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MP विधानसभा चुनाव: पुत्र मोह ऐसा कि महाभारत के धृतराष्ट्र याद आ जाएं

मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव के लिए कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी को कई विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार चयन करने में पसीना आ गया.

Updated On: Nov 09, 2018 08:03 PM IST

Dinesh Gupta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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MP विधानसभा चुनाव: पुत्र मोह ऐसा कि महाभारत के धृतराष्ट्र याद आ जाएं
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मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव के लिए कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी को कई विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार चयन करने में पसीना आ गया. कारण पार्टी के वजनदार नेताओं का पुत्र मोह रहा है. पुत्र मोह भी ऐसा कि महाभारत के धृतराष्ट्र याद आ जाएं. पुत्र मोह के कारण ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं राज्यसभा सदस्य सत्यव्रत चतुर्वेदी बागी हो गए. भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अपने पुत्र आकाश के लिए चुनाव लड़ने से ही इंकार कर दिया. उनके इंकार के बाद ही पार्टी ने इंदौर की तीन नंबर विधानसभा सीट से आकाश विजयवर्गीय की उम्मीदवारी घोषित की है. प्रदेश में नामांकन पत्र दाखिल करने का शुक्रवार को अंतिम दिन था.

दिग्विजय सिंह के कारण नहीं मिला सत्यव्रत के पुत्र को टिकट

मध्यप्रदेश कांग्रेस की राजनीति में सत्यव्रत चतुर्वेदी बड़ा नाम हैं. चतुर्वेदी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता रह चुके हैं. अच्छे वक्ता हैं. राज्य की गुटिय राजनीति में उनका नाम ज्योतिरादित्य सिंधिया के करीबियों में लिया जाता है. पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से उनके रिश्ते कभी बेहतर नहीं रहे. चतुर्वेदी की मां विद्यावती चतुर्वेदी भी खजुराहो से सांसद रही हैं. विद्यावती चतुर्वेदी की राजनीतिक विरासत को सत्यव्रत चतुर्वेदी ने ही आगे संभाला. सत्यव्रत चतुर्वेदी के भाई आलोक चतुर्वेदी मूलत: खनिज कारोबारी हैं.

कांग्रेस के नेता भी हैं. पार्टी ने उन्हें इस बार भी छतरपुर विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया है. सत्यव्रत चतुर्वेदी और आलोक चतुर्वेदी के बीच लंबे समय से तनाव चल रहा है. तनाव की वजह कारोबार और राजनीतिक विरासत का झगड़ा है. सत्यव्रत चतुर्वेदी अपनी राजनीतिक विरासत पुत्र नितिन चतुर्वेदी को सौंपना चाहते हैं. बाधा आलोक चतुर्वेदी के कारण आ रही है.

पिछले चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने आलोक चतुर्वेदी को टिकट दिया था. लेकिन, वे हार गए. नितिन चतुर्वेदी को वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में चंदला विधानसभा सीट से टिकट दिया गया था, लेकिन वे चौथे नंबर पर रहे. इसके बाद से ही पार्टी ने नितिन को टिकट देने पर विचार करना ही बंद कर दिया.

आलोक चतुर्वेदी, राज्य की राजनीति में दिग्विजय सिंह के साथ हैं. सत्यव्रत चतुर्वेदी लगातार कांग्रेस पार्टी में ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने की मांग कर रहे हैं. नितिन चतुर्वेदी के टिकट को लेकर ही दिग्विजय सिंह और सिंधिया के बीच टकराव की खबरें आईं थीं. कांग्रेस पार्टी से टिकट न मिलने पर नितिन चतुर्वेदी ने समाजवादी पार्टी ज्वाइन कर ली.

समाजवादी पार्टी ने राजनगर से उम्मीदवार बनाया है. चतुर्वेदी ने कहा कि नितिन का समाजवादी पार्टी ज्वाइन करने का निर्णय मेरा है. मैं उसका प्रचार भी करूंगा. सत्यव्रत चतुर्वेदी के पुत्र प्रेम ने बुंदेलखंड में कांगे्रस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. इस पूरे मामले में राज्य के बड़े नेताओं की गुटबाजी भी सामने आई है.

कैलाश विजयवर्गीय ने पुत्र के लिए किया अपने टिकट का त्याग

भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में कैलाश विजयवर्गीय कद्दावर नेता माने जाते हैं. वे पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं. इंदौर जिले की महू विधानसभा की सीट से लगातार दो बार चुनाव जीते हैं. कैलाश विजयवर्गीय चाहते थे कि इस बार उनके पुत्र आकाश विजयवर्गीय को भी पार्टी से टिकट दी जाए. लेकिन, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पिता-पुत्र दोनों को ही टिकट देने के पक्ष में नहीं थे. एक परिवार में एक ही टिकट दिए जाने की वकालत मुख्यमंत्री कर रहे थे.

बताया जाता है कि कैलाश विजयवर्गीय ने पार्टी फोरम पर कहा था कि पार्टी में नए नेतृत्व के लिए रास्ता खोला जाना चाहिए. मुख्यमंत्री चाहते थे कि जो भी नेता अपने पुत्र के लिए टिकट चाहता है, वह खुद आगे आकर अपनी सीट छोड़ दे. वन मंत्री डॉ. गौरीशंकर शेजवार के पुत्र मुदित शेजवार को सांची से टिकट इसी फार्मूले के तहत टिकट दिया गया. शेजवार ने खुद चुनाव न लड़ने की घोषणा की. इसी तरह राज्य मंत्री हर्ष सिंह ने भी अपने पुत्र विक्रम सिंह के लिए रामपुर बघेलान की सीट खाली की. कैलाश विजयवर्गीय को लेकर पार्टी में लगातार असमंजस की स्थिति बनी रही. कैलाश विजयवर्गीय ने साफ तौर पर कह दिया था कि मैं भी आकाश के लिए चुनाव न लड़ने को तैयार हूं.

इंदौर की दो नंबर की सीट से आकाश विजयवर्गीय के लिए टिकट की मांग उन्होंने रखी. इस सीट से रमेश मेंदोला विधायक हैं. वे भी आकाश के लिए सीट खाली करने को तैयार थे. कैलाश विजयवर्गीय का प्रस्ताव था कि रमेश मेंदोला को महू से टिकट दे दिया जाए. पार्टी ने बात नहीं मानी. आकाश विजयवर्गीय को इंदौर की तीन नंबर सीट से टिकट दिया गया है. कैलाश विजयवर्गीय की इस राजनीति के कारण पार्टी के कई धुरंधर नेता चक्कर में पड़ गए. लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को भी अपने पुत्र को टिकट देने की जिद छोड़ना पड़ी.

शिवराज सिंह चौहान ने क्या कार्तिकेय की राह मुश्किल कर दी है

shivraj singh chauhan

एक परिवार के एक ही व्यक्ति को टिकट दिए जाने के भाजपा के नए फार्मूले में भी पक्षपात दिखाई देता है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान नहीं चाहते थे कि कैलाश विजयवर्गीय के पुत्र आकाश विजयवर्गीय को कार्तिकेय से पहले विधानसभा में पहुंचने का मौका मिला. यही वजह है कि उन्होंने आकाश के नाम का विरोध किया. कैलाश विजयवर्गीय ने खुद चुनाव न लड़ने की घोषणा कर बाजी पलट दी.

आने वाले दिनों में इसी फॉर्मूले के तहत कार्तिकेय चौहान के लिए भी मुख्यमंत्री चौहान को कुछ त्याग करना पड़ेगा. पार्टी प्रवक्ता लगातार यह दावा करते रहे कि पार्टी ने एक परिवार से एक ही टिकट दिए जाने के नीतिगत निर्णय के तहत कैलाश विजयवर्गीय को उम्मीदवार नहीं बनाया है. पार्टी प्रवक्ताओं के यह दावे वास्तविकता से काफी दूर हैं. शहडोल के सांसद ज्ञान सिंह के पुत्र का उदाहरण सामने हैं. ज्ञान सिंह के पुत्र शिवनारायण सिंह को बांधवगढ़ से टिकट दिया गया है. स्कूल शिक्षा मंत्री विजय शाह के भाई संजय शाह को टिमरनी से टिकट दिया गया है. विजय शाह खुद हरसूद से चुनाव लड़ रहे हैं.

बीजेपी 43 चेहरे ऐसे हैं, जिन्हें विरासत के आधार पर टिकट दिया गया है. इनमें तीस बेटा-बेटी हैं. सागर के सांसद लक्ष्मीनाराण यादव के बेटे सुधीर यादव को सुरखी सीट से उम्मीदवार बनाया गया है. हाल ही में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए पूर्व सांसद प्रेमचंद्र गुड्डू अपने पुत्र अजीत बोरासी के टिकट के लिए ही बागी हुए हैं. पिछले चुनाव में गुड्डू ने कांग्रेस पार्टी द्वारा घोषित अधिकृत उम्मीदवार के स्थान अपने पुत्र का नाम बी फॉर्म में भरकर जमा कर दिया था. इसके बाद से ही गुड्डू कांग्रेस की राजनीति में हासिए पर चल रहे थे.

राज्य में भारतीय जनता पार्टी के अब तक छह मुख्यमंत्री हुए हैं. सभी के नाते-रिश्तेदार, बेटा-बेटी चुनाव लड़ रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के पुत्र दीपक जोशी हाटपिपल्या से चुनाव लड़ रहे हैं. बाबूलाल गौर की बहू कृष्णा गौर को पार्टी ने पारिवारिक विरासत के कारण ही टिकट दिया. वीरेन्द्र कुमार सकलेचा के पुत्र ओमप्रकाश सकलेचा जावद सीट पर लगातार चुनाव लड़ रहे हैं. सुंदरलाल पटवा के मानस पुत्र सुरेन्द्र पटवा भोजपुर से चुनाव लड़ते हैं.

कांग्रेस ने परिवारवाद से कभी परहेज नहीं किया है. दिग्विजय सिंह सहित कई बड़े नेताओं के पुत्र चुनाव मैदान में हैं. भाई लक्ष्मण सिंह को भी टिकट मिला है. कांतिलाल भूरिया के पुत्र मोह के कारण झाबुआ में कांगे्रसी कार्यकर्त्ता पहली बार भूरिया के खिलाफ सड़कों पर नारेबाजी करते नजर आए. भूरिया के पुत्र डॉ. विक्रांत भूरिया को पार्टी ने झाबुआ से टिकट दी है. कांग्रेस में कुल 21 टिकट परिवारवाद के आधार पर दिए गए हैं. इनमें 12 पुत्र-पुत्री हैं.

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