Dinesh Gupta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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MP विधानसभा चुनाव: सवर्णों को छोड़कर ओबीसी-दलित गठबंधन को साधने की कोशिश
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एट्रोसिटी एक्ट के खिलाफ सवर्णों द्वारा राज्य भर में किए जा रहे आंदोलन और प्रदर्शन की अगुआई करने वाले संगठनों को लेकर मध्यप्रदेश पुलिस के सामने अब तक पूरी तस्वीर स्पष्ट नहीं हुई है. अभी तक करणी सेना ही खुलकर सामने आई है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर सीधी जिले में कथित तौर पर चप्पल फेंकने की जिम्मेदारी भी करणी सेना ने ही ली है. सवर्ण वर्ग के सामाजिक संगठन सिर्फ बंद का समर्थन कर रहे हैं.

पिछले सप्ताह कांग्रेस-बीजेपी के नेताओं के समक्ष सवर्ण वर्ग के छिटपुट प्रदर्शन के बाद आंदोलन ने पूरे प्रदेश को अपने चपेट में ले लिया है. 6 सितंबर के भारत बंद की अपील सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंचाई जा रही है. भारत बंद की अपील को देखते हुए राज्य के एक दर्जन से अधिक जिले संवेदशील मानकर पुलिस ने उन्हें हाई अलर्ट पर रखा है.

राज्य में कुछ दिनों बाद विधानसभा के आम चुनाव के लिए मतदान होगा. इसके ठीक पहले शुरू हुए सवर्ण आंदोलन के इफेक्ट को रोकने के लिए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ने ही डैमेज कंट्रोल की कोशिश तेज कर दी है. बीजेपी, ओबीसी और कांग्रेस अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग को साधना चाहती है.

आंदोलन मध्यप्रदेश में चल रहा है, लेकिन हवा देने वाले लोग बाहरी

आमतौर पर मध्यप्रदेश में वर्ग संघर्ष के हालात बनते नहीं हैं. पहली बार सवर्ण वर्ग सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करते हुए दिखाई दे रहा है. विरोध प्रदर्शन मुख्यत: एट्रोसिटी एक्ट के खिलाफ है. पहले यह माना जा रहा था कि सपाक्स संगठन इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहा है. सपाक्स संगठन में सवर्ण के अलावा ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्ग भी जुड़ा हुआ है.

हीरा लाल त्रिवेदी

हीरा लाल त्रिवेदी

सपाक्स के राजनीतिक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष हीरालाल त्रिवेदी ने स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा कि हमने सिर्फ बंद का समर्थन किया है. बंद का आह्वान नहीं किया है. एट्रोसिटी एक्ट के खिलाफ राज्य के सवर्णों को सक्रिय करने में कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर का नाम प्रमुख रूप से सामने आया है. दिल्ली के आजाद हिन्द संगठन, बिहार के विनायक पांडे का नाम भी आंदोलन में सक्रिय लोगों में लिया जा रहा है.

देवकीनदंन ठाकुर सवर्ण वर्ग के सामाजिक संगठनों से संपर्क कर बंद का समर्थन मांग रहे हैं. मंगलवार को ग्वालियर में निकाली गई रैली को देवकी नंदन ठाकुर ने संबोधित किया था. सवर्ण आंदोलन ग्वालियर एवं चंबल संभाग में ही सबसे ज्यादा देखा जा रहा है. इस संभाग के छह जिले ग्वालियर, भिंड, मुरैना, दतिया, शिवपुरी, श्योपुर में धारा 144 लगाए जाने के साथ-साथ जलूस, धरना, प्रदर्शन भी प्रतिबंधित कर दिए गए हैं.

इस इलाके में ही भाजपा एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का घेराव हो रहा है. आंदोलन को देखते हुए मंत्रियों और कांग्रेस-बीजेपी के बड़े नेताओं ने गुरुवार तक के अपने सारे कार्यक्रम निरस्त कर दिए हैं. बीजेपी के राष्टीय उपाध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्धे बुधवार को ग्वालियर में हैं. सवर्ण समाज के लोग उन्हें ज्ञापन देने पहुंचे तो सहस्त्रबुद्धे ने मिलने से इंकार कर दिया.

बीएसपी के प्रभाव वाला क्षेत्र है ग्वालियर-चंबल संभाग

ग्वालियर एवं चंबल संभाग में दलित राजनीति का दबदबा है. दोनों संभाग में कुल 34 विधानसभा क्षेत्र हैं. बीएसपी की मौजूदगी के कारण कांग्रेस को इस क्षेत्र में लगातार नुकसान होता है. कुछ विधानसभा क्षेत्रों कांग्रेस और कुछ विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी तीसरे, चौथे नंबर पर रहती है. कांग्रेस इस चुनाव में पहली बार बीएसपी से गठबंधन की कोशिश कर रही है. इस संभाग में 2 अप्रैल के दलित आंदोलन के दौरान दोनों वर्ग आमने-सामने आए गए थे.

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भिंड, मुरैना में जातिगत राजनीति ज्यादा होती है. इन दोनों जिलों में आज भी रैली निकली और प्रदर्शन किया. राज्य में लगभग 16 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जाति वर्ग की है. इसमें 73 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्र में निवास करती है. गांव में ही एट्रोसिटी एक्ट के तहत सबसे मामले दर्ज होते हैं. एट्रोसिटी एक्ट के तहत सबसे ज्यादा मामले ग्वालियर एवं चंबल संभाग में ही दर्ज किए जाते हैं.

इस संभाग में अनुसूचित वर्ग के लिए विधानसभा की कुल सात सीटें आरक्षित हैं. आरक्षित संसदीय सीट एक मात्र भिंड की है. पहले यह सीट सामान्य वर्ग में थी. नए परिसीमन में मुरैना सामान्य वर्ग में आ गई. जिन स्थानों पर अनुसूचित जाति वर्ग के प्रतिनिधि हैं, वहां सामान्य वर्ग से उसकी दूरी साफ दिखाई देती है. यही वजह है कि सवर्ण अपने विरोध प्रदर्शन के दौरान अनुसूचित जाति वर्ग के प्रतिनिधियों से अपने हितों के बारे में सवाल कर रहे हैं.

सवर्ण प्राय: यह आरोप लगाते हैं कि उनके खिलाफ एट्रोसिटी एक्ट में मुकदमा ब्लैकमेल करने के उ्देश्य से दर्ज कराया जाता है. व्यापारी तबका इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित है. इस कारण ही सवर्ण आंदोलन में उसकी भागीदारी ज्यादा है. सड़क पर युवा वर्ग सबसे ज्यादा आंदोलन में सक्रिय दिखाई दे रहा है.

निर्धन आयोग बना लेकिन आरक्षण को लेकर बनी रही नाराजगी

शिवराज सिंह चौहान ने 2008 के विधानसभा चुनाव में सवर्णों की नाराजगी को निर्धन आयोग गठित कर कम करने की कोशिश की थी. जनवरी 2008 में प्रदेश में पहला निर्धन आयोग बनाया गया था. वरिष्ठ बीजेपी नेता बाबूलाल जैन की अध्यक्षता में बने इस आयोग की अनुशंसा पर ही सामान्य वर्ग के गरीबों को भी उन योजनाओं का लाभ देना शुरू किया गया, जिनका लाभ अनुसूचित जाति वर्ग, जनजाति वर्ग को दिया जाता है. सामान्य वर्ग के निर्धन के लिए सालाना आय सीमा 54 हजार रुपए रखी गई. बाद में इसे बढ़ाकर एक लाख रुपए सालाना कर दिया गया.

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राज्य में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग भी पिछले दस साल से चल रही है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कई बार आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने का वादा भी कर चुके हैं. संवैधानिक प्रावधानों के कारण नौकरी में आरक्षण दिया जाना संभव नहीं है. राज्य में अनुसूचित जाति वर्ग के लिए सोलह प्रतिशत, जनजाति वर्ग के लिए बीस प्रतिशत तथा अन्य पिछड़ा वर्ग वर्ग के लिए चौदह प्रतिशत पद आरक्षित हैं. सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन पचास प्रतिशत तक पद आरक्षित रखने की है.

सरकारी क्षेत्र में आरक्षित पदों का सबसे ज्यादा लाभ अनुसूचित जाति वर्ग को मिल रहा है. प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था से भी यही वर्ग ज्यादा फायदे में रहा है. राज्य में जनजाति वर्ग बीस प्रतिशत होने के बाद भी इस वर्ग के लिए आरक्षित पद कभी भी शत-प्रतिशत नहीं भरे जा सके. सरकार को बारबार बैकलॉग पूरा करने के लिए पदों को भरने की सीमा में छूट देनी पड़ी है.

बीजेपी ने शुरू की पिछड़ों को साधने की कवायद, महाकुंभ का आयोजन

राज्य में चल रहे सवर्ण आंदोलन के बीच सत्ताधारी दल बीजेपी ने ओबीसी वोटों को साधने की कवायद शुरू कर दी है. राज्य में बीजेपी की पहचान बनिया, ब्राह्मण की पार्टी के तौर पर बनी हुई थी. पिछले पंद्रह साल में पार्टी के जो तीन मुख्यमंत्री बने वे सभी पिछड़ा वर्ग के थे. उमा भारती, बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान.

शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री के पद पर तेरह साल पूरे हो गए हैं. वे पार्टी के बड़े ओबीसी नेता के तौर पर उभरकर सामने आए हैं. राज्य में ओबीसी की कुल आबादी को लेकर अलग-अलग आकंडे सामने आते हैं. अस्सी के दशक में बनाए गए रामजी महाजन आयोग ने राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही राज्य में ओबीसी की आबादी को 52 प्रतिशत माना.

सपाक्स के अध्यक्ष रिटायर्ड आईएएस अधिकारी हीरालाल त्रिवेदी का अनुमान है कि राज्य में लगभग 44 प्रतिशत ओबीसी हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पिछले कुछ समय से ओबीसी की विभिन्न जातियों को एक छतरी के नीचे लाने की कोशिश में लगे हुए हैं. इसी कोशिश के तहत ही शिवराज सिंह चौहान प्रदेश के विकास में उमा भारती और बाबूलाल गौर के योगदान का भी जिक्र कर रहे हैं. राज्य में लोधी और यादव वोटर बड़ी संख्या में हैं.

उमा भारती लोधी और गौर यादव जाति से हैं. सवर्ण आंदोलन के बीच पिछड़ा गर्व को साधने के लिए ही पार्टी ने अपने सांसद प्रह्लाद पटेल को जिम्मेदारी सौंपी है. पटेल ने ओबीसी महाकुंभ की तैयारियों के लिए बुलाई गई बैठक में कहा कि सवर्ण और अनुसूचित वर्ग के बीच ओबीसी ने हमेश ही कड़ी का काम किया है. ओबीसी का महाकुंभ दस सिंतबर को बुलाया गया है.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी सवर्ण-दलित का कथित संघर्ष रोकने के लिए ही ओबीसी नेताओं को अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय किया है. राज्य में ओबीसी वोटर बिखरा हुआ है ओर अलग-अलग जातियों में बंटा हुआ. बुंदेलखंड इलाके में लोधी वोटर हैं तो निमाड-मालवा में पाटीदारों की संख्या ज्यादा है. हार्दिक पटेल, पाटीदार वोटरों को एकजुट कर रहे हैं. जिग्नेश मेवाणी के जरिए वे राज्य के दलित वोटरों को भी साथ लेना चाहते हैं. बीजेपी के पास सर्वमान्य दलित नेता नहीं है. वो ग्वालियर-चंबल अंचल में लोधी और दलित को साथ लेना चाहती है.

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