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मध्यप्रदेश चुनाव: बदले चुनाव के तरीके, हाईटेक हुई पार्टियां तो नेता घूम रहे हैं मंदिर-मंदिर

जहां पहले चुनावों में नेता प्रचार-प्रसार के लिए घर-घर जाते थे, गांवों में डेरा जमाते थे लोगों के पैर तक पखारते थे, वहीं इस बार नेतागण मंदिर-मंदिर घूम रहे हैं

Updated On: Oct 30, 2018 08:19 AM IST

Nitesh Ojha

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मध्यप्रदेश चुनाव: बदले चुनाव के तरीके, हाईटेक हुई पार्टियां तो नेता घूम रहे हैं मंदिर-मंदिर
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मध्य प्रदेश चुनावों की घोषणा तो हाल ही में हुई है लेकिन इनकी तैयारियां और प्रचार तो राजनीतिक दल और इनके हुक्मरान बहुत पहले से ही कर रहे थे. हालांकि इस बार के विधानसभा चुनाव में प्रचार के तौर तरीकों में पिछली बार की तुलना काफी बदलाव देखने को मिले हैं.

जहां पहले चुनावों में नेता प्रचार-प्रसार के लिए घर-घर जाते थे. गांवों में डेरा जमाते थे लोगों के पैर तक पखारते थे. वहीं इस बार नेतागण मंदिर-मंदिर घूम रहे हैं. अगर बात उनकी पार्टियों की करें तो वो तो ये मानो कि लोगों को तकनीक के माध्यम से हर पल यह महसूस करा रही हैं कि चुनाव आ गए हैं.

हालांकि ऐसा हमेशा से नहीं हो रहा है. पहले चुनावों की घोषणा के बाद यह जिम्मा इलाके के बच्चों का होता था. जो छोटी-छोटी टोली बना कर राजनीतिक दलों के रंगों से पुती टोपियां, बैच वगैरह लगा कर गली-गली नारे लगाते फिरते थे. वो वोट तो नहीं डाल सकते थे लेकिन चुनावों की उत्सुकता में प्रचार करने वाली गाड़ी के पीछे-पीछे दौड़ते जरूर थे.

पहले पार्टियां भी प्रचार के समय बिल्ले (बैज), टोपी, अपने-अपने दलों की छाप वाली बिंदी वगैरह छपवाती थीं. और यह दीवारों से लेकर लोगों के घर के आईनों तक पर चिपके रहते थे. इसी से आभास होता था कि जल्द ही लोकतंत्र का त्योहार आने वाला है. लेकिन अब राजनीतिक पार्टियां हाईटेक हो गई हैं और राजनेता भी जनता से ज्यादा भगवान के चरणों में नजर आ रहे हैं.

सोशल मीडिया बना प्रचार का सबसे बड़ा माध्यम

पार्टियों के प्रचार की बात करें तो राज्य और केंद्र की सत्ता में काबिज बीजेपी फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल साइट्स पर ‘अबकी बार दो सौ पार’ अभियान चला रही है. तो वहीं राज्य में सत्ता के वनवास को खत्म करने की कोशिश में कांग्रेस ने भी 'वक्त है बदलाव का' मुहीम छेड़ रखी है.

मध्य प्रदेश चुनाव में प्रचार सिर्फ सोशल मीडिया साइट्स के दंगल तक ही सीमित नहीं है. बीजेपी के साइबर योद्धा बनाम कांग्रेस के सोशल सिपाहियों के बीच जंग के साथ इन दोनों पार्टियों के प्रमुख मंदिर-मंदिर घूम कर वोट तलाशने की जुगत में लगे हैं.

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के मुखिया राज्य के सत्ता वाले वनवास से निजात पाने के लिए चित्रकूट में भगवान राम की शरण में पहुंचे और यहीं से उन्होंने इस राज्य में चुनाव प्रचार की शुरुआत की. खैर इससे पहले ही वह कैलाश मानसरोवर पर भोले नाथ से भी आशीर्वाद ले आए थे.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने नर्मदा में आरती कर ली है, दतिया की पीतांबरा शक्तिपीठ में भी माथा टेक चुके हैं. और अब तो उन्होंने महाकाल के भी दर्शन पा लिए हैं. मंदिर-मंदिर की दौड़ में राज्य के मुखिया और बीजेपी नेता शिवराज सिंह चौहान भी पीछे नहीं हैं.

शिवराज ने भी 14 साल शासन करने के बाद अपने जनआशीर्वाद की शुरुआत उज्जैन के महाकाल मंदिर से की. शिवराज ने जनता से आशीर्वाद के लिए निकाली यात्रा के दौरान विंध्य में मैहर वाली शारदा देवी और पीतांबरा पीठ में बगुलामुखी देवी से भी आशीर्वाद लिया.

राम नाम जपते हुए सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेता होने के तौर पर शिवराज ने भी यह रश्म बाकायदा निभाई है. शिवराज अयोध्या के राम मंदिर पर तो खामोश रहे लेकिन ओरछा के रामराजा मंदिर में जरूर माथा टेक आए.

230 में से 160 पर हैं धार्मिक स्थलों का प्रभाव

राजनीतिक दलों के हाईटेक होने के इस दौर में राजनेताओं के मंदिरों की सीढ़ियां चढ़ने की रणनीति का कारण है स्थानीय मंदिरों का वहां कि जनता से लगाव. राज्य में 230 में से तकरीबन 160 सीटें वहां के स्थानीय धार्मिक स्थलों से प्रभावित हैं. पिछले चुनावों में इन सीटों पर से ज्यादा पर बीजेपी का कब्जा रहा है.

पिछले विधानसभा चुनावों की बात की जाए तो मंदिर-मंदिर की रणनीति का लाभ बीजेपी को मिलता रहा है. ऐसे में कांग्रेस भी अब इस ट्रैंड को अपनाना चाहती है. हालांकि बीजेपी इस ट्रैंड को जारी रख इन धार्मिक स्थलों से प्रभावित सीटों पर अपना कब्जा ही जारी रखना चाहती है.

सीटों पर जिन धार्मिक स्थलों का असर रहा है उनमें प्रमुख हैं महाकाल मंदिर जिसका असर मालवा की लगभग 32 सीटों पर है. इसमें से ज्यादातर पर अभी बीजेपी का कब्जा है. वहीं ग्वालियर और चंबल संभाग की करीब 28 सीटों पर पीतांबरा पीठ का असर रहता है.

मैहर और चित्रकूट का विंध्य की 28 सीटों पर तो बुंदेलखंड इलाके के ओरछा मंदिर का भी 11 सीटों पर गहरा प्रभाव रहता है. मंदिरों से इतर नर्मदा का भी मध्य प्रदेश की राजनीति पर गहरा असर रहता है. इसका ज्यादातर प्रभाव अमरकंटक, होशंगाबाद, खंडवा, जबलपुर आदि जिलों की जनता पर है.

ऐसे में जहां राजनीतिक पंडित कयास लगा रहे हैं कि बीजेपी के डेढ़ दशकों के शासन को खत्म कर कांग्रेस सत्ता में काबिज हो सकती है. तो वहीं कांग्रेस सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के लिए जनता जनार्दन की जगह मंदिरों की सीढ़ियां चढ़ रही है.

हालांकि बीजेपी भी अपना पूरा जोर लगा कर राज्य में शिवराज का ही राज कायम रखने की जद्दोजहत में लगी है. इसके लिए उसने भी जनता से पहले भगवान के चरणों में अर्जी लगाई है.

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