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MP विधानसभा चुनाव: विजयाराजे सिंधिया के जरिए विजय पाने की कोशिश में जुटी बीजेपी

सिंधिया को घेरने की बीजेपी की तमाम कोशिशें कामयाब नहीं हुईं हैं. मजबूरन पार्टी को विजयाराजे सिंधिया के नाम का उपयोग इस चुनाव में करना पड़ रहा है.

Updated On: Oct 12, 2018 05:41 PM IST

Dinesh Gupta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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MP विधानसभा चुनाव: विजयाराजे सिंधिया के जरिए विजय पाने की कोशिश में जुटी बीजेपी

ग्वालियर के सिंधिया राज परिवार की महारानी स्वर्गीय विजयाराजे सिंधिया का आज सौवां जन्म दिन है. उनकी दोनों बेटी वसुंधरा राजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया ने ट्विटर अपनी मां कई पुरानी तस्वीरें साझा करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी. उनके पोते कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस मौके पर कोई ट्वीट किया या नहीं इसे जानने की खासी दिलचस्पी बीजेपी में देखी गई.

ज्योतिरादित्य सिंधिया का कोई ट्वीट दोपहर तक नहीं आया. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ग्वालियर में जन्मशती समारोह का शुभारंभ किया. इस मौके पर कमलशक्ति दल की मैराथन दौड को हरी झंडी दिखाई. यह मैराथन दौड़ दिल्ली तक होगी. चार राज्यों से होकर गुजरेगी. इसमें राजस्थान भी है.

बीजेपी को खड़ा करने में थी विजयाराजे की महत्वपूर्ण भूमिका

विजयाराजे सिंधिया ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की थी. साठ के दशक में कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र से मतभेद होने के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी थी. वर्ष 1967 में राज्य में पहली मिलीजुली सरकार बनाने का श्रेय विजयाराजे सिंधिया को ही जाता है. विजयाराजे सिंधिया ने द्वारका प्रसाद मिश्र की सरकार गिराकर गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में संविदा सरकार बनाई थी. संविदा सरकार सिर्फ दो साल से भी कम चली.

विजयाराजे सिंधिया ने एक बार कांग्रेस छोड़ी तो फिर पलटकर नहीं गईं. उन्हें कांग्रेस में लाने के लिए इंदिरा गांधी ने कई तरह के दबाव का प्रयोग किया. आपातकाल के दौरान उन्हें जेल में डाल दिया गया लेकिन, विजयाराजे सिंधिया नहीं झुकीं. उनके पुत्र माधवराव सिंधिया जरूर कांग्रेस में शामिल हो गए थे. कहा यह जाता है कि आपातकाल में माधवराव सिंधिया के सामने ही विजयाराजे सिंधिया को पुलिस महल से खींचकर ले गई थी. वे अपनी मां की गिरफ्तारी पर चुप रहे. विजयाराजे सिंधिया के जनसंघ से जुड़ जाने के बाद ग्वालियर का राज महल पार्टी की गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र था.

विजयाराजे सिंधिया बीजेपी की संस्थापक सदस्य थीं. पार्टी चलाने के लिए विजयाराजे सिंधिया ने अपने गहने भी बेच दिए थे. इसका खुलासा राज्य की खेल मंत्री यशोधराजे सिंधिया ने उस वक्त किया था, जब अटेर विधानसभा के उप चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक जनसभा में कहा कि 1857 में सिंधिया राजघराने द्वारा अंग्रेजों की मदद किए जाने के कारण ही महारानी लक्ष्मीबाई को बलिदान देना पड़ा. पिछले दो साल से यशोधरा राजे सिंधिया पार्टी में अपनी मां की उपेक्षा के खिलाफ लड़ रही थीं.

दो माह पूर्व प्रदेश बीजेपी कार्यालय में हुई कार्यसमिति की बैठक में विजयाराजे सिंधिया का फोटो न होने पर यशोधरा राजे सिंधिया बैठक छोड़कर चलीं गईं थीं. विजयाराजे सिंधिया की जन्मशती मनाने का ऐलान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी भोपाल यात्रा के दौरान किया था.

माधवराव सिंधिया के कांग्रेस में जाने से दुखी रहती थीं विजयाराजे

मध्यप्रदेश में विजयाराजे सिंधिया की पहचान राजमाता के तौर पर ही है. जनसंघ और बीजेपी से जुड़े नेता भी उन्हें राजमाता के नाम से ही संबोधित किया करते थे. माधवराव सिंधिया उनके इकलौते पुत्र थे. तीन में से दो बेटी वसुंधरा राजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया भारतीय जनता पार्टी की नेता हैं. माधवराव सिंधिया ने लोकसभा का पहला चुनाव जनसंघ से ही लड़ा था. आपातकाल के बाद हुए चुनाव में वे निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर गुना संसदीय सीट से चुनाव लड़े और जीत गए.

बाद में माधवराव सिंधिया कांग्रेस में शामिल हो गए. माधवराव सिंधिया का कांग्रेस में जाना उनकी मां को पसंद नहीं आया. मां-बेटे के बीच बातचीत भी बंद हो गई. माधवराव सिंधिया संपत्ति के बंटवारे को लेकर भी अपनी मां से नाराज थे. ग्वालियर की हिरण्यवन कोठी पर कब्जे के मामले में तीन दशक तक चला मुकदमा पिछले साल ही खत्म हुआ है. संपत्ति का विवाद आज भी ग्वालियर की अदालत में चल रहा है. मुकदमा ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी तीनों बुआ के बीच चल रहा है.

बीच में कोर्ट के बाहर समझौते का प्रयास ज्योतिरादित्य सिंधिया की ओर से किया गया था लेकिन, बात बनी नहीं. ग्वालियर संभाग की राजनीति में सिंधिया परिवार का खासा असर देखा जाता है. मध्यप्रदेश बनने के लगभग डेढ़ दशक बाद तक कई नेता सिर्फ महल का उम्मीदवार होने के नाते ही चुनाव जीत जाते थे. भले ही कोई भी चुनाव चिन्ह हो.

राज्य में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दो ही मुख्य राजनीतिक दल हैं. सिंधिया परिवार का असर दोनों राजनीतिक दल में समान रूप से देखा जाता रहा है. विजयाराजे सिंधिया के निधन के बाद भारतीय जनता पार्टी में उनकी उत्तराधिकारी यशोधरा राजे सिंधिया हैं लेकिन,उम्मीदवारों के चयन में उनकी कोई भूमिका देखने में नहीं आती. पार्टी में महल की राजनीति भी दो धड़ों में दिखाई देती है.

दूसरा धड़े के तौर पर राज्य की नगरीय प्रशासन मंत्री माया सिंह को देखा जाता है. माया सिंह, विजयाराजे सिंधिया के भाई ध्यानेंद्र सिंह की पत्नी हैं. ध्यानेंद्र सिंह भी बीजेपी सरकार में मंत्री रहे हैं. बीजेपी में महल विरोधियों की संख्या भी बढ़ गई है. बीजेपी ने भी महल की राजनीति को छोड़ दिया था. लंबे समय बाद चुनाव के वक्त एक बार फिर बीजेपी विजयाराजे सिंधिया की जन्मशती के बहाने महल की राजनीति कर रही है.

राजनीति में सिंधिया परिवार का मतलब अब ज्योतिरादित्य सिंधिया से है

माधवराव सिंधिया के निधन के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस की राजनीति में उतर आए. उन्हें भारतीय जनता पार्टी में लाने की कोशिश पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी की थी. पारिवारिक स्थितियों के चलते ही ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस को चुना था. ज्योतिरादित्य सिंधिया को अभी सिर्फ सोलह साल ही कांग्रेस की राजनीति में हुए हैं.

इन सोलह सालों में वे राज्य कांग्रेस की राजनीति में ताकतवर होकर उभरे हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से निकटता इसकी बड़ी वजह है. सिंधिया ने अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि का उपयोग भी राजनीति में किया है. जबकि यशोधरा राजे सिंधिया ने अपने आपको सिर्फ अपने निर्वाचन क्षेत्र शिवपुरी तक सीमित रखा है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया का असर ग्वालियर एवं चंबल की संभाग की 34 सीटों के अलावा मालवा की दर्जन भर से अधिक सीटों पर उनका असर देखने को मिलता है. इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सिंधिया को अपना चेहरा तो नहीं बनाया है इसके बाद भी बीजेपी में उनके चेहरों को लेकर चिंता जरूर दिखाई देती है.

सिंधिया को घेरने की बीजेपी की तमाम कोशिशें कामयाब नहीं हुईं हैं. मजबूरन पार्टी को विजयाराजे सिंधिया के नाम का उपयोग इस चुनाव में करना पड़ रहा है. आज ग्वालियर में जिस वक्त मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जन्मशती के कार्यक्रम का शुभारंभ कर रहे थे, उस वक्त ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर में ही कार्यकर्ताओं की बैठक कर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के कार्यक्रम को अंतिम रूप दे रहे थे. दादी विजयाराजे सिंधिया को श्रद्धांजलि देने का कोई ट्वीट भी नहीं आया. जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई नेताओं ने विजयाराजे सिंधिया को ट्वीट कर श्रद्धांजलि दी.

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