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MP विधानसभा चुनाव: एससी/एसटी बिल पर सवर्णों का भारी विरोध झेलते नेता

केंद्र सरकार द्वारा अनुसूचित जाति,जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में किए गए संशोधन के खिलाफ मध्यप्रदेश में सामान्य वर्ग सड़कों पर उतर कर अपना विरोध प्रकट कर रहा है.

Updated On: Sep 03, 2018 04:11 PM IST

Dinesh Gupta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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MP विधानसभा चुनाव: एससी/एसटी बिल पर सवर्णों का भारी विरोध झेलते नेता
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केंद्र सरकार द्वारा अनुसूचित जाति,जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में किए गए संशोधन के खिलाफ मध्यप्रदेश में सामान्य वर्ग सड़कों पर उतर कर अपना विरोध प्रकट कर रहा है. पिछले चार दिन में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में सामान्य वर्ग के लोगों ने भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के सांसदों एवं विधायकों का घेराव किया. काले झंडे दिखाए जा रहे हैं और जनप्रतिनिधियों से पूछा जा रहा है कि संशोधन बिल का विरोध क्यों नहीं किया?

केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर,थावरचंद्र गहलोत और एमजे अकबर, कांग्रेस नेता कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया लोगों के गुस्से का सामना कर चुके हैं. लोगों की नाराजगी को देखते हुए राज्य में मंत्रियों और विधायकों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है. कई जनप्रतिनिधियों को अपने तय कार्यक्रम भी निरस्त करना पड़ रहे हैं.

ग्वालियर एवं चंबल संभाग में स्थिति संवेदनशील : टकराव के आसार

इसी साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज होने के बाद गिरफ्तार किए जाने के प्रावधान को विलोपित कर दिया था. कोर्ट ने जांच के बाद ही गिरफ्तार किए जाने के लिए कहा था. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से अनुसूचित जाति वर्ग नाराज हो गया. दो अप्रैल को अनुसूचित जाति वर्ग द्वारा विरोधस्वरूप बंद आयोजित किया था. इस बंद के दौरान मध्यप्रदेश के ग्वालियर एवं चंबल संभाग में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी. केंद्र सरकार ने इसके बाद ही संसद में एक संशोधन बिल पेश कर जांच किए बगैर गिरफ्तार किए जाने का प्रावधान फिर जोड़ दिया.

इससे सामान्य वर्ग नाराज हो गया. मध्यप्रदेश में इस संशोधन बिल का जगह-जगह विरोध हो रहा है. सबसे ज्यादा विरोध ग्वालियर एवं चंबल संभाग में देखा जा रहा है. पिछले चार दिनों से इस संभाग के कांग्रेस और बीजेपी के बड़े नेताओं का लगातार घेराव किया जा रहा है. काले झंडे दिखाए जा रहे हैं.

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बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा और कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का घेराव किया जा चुका है. रविवार को प्रदर्शनकारियों ने ग्वालियर में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के बंगले का घेराव भी किया था. इस घेराव के बाद मंत्रियों एवं विधायकों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है. ग्वालियर में उच्च शिक्षा मंत्री जयभान सिंह पवैया के घर से बाहर नहीं निकल पाए थे. संभाग के ही गुना जिले में अनुसूचित जाति वर्ग के विधायक गोपालील जाटव का घेराव कर सामान्य वर्ग उनसे यह सवाल कर चुका है कि वे इस वर्ग के लिए क्या करेंगे?

अशोकनगर में सिंधिया से आंदोलनकारियों ने पूछा था कि सामान्य वर्ग के हितों के लिए उनकी पार्टी क्या कर रही है? सिंधिया ने जवाब में कहा कि कांग्रेस पार्टी की नीति है कि निर्दोष को सजा नहीं होना चाहिए. भिंड के सांसद डॉ. भागीरथ प्रसाद को आंदोलनकारियों से बचने के लिए एसपी की गाड़ी में बैठकर जाना पड़ा. अनुसूचित जाति के आंदोलन के बाद सामान्य वर्ग के इस आंदोलन ने सरकार को चिंता में डाल दिया है. राज्य में दो माह बाद विधानसभा के चुनाव हैं. चुनाव से ठीक पहले सामने आई सामान्य वर्ग की इस नाराजगी का तोड़ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान नहीं ढूंढ पा रहे हैं. बीजेपी के भीतर भी असंतोष देखने का मिल रहा है. पार्टी की श्योपुर जिला इकाई के कोषाध्यक्ष नरेश जिंदल ने संशोधन के विरोध में पार्टी से इस्तीफा दे दिया है.

सामान्य वर्ग की नाराजगी के कारण बनेंगे त्रिशंकु सरकार के हालात

दो माह बाद होने वाले मध्यप्रदेश विधानसभा के आम चुनाव से पहले सामान्य वर्ग जिस तरह से आरक्षण के खिलाफ सड़कों पर उतर रहा है, उससे राज्य में त्रिशंकु सरकार बनने के हालात बन रहे हैं. सामान्य वर्ग की नाराजगी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी से समान रूप से दिखाई दे रही है.

सामान्य, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक वर्ग का संगठन सपाक्स ने 6 सितंबर के कथित बंद को अपना समर्थन दिया है. सपाक्स ने चुनाव आयोग में राजनीतिक दल के तौर पर अपने को पंजीकृत कराने के लिए आवेदन भी किया है. सपाक्स पहले ही ऐलान कर चुका है कि वो विधानसभा के आम चुनाव में सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगा.

एससी-एसटी सीटों की रहती है सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका

राज्य में विधानसभा की कुल 230 सीटें हैं. इनमें 35 सीट अनुसूचित जाति वर्ग तथा 47 सीटें जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में आरक्षित वर्ग की कुल 47 सीटों में से 15 सीट ही कांग्रेस को मिल पाईं थीं. बीजेपी 32 सीटें जीतने में सफल रही थी. वहीं अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित 35 सीटों में से मात्र चार सीट पर ही कांग्रेस जीत पाई थी. कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनाव में आदिवासी कार्ड खेल था. कांतिलाल भूरिया प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे.

आदिवासी वर्ग कांग्रेस का परंपरागत वोटर है, यह धारणा भी पिछले चुनाव में टूट गई थी. अनुसूचित जाति वर्ग में भी कांग्रेस की पकड़ कमजोर हुई थी. जबकि वर्ष 2003 में दिग्विजय सिंह की सरकार दलित एजेंडा के कारण ही सरकार से गई थी. दिग्विजय सिंह सरकार के दलित एजेंडा से सामान्य वर्ग नाराज था. इसका खामियाजा कांग्रेस को चुनाव में भुगतना पड़ा था. सामान्य वर्ग की नाराजगी मोल लेने के बाद भी अनुसूचित जाति वर्ग ने चुनाव में कांग्रेस का साथ नहीं दिया था.

आरक्षित वर्ग की कुल 82 सीटों पर जो भी राजनीतिक दल अपनी पकड़ बना लेता है, राज्य में सरकार उसी पार्टी की बनती है. पिछले चुनाव में कांग्रेस सिर्फ 19 सीटें ले पाई थी. 63 सीटें बीजेपी के खाते में गईं थीं. राज्य में सरकार बनाने के लिए 116 सीटों की जरूरत होती है. कांग्रेस को मात्र 58 सीटें मिली थीं.

पदोन्नति में आरक्षण से शुरू हुई है सामान्य वर्ग की नाराजगी

आमतौर पर मध्यप्रदेश में आरक्षण के खिलाफ सामान्य वर्ग एकजुट नहीं होता है. लगभग दो वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण के नियम को असंवैधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया था.

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हाईकोर्ट के इस निर्णय के खिलाफ मध्यप्रदेश की बीजेपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील में चली गई. इसके साथ ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के कर्मचारियों से कहा कि प्रदेश में कोई माई का लाल ऐसा नहीं है, जो पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त करा सके.

मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद ही सामान्य वर्ग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने एकजुट होना शुरू कर दिया. सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति में आरक्षण समाप्त करने की लड़ाई सपाक्स द्वारा लड़ी जा रही है.

सपाक्स संगठन सामान्य,पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को साथ लेकर बना है. सपाक्स को अनुसूचित जाति,जनजाति अधिकारी एवं कर्मचारी वर्ग के संगठन अजाक्स का जवाब माना जाता है.

नोटा के उपयोग को लेकर है अलग-अलग राय

अनुसूचित जाति और जनजाति के मामले में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की नीति एक जैसी हो जाने के बाद सामान्य वर्ग किसी अन्य राजनीतिक विकल्प की तलाश कर रहा है. अभी कोई सशक्त विकल्प सामने नहीं है.

एक मात्र सपाक्स है, जिसकी राजनीतिक इकाई के अध्यक्ष हीरालाल त्रिवेदी ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है. सामान्य वर्ग नोटा के उपयोग पर भी विचार कर रहा है. एक वर्ग का यह मानना है कि यदि चुनाव में नोटा का उपयोग किया जाता है तो इससे राजनीतिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आएगा. राजनीतिक दल इसका भी लाभ उठा लेंगे.

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