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मध्य प्रदेश चुनाव: सिंधिया की राह में रुकावट बन रहे हैं परंपरागत विरोधी

राज्य में मैदानी कार्यकर्ता लगातार ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने की मांग कर रहा है. लेकिन, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राज्य में किसी भी नेता को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट न करने का फैसला कर लिया है

Updated On: Nov 02, 2018 07:22 AM IST

Dinesh Gupta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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मध्य प्रदेश चुनाव: सिंधिया की राह में रुकावट बन रहे हैं परंपरागत विरोधी
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मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण के कुछ घंटे पहले राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच कथित तौर पर हुई तू-तू,मैं-मैं की खबर से कांग्रेस की राजनीति में एक बार फिर गुटबाजी हावी होती दिखाई दे रही है. हालांकि कांग्रेस के प्रवक्ता किसी भी विवाद से इनकार कर रहे हैं. लेकिन, विवाद की खबरों को कांग्रेसी असामान्य घटना भी नहीं मानते हैं. सिंधिया-दिग्विजय सिंह का विवाद अक्सर सामने आता रहता है. सिंधिया का संसदीय क्षेत्र और दिग्विजय सिंह का गृह जिला एक ही है.

सिंधिया और दिग्विजय सिंह के बीच विवाद दूरी होने के कुछ एतिहासिक कारण हैं जो राजे-रजवाड़ों के दौर से जुड़े हुए हैं. ग्वालियर के महल और राघोगढ़ के किले के बीच स्थिति हमेशा टकराव की रही है. दिग्विजय सिंह राघोगढ़ के राज परिवार से हैं. इसका असर आज भी कांग्रेस और बीजेपी की राजनीति में देखने को मिलता है. राज्य कांग्रेस में पिछले चार दशक से राजनीति सिंधिया के समर्थन और विरोध के बीच ही चल रही है. माधवराव सिंधिया भी इसी राजनीति के चलते कभी राज्य के मुख्यमंत्री नहीं बन पाए थे.

ज्योतिरादित्य सिंधिया को नहीं बनने दिया मुख्यमंत्री का चेहरा

राज्य में मैदानी कार्यकर्ता लगातार ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने की मांग कर रहा है. लेकिन, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राज्य में किसी भी नेता को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट न करने का फैसला कर लिया है. ज्योतिरादित्य सिंधिया राज्य में कांग्रेस की कमान थामने के लिए भी तैयार थे. लेकिन, विरोध कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की ओर से हो रहा था. ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्य की राजनीति में रोकने के लिए ही कमलनाथ ने मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के लिए अपनी दावेदारी को आगे बढ़ाया था. कमलनाथ की इस दावेदारी को दिग्विजय सिंह का पूरा समर्थन था. दिग्विजय सिंह दस साल तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं. उन्हें कमलनाथ का खुला समर्थन मिला हुआ था.

Rahul Gandhi in Dhar Dhar: Congress President Rahul Gandhi waves at the crowd at a public meeting in Dhar district, Madhya Pradesh, Tuesday, Oct 30, 2018. (PTI Photo) (PTI10_30_2018_000121B)

दिग्विजय सिंह को अर्जुन सिंह गुट का ही माना जाता रहा है. अस्सी के दशक से राज्य कांग्रेस की राजनीति दो गुटों में बंटी रही है- अर्जुन सिंह और माधवराव सिंधिया. दिल्ली की राजनीति में अर्जुन सिंह को कमलनाथ का साथ हमेशा ही मिलता रहा है. कमलनाथ की मदद से ही अर्जुन सिंह हमेशा ही माधवराव सिंधिया को मुख्यमंत्री बनने से रोकने में सफल होते रहे हैं. साल 1989 में चुरहट लाटरी कांड में हाईकोर्ट के फैसले के बाद अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा था. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी, माधवराव सिंधिया को राज्य का मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन विधायकों के बहुमत के आधार पर अर्जुन सिंह, सिंधिया के नाम पर सहमत नहीं हुए. तीन दिन तक भोपाल में कांग्रेसी विधायक अर्जुन सिंह के करीबी माने जाने वाले हरवंश सिंह के निवास पर नजरबंद रहे. बाद में सहमति मोतीलाल वोरा के नाम पर बनी.

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चार दशक बाद भी राज्य की राजनीति में कोई बड़ा परिवर्तन दिखाई नहीं दिया है. कांग्रेस की राजनीति अभी भी सिंधिया विरोधी और सिंधिया समर्थकों के बीच बंटी हुई दिखाई दे रही है. कमलनाथ-दिग्विजय सिंह के अलावा राज्य की राजनीति में प्रतिपक्ष के नेता अजय सिंह भी लड़ाई का महत्वपूर्ण चेहरा हैं. अजय सिंह, स्वर्गीय अर्जुन सिंह के पुत्र हैं. दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह कांग्रेस के विधायक हैं. पीढ़ी बदलने के बाद भी राज्य की राजनीति में गुटिय लड़ाई में बदलाव नहीं आया है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया को अलग-थलग करने की राजनीति

राज्य के कांग्रेसी नेताओं के बीच की गुटबाजी पर लगाम लगाने के लिए हर बड़े नेता को अलग-अलग जिम्मेदारी दी गई है. कमलनाथ को अध्यक्ष बनाने के साथ ही ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रचार समिति का अध्यक्ष और दिग्विजय सिंह को समन्वय की जिम्मेदारी दी गई. पिछले तीन चुनावों में कांग्रेस को मिली हार के पीछे जो बड़ी वजह सामने आई थी, उसमें दिग्विजय सिंह समर्थकों द्वारा भितरघात करना प्रमुख था. दिग्विजय सिंह राज्य के अकेले ऐसे नेता हैं, जिनके समर्थक गांव-गांव में हैं. दिग्विजय सिंह के समर्थक पिछले पंद्रह साल में उनको (दिग्विजय सिंह) लेकर वोटरों की नाराजगी को दूर नहीं कर पाए हैं.

भारतीय जनता पार्टी हर चुनाव में दिग्विजय सिंह शासनकाल की याद दिलाकर अपनी सत्ता बचाने में कामयाब रही है. साल 2003 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद दिग्विजय सिंह ने अपनी प्रतिज्ञा के चलते दस साल तक राज्य की राजनीति में कोई सक्रिय भूमिका अदा नहीं की. साल 2008 का विधानसभा चुनाव पार्टी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी के नेतृत्व में लड़ा था. उस वक्त भी टिकट के बंटवारे को लेकर विवाद की स्थिति बनी थी. सुरेश पचौरी ने दस जनपथ के अपने संपर्कों के आधार पर समर्थकों को टिकट तो दिला दिए लेकिन, सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं जुटा सके. सुरेश पचौरी को भी राज्य की राजनीति का महत्वपूर्ण चेहरा माना जाता है. किसी दौर में वे मोती-माधव एक्सप्रेस का हिस्सा रहे थे. वर्तमान में वे कमलनाथ के ज्यादा नजदीक माने जा रहे हैं. वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में भी तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रचार अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया था.

प्रदेश कांग्रेस की कमान कांतिलाल भूरिया को सौंपी गई थीं. भूरिया आदिवासी नेता हैं. वे भी दिग्विजय सिंह गुट के ही माने जाते रहे हैं. भूरिया के नेतृत्व में हुए चुनाव में सिंधिया के चेहरे का उपयोग गुटबाजी के चलते नहीं किया गया. नतीजा कांग्रेस फिर एक बार चुनाव हार गई. स्थिति में कोई बड़ा बदलाव अभी भी देखने को नहीं मिल रहा है. सिंधिया, प्रचार समिति के प्रमुख जरूर हैं लेकिन, प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने प्रचार के लिए उनका उपयोग अब तब नहीं किया है. सिंधिया ने राज्य के बीस से अधिक जिलों में रैलियां की हैं.

Rahul Gandhi in Indore Indore: Congress President Rahul Gandhi enjoys snacks Madhya Pradesh Congress President Kamal Nath, State Election Campaign Committee Chairman Jyotiraditya Scindia and other leaders at a restaurant in Indore, Madhya Pradesh, Monday, Oct 29, 2018. (PTI Photo) (PTI10_30_2018_000065B) *** Local Caption ***

टिकट के बंटवारे से पक्की करना चाहते हैं मुख्यमंत्री की कुर्सी

ज्योतिरादित्य सिंधिया, पिता माधवराव सिंधिया की विमान दुर्घटना में हुई मौत के बाद वर्ष 2002 में कांग्रेस की सक्रिय राजनीति में आए. राज्य में उनका मुकाबला पिता माधवराव सिंधिया के परंपरागत विरोधियों से हो रहा है. पिछले सोलह साल में कई मौकों पर सिंधिया को अलग-थलग करने की कोशिश विरोधी गुट द्वारा की जाती रही है. सिंधिया चुनाव के बाद मुख्यमंत्री न बन जाएं इसकी कवायद विरोधी गुट ने टिकट वितरण में ही करना शुरू कर दी.

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दिग्विजय सिंह अपने कुछ समर्थकों को कमलनाथ के जरिए टिकट दिलाना चाहते हैं. अजय सिंह भी कमलनाथ की मदद ले रहे हैं. सुरेश पचौरी, सिंधिया और कमलनाथ दोनों के ही जरिए अपने समर्थकों को टिकट दिलाने में लगे हुए हैं. ऊपरी तौर देखा जाए तो यह लगता है कि कांग्रेस छोटे-छोटे गुटों में बंटी हुई है. वास्तविक रूप में आज भी कांग्रेस में दो गुट ही दिखाई दे रहे हैं. एक गुट सिंधिया का है. दूसरा गुट दिग्विजय सिंह का है, जिसका नेतृत्व कमलनाथ कर रहे हैं. सिंधिया विरोधी गुट अपने आपको अलग-अलग दिखाकर ज्यादा टिकट हासिल करना चाहता है.

इसके पीछे रणनीति यह है कि चुनाव बाद यदि बहुमत आता है तो विधायकों की संख्या के आधार पर मुख्यमंत्री का चुनाव हो सके. यहां उल्लेखनीय है कि साल 1980 में जब अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया था, उस वक्त बहुमत शिवभानु सिंह सोलंकी के साथ था. लेकिन, कमलनाथ ने संजय गांधी की मदद से अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री बनवा दिया था. वर्तमान राजनीति में राहुल गांधी के सबसे करीबी नेताओं में ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम लिया जाता है.

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