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MP चुनाव: रिकॉर्ड मतदान का फायदा किसे मिलेगा, कांग्रेस-बीजेपी के दावों में कितना दम?

बीजेपी-कांग्रेस की तरफ से जीत के दावे तो जरूर हैं. लेकिन, इतनी बड़ी तादाद में वोटिंग और दावे के बावजूद दोनों पार्टी अंदर खाने डरी हुई हैं.

Updated On: Nov 29, 2018 06:38 PM IST

Amitesh Amitesh

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MP चुनाव: रिकॉर्ड मतदान का फायदा किसे मिलेगा, कांग्रेस-बीजेपी के दावों में कितना दम?

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में इस बार रिकॉर्ड 75 प्रतिशत मतदान हुआ है. प्रदेश के इतिहास में अबतक की सबसे बड़ी वोटिंग के बाद दावे भी खूब हो रहे हैं. बीजेपी की तरफ से एक बार फिर शिव राज का दावा किया जा रहा है. पार्टी का तर्क है कि अधिक मतदान से फायदा उसे ही होगा. दूसरी तरफ, 15 सालों से सत्ता से वनवास झेल रही कांग्रेस को लग रहा है कि अबकी बार कुछ परिवर्तन होगा. इस बार सत्ता में आने की आस लगाए बैठी कांग्रेस भारी मतदान को शिवराज सरकार के खिलाफ नाराजगी का नतीजा बता रही है.

कांग्रेस और बीजेपी दोनों की तरफ से कई दावे किए जा रहे हैं. लेकिन, उन दावों की सच्चाई का पता लगाने के लिए हमें पिछले कई सालों के वोटिंग प्रतिशत को जानना होगा. 1998 में जब कांग्रेस की सरकार बनी थी तो उस वक्त 60.72 प्रतिशत वोटिंग हुई थी. उस वक्त मध्यप्रदेश से अलग छत्तीसगढ़ राज्य नहीं बना था. लेकिन, उसके बाद 2003 में मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में 67.25 फीसदी वोटिंग हुई थी. मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ के अलग होने के बाद यह प्रदेश का पहला चुनाव था. 1998 के मुकाबले सात फीसदी अधिक वोटिंग का सीधा फायदा बीजेपी को मिला. जिसके बाद कांग्रेस की दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली सरकार का सफाया हो गया.

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उस वक्त बीजेपी की सरकार बनी, जिसका नेतृत्व उमा भारती ने किया. बाद में उनकी जगह बाबूलाल गौर और नवंबर 2005 में शिवराज सिंह चौहान को यह जिम्मेदारी दी गई थी. उस वक्त से लेकर अब तक शिवराज सिंह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हैं. 2003 में वोटिंग प्रतिशत बढ़ने का सीधा फायदा बीजेपी को हुआ. क्योंकि इसे लोगों का सत्ता विरोधी रुझान माना गया.

उस वक्त बीजेपी को 173 जबकि कांग्रेस को 38 सीटों पर जीत मिल सकी थी. इसके पांच साल बाद 2008 के विधानसभा चुनाव में भी वोटिंग प्रतिशत लगभग 2 फीसदी बढ़ा लेकिन फायदा बीजेपी को ही रहा. 2008 में 69.28 फीसदी वोटिंग होने के बाद बीजेपी के खाते में 143 और कांग्रेस के खाते में 71 सीटें आई थीं.

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फिर 2013 में भी वोटिंग प्रतिशत 2 फीसदी के लगभग बढ़कर 72.07 फीसदी तक पहुंच गया, उस वक्त भी फायदा सत्ताधारी बीजेपी को ही हुआ. बीजेपी ने 165 जबकि कांग्रेस महज 58 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई. इस बार भी अधिक मतदान का फायदा सीधे बीजेपी को ही मिला. अब एक बार फिर 2018 में 75 फीसदी मतदान हुआ है जो कि पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले तीन फीसदी ज्यादा है.

आंकड़ों के हिसाब से बीजेपी फिर दावा कर रही है. पार्टी को लगता है कि यह एंटीइंकंबेंसी का प्रभाव नहीं है, बल्कि बीजेपी का वोटर अधिक तादाद में मतदान-केंद्र तक पहुंचा है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने फिर से शानदार जीत का दावा किया है. बीजेपी के रणनीतिकारों को लगता है कि बीजेपी के बूथ लेवेल के कार्यकर्ताओं की मेहनत और पार्टी का माइक्रो मैनेजमेंट कारगर रहा है, जिससे बीजेपी का वोटर अधिक तादाद में मतदान-केंद्र तक पहुंचा है. बीजेपी नेताओं का दावा है कि इस बार भी मध्य प्रदेश में बीजपी की ही सरकार बनेगी.

बीजेपी प्रवक्ता राहुल कोठारी फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में कहते हैं, 'शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने पब्लिक कनेक्ट के लिए काफी काम किया है. किसान, यूथ, महिला और बच्चियों के लिए भी चलाई गई सभी योजनाओं का असर है कि लोगों से बीजेपी सरकार का पब्लिक कनेक्ट बढ़ा है.'

राहुल खासतौर पर प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, किसानों के लिए भावांतर योजना और मजदूरों के लिए चलाई गई संबल योजना को अधिक वोटिंग का कारण बता रहे हैं. बीजेपी का दावा है कि समाज के हर तबके के लिए शिवराज सिंह चौहान ने काम किया है जिसके कारण लोगों ने मतदान किया है. दूसरी तरफ, बीजेपी अपने वोटरों को मतदान-केंद्र तक ले जाने में सफल रही है.

उधर, कांग्रेस को लग रहा है कि अधिक मदतान का फायदा उसे ही होगा. कांग्रेस नेता तो बीजेपी की हार और कांग्रेस की जीत का दावा कर रहे हैं. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ को बीजेपी को हराकर शिवराज सरकार के तख्तापलट का इस बार भरोसा काफी ज्यादा है. तभी तो कमलनाथ ने मतदान खत्म होने के बाद कहा, दो चीजें शांति से निपट गईं-'एक चुनाव और दूसरी बीजेपी.'

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दरअसल, कांग्रेस को उम्मीद इस बात से है कि शिवराज सरकार के लगातार सत्ता में रहने के कारण समाज के कई वर्ग खफा हैं. किसानों के आंदोलन और मंदसौर में हुई हिंसा के कारण भी किसान नाराज है. इसके अलावा व्यापम घोटाले से लेकर कई दूसरे मुद्दों के चलते भी शिवराज सरकार की छवि पर असर हुआ है. युवाओं के भीतर नए रोजगार के अवसर नहीं होने के चलते नाराजगी है. कांग्रेस इन्हीं नाराजगी से अपने लिए जगह तलाश रही है.

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पूरे चुनाव प्रचार के दौरान भी कांग्रेस की तरफ से सॉफ्ट हिंदुत्व कार्ड ही खेलने की कोशिश की गई थी. शिवभक्ति से रामभक्ति दिखाने की कांग्रेस की कोशिश रही थी. लेकिन, कमलनाथ का अल्पसंख्यक समाज को लेकर दिया गया बयान कांग्रेस के लिए नुकसान वाला हो सकता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर मुस्लिम 90 फीसदी तक मदतान नहीं करेंगे तो कांग्रेस का नुकसान होगा. बीजेपी की तरफ से चुनाव के दिन ही विज्ञापन के जरिए 90 फीसदी मतदान की अपील की गई थी. इसे कमलनाथ के बयान की याद दिलाकर उसका सियासी फायदा उठाने की कोशिश के तौर पर देखा गया.

मध्यप्रदेश की जनता ने 90 फीसदी तो नहीं लेकिन, 75 फीसदी मतदान कर रिकॉर्ड बनाया है. बीजेपी-कांग्रेस की तरफ से जीत के दावे तो जरूर हैं. लेकिन, इतनी बड़ी तादाद में वोटिंग और दावे के बावजूद दोनों पार्टी अंदर खाने डरी हुई हैं.

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