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मध्य प्रदेश: अमित शाह कह रहे हैं परिवारवाद नहीं चलेगा लेकिन दिग्गज नेता बेटे-बेटियों के लिए मांग रहे टिकट

अमित शाह के परिवारवाद के आधार पर टिकट देने की परंपरा को सार्वजनिक रूप से खारिज किए जाने के बाद बेटे-बेटियों की वकालत कर रहे नेताओं को जबरदस्त झटका लगा है

Updated On: Oct 15, 2018 09:28 PM IST

Dinesh Gupta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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मध्य प्रदेश: अमित शाह कह रहे हैं परिवारवाद नहीं चलेगा लेकिन दिग्गज नेता बेटे-बेटियों के लिए मांग रहे टिकट
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भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के इस बयान से मध्य प्रदेश के उन नेताओं की नींद उड़ गई है, जो अपने बेटे-बेटी अथवा बहू-दामाद के लिए टिकट मांग रहे थे. राज्य में ऐसे दर्जन भर से अधिक नेता हैं जो अपने निर्वाचन क्षेत्र को परिवार की पहचान देने के लिए उतावले हैं. होशंगाबाद में बूथ लेवल कार्यकर्ताओं की बैठक में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि टिकट परिवारवाद के आधार पर नहीं बांटी जाएगी. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह पार्टी ने नरेंद्र मोदी जैसे सामान्य और समर्पित कार्यकर्ता को महत्व दिया है, उसी तरह दरी बिछाने वाले कार्यकर्ता को इस चुनाव के टिकट वितरण में महत्व दिया जाएगा.

सुमित्रा महाजन चाहती हैं अपने बेटे मंदार के लिए टिकट

इंदौर संसदीय क्षेत्र से 8 बार चुनाव जीतने वाली लोकसभा की अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की इच्छा है कि पार्टी उनके रिटायरमेंट से पहले बेटे मंदार महाजन को विधानसभा का टिकट दे. सुमित्रा महाजन, मंदार के लिए इंदौर के विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 3 से टिकट मांग रहीं हैं. इंदौर की विधानसभा सीट क्रमांक 3 से ऊषा ठाकुर पार्टी की विधायक हैं. पार्टी ऊषा ठाकुर का टिकट नहीं काटना चाहती है. यही स्थिति इंदौर विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 2 की है. इस सीट से पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय अपने बेटे आकाश विजयवर्गीय को टिकट दिलाना चाहते हैं. विजयवर्गीय खुद जिले की महू विधानसभा सीट से विधायक हैं. पुत्र को टिकट मिलने की स्थिति में क्या कैलाश विजयवर्गीय महू से अपनी दावेदारी छोड़ देंगे, यह स्पष्ट नहीं है.

अमित शाह

अमित शाह

कहा यह जा रहा है कि सुमित्रा महाजन की उम्र को देखते हुए पार्टी उन्हें इस बार लोकसभा का टिकट नहीं देगी. कैलाश विजयवर्गीय की नजर सुमित्रा महाजन से खाली होने वाली लोकसभा सीट पर है. इंदैार की जिस 2 नबंर की सीट से वो अपने बेटे को टिकट दिलाना चाहते हैं उस पर अभी रमेश मेंदोला विधायक हैं. मेंदोला, विजयवर्गीय की करीबी मित्र हैं. मेंदोला को टिकट दिलाने के लिए ही विजयवर्गीय वर्ष 2008 में यह सीट खाली कर महू चले गए थे. बेटे के चुनाव लड़ने की इच्छा ने कैलाश विजयवर्गीय के सामने नई समस्या खड़ी कर दी है. कैलाश विजयवर्गीय के नए और पुराने दोनों ही निर्वाचन क्षेत्रों का प्रबंधन आकाश विजयवर्गीय ही करते हैं. इसी तरह राज्य के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव के निर्वाचन क्षेत्र रहली का प्रबंधन उनके पुत्र अभिषेक भार्गव देखते हैं. गोपाल भार्गव अपने बेटे के लिए देवरी विधानसभा सीट से टिकट मांग रहे हैं. देवरी सीट पर अभी कांग्रेस का कब्जा है. गोपाल भार्गव खुद रहली सीट पर टिकट के दावेदार हैं.

जिन मंत्रियों की कट रही है टिकट उनके बेटे भी हैं दावेदारों की लाइन में 

बीजेपी के उम्मीदवारों को लेकर कराए गए सर्वे में शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल के 8 सदस्यों की स्थिति को काफी कमजोर बताया गया है. यह मंत्री कुसुम सिंह मेहदेले, माया सिंह, हर्ष सिंह, डॉ. गौरीशंकर शेजेवार, अंतर सिंह आर्य, बालकृष्ण पाटीदार, सुरेंद्र पटवा और सूर्यप्रकाश मीणा हैं. डॉ. शेजवार की उम्र 68 साल हो गई है. वो अपनी उम्र के कारण भी चुनाव नहीं लड़ने के इच्छुक बताए जाते हैं. उनकी इच्छा है कि अनुसूचित जाति वर्ग के लिए सुरक्षित इस सांची सीट को उनके बेटे मुदित या पत्नी किरन शेजेवार के लिए सुरक्षित कर दिया जाए. राज्य के वन मंत्री डॉ. शेजवार पिछले 4 दशक से भी अधिक समय से इस क्षेत्र से चुनाव लड़ते आ रहे हैं. वो विरासत के तौर अपनी इस सीट को संभाल कर रखना चाहते हैं.

वित्त मंत्री जयंत मलैया की भी उम्र ज्यादा है. वो भी चाहते हैं कि पार्टी उन्हें घर बिठाए मगर उससे पहले पुत्र सिद्धार्थ या पत्नी सुधा मलैया को विधानसभा का टिकट दिलवाने की इच्छा रखते हैं. केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर अपने बेटे देवेंद्र सिंह तोमर को ग्वलियर से टिकट दिलाना चाहते हैं. बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा अपने बेटे तृष्मूल झा को सिंगरोली विधानसभा सीट से पार्टी का टिकट दिलाना चाहते हैं. प्रभात झा मूलत: बिहारी हैं. सिंगरोली औद्योगिक क्षेत्र है. यहां बिहारी जनता बड़ी संख्या में है. तृष्मूल सिंगरोली में पेट्रोल पंप भी संचालित करते हैं. राज्य की राजनीति में बीजेपी के ऐसे कई चेहरे हैं जो परिवार की राजनीतिक विरासत के आधार पर पहले भी लोकसभा और विधानसभा में चुनकर पहुंचे हैं.

KAILASH

कैलाश विजयवर्गीय

बीजेपी सरकार के 3 मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सकलेचा, सुंदरलाल पटवा और कैलाश जोशी के बेटे वर्तमान में विधायक हैं. एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर की बहू कृष्णा गौर भोपाल की महापौर रह चुकी हैं अब अपने ससुर की सीट गोविंदपुरा से टिकट की दावेदार हैं. बाबूलाल गौर अपनी बढ़ती उम्र के बाद भी चुनाव लड़ने का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं. किसी दौर में बीजेपी के ताकतवर नेता रहे लक्ष्मीनारायण पांडे, कैलाश सारंग और फूलचंद्र वर्मा के बेटे भी विधायक हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री विक्रम वर्मा की पत्नी भी विधायक हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की देखादेखी उनकी अगली पीढ़ी भी इसी राह पर चलना चाहती है.

राज्य बीजेपी में परिवारवाद के सवाल पर राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कई बार यह सफाई दे चुके हैं कि पार्टी परिवार की विरासत के आधार पर नहीं कार्यकर्ता के तौर पर किए गए कार्यों को देखकर टिकट देती है. मुख्यमंत्री के बेटे कार्तिकेय चौहान भी राजनीति में सक्रिय हो गए हैं. कार्तिकेय अपने पिता के निर्वाचन क्षेत्र बुधनी का प्रबंधन देख रहे हैं. हालांकि कार्तिकेय की उम्र अभी विधानसभा का चुनाव लड़ने लायक नहीं हुई है.

सांसद भी कर रहे हैं परिजनों को टिकट देने की वकालत

चर्चा यह है कि मध्य प्रदेश में लगातार चौथी बार सरकार बनाने के लिए बीजेपी अपने कुछ सांसदों को विधानसभा के चुनाव मैदान में उतार सकती है. इनमें अनूप मिश्रा, चिंतामणि मालवीय, मनोहर ऊंटवाल, नागेंद्र सिंह, रीति पाठक, आलोक संजर, रोडमल नागर, सुधीर गुप्ता, ज्योति धुर्वे का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है. कुछ सांसद अपने नाते-रिश्तेदारों के लिए टिकट मांग रहे हैं. प्रह्लाद पटेल अपने भाई की पत्नी के लिए जबेरा से टिकट मांग रहे हैं. उनके भाई जालम सिंह पटेल नरसिंहपुर जिले से विधायक हैं और शिवराज सिंह मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री हैं.

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शिवराज सिंह चौहान

इसी तरह सागर के सांसद लक्ष्मीनारायण यादव अपने बेटे सुधीर यादव के लिए सुरखी से टिकट चाहते हैं. राज्य के कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन अपनी बेटी मौसमी और पत्नी रेखा बिसेन को टिकट देने की वकालत कर रहे हैं. बिसेन का नाम उसी सूची में शामिल बताया जाता है, जिनका टिकट पार्टी इस बार काट रही है.

अमित शाह के परिवारवाद के आधार पर टिकट देने की परंपरा को सार्वजनिक रूप से खारिज किए जाने के बाद बेटे-बेटियों की वकालत कर रहे नेताओं को जबरदस्त झटका लगा है. शाह के मंत्र के बाद ऐसे दावेदारों के बारे में बीजेपी की प्रदेश इकाई नए सिरे से कवायद करने में जुट गई है.

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