S M L

राजस्थान में बीजेपी के सेनापति बने मदन लाल सैनी पर हारा कौन?

बहुत से लोगों के लिए यही दुविधा बनी हुई है कि क्यों मदन लाल सैनी को पार्टी अध्यक्ष नियुक्त किया गया और क्यों दोनों गुट इसके लिए तैयार भी गए

Updated On: Jun 30, 2018 05:36 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

0
राजस्थान में बीजेपी के सेनापति बने मदन लाल सैनी पर हारा कौन?
Loading...

करीब 75 दिन से नेतृत्वविहीन चल रही राजस्थान बीजेपी को आखिरकार अध्यक्ष मिल ही गया. बीजेपी ने हाल ही में निर्विरोध राज्यसभा सांसद बनाए गए मदन लाल सैनी को नया अध्यक्ष बनाया है. अगले हफ्ते के आखिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जयपुर आ रहे हैं. ऐसे में पीएम के दौरे के महज 7 दिन पहले 75 साल के मदन लाल सैनी की नियुक्ति ने बीजेपी से बाहर ही नहीं बल्कि पार्टी के अंदर भी बहुत लोगों को चौंका दिया है.

16 अप्रैल को वसुंधरा राजे के ‘यसमैन’ कहे जाने वाले अशोक परनामी ने पद छोड़ दिया था. लेकिन नए अध्यक्ष के नाम पर ऐसी खींचतान मची कि मामला उलझता ही चला गया. इस महीने एकबार फिर सरगर्मियां तेज हुई. जयपुर से लेकर दिल्ली तक और संगठन से लेकर सरकार तक, हर कहीं अध्यक्ष को लेकर अपने-अपने गुणा-भाग, जोड़-घटाव लगाए जा रहे थे. अब जानकार लोग इस थ्योरी को सुलझाने में लगे हैं कि अचानक मदन लाल सैनी का नाम कैसे लाइमलाइट में आ गया. सैनी को सेनापति बनाने से आखिर जीत किसकी हुई- वसुंधरा राजे की या फिर केंद्रीय नेतृत्व की?

परनामी के बाद और सैनी से पहले क्या-क्या हुआ?

अप्रैल में परनामी को हटाकर अमित शाह ने केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को कमान सौंपने का फरमान लगभग जारी कर दिया था. फ़र्स्टपोस्ट मे हमने आपको बताया था कि ‘युवा’ अध्यक्ष के पीछे केंद्रीय नेतृत्व 15-20 साल आगे तक की योजना पर काम कर रहा था. इसके अलावा, असली कोशिश विधानसभा चुनाव के टिकट बंटवारे में वसुंधरा राजे को ‘कंट्रोल’ करना भी था. शाह के लिए महारानी पर लगाम कसना क्यों जरूरी हो गया होगा ये कुछ मंत्रियों के उन बयानों से समझा जा सकता है जिनमें बार-बार कहा जाता है कि राजस्थान में बीजेपी का मतलब वसुंधरा राजे के अलावा कुछ नहीं है.

लेकिन वसुंधरा राजे सिंधिया ने अमित शाह को ‘चेक एंड मेट’ कर दिखा दिया कि राजनीति की शतरंज में वे शाह से कम शातिर नहीं हैं. वे शाह की चाल को फौरन भांप गई और उन्होंने गजेंद्र सिंह शेखावत का पुरजोर विरोध किया. तमाम दांव-पेंच चलकर ये सुनिश्चित कर दिया कि कम से कम शेखावत तो प्रदेशाध्यक्ष न ही बनें. शेखावत का विरोध करने के लिए उन्होने पहले जाति का मुद्दा उठाया. कहा गया कि राजपूत की नियुक्ति होने से जाट नाराज हो जाएंगे. जब शाह की तरफ से ये कहा गया कि जाट भैरों सिंह शेखावत से नाराज नहीं हुए तो पहली बार सांसद और मंत्री बने गजेंद्र सिंह शेखावत से क्यों नाराज होंगे.

यह भी पढ़ें: क्या नरेंद्र मोदी का विकल्प बन गए हैं राहुल गांधी?

जब इससे बात नहीं बनती नजर आई और केंद्रीय नेतृत्व शेखावत के नाम पर अड़ा रहा तो वसुंधरा खेमे के कई मंत्रियों-विधायकों-नेताओं जिनमें जाट, सैनी और राजपूत भी शामिल थे, ने दिल्ली में डेरा डाल दिया. राष्ट्रीय महासचिव राम लाल से लेकर राजस्थान प्रभारी अविनाश राय खन्ना और सह प्रभारी वी सतीश के साथ बैठकों का दौर चलता रहा. गतिरोध इससे भी टूटता नजर नहीं आया.

Vasundhara Raje

वसुंधरा राजे और अमित शाह के बीच भी बैठक हुई. बताया जा रहा है कि वसुंधरा राजे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मिलने का वक्त मांगा. लेकिन मोदी ने खुद मिलने के बजाय उत्तर प्रदेश प्रभारी और राजस्थान बीजेपी के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष रहे ओम प्रकाश माथुर से मिलने को कह दिया. आखिर में ओम माथुर ने ही रास्ता निकाला और मदनलाल सैनी का नाम निकल कर सामने आया.

2008 जैसे हालात टालना थी चुनौती

पार्टी सूत्रों के मुताबिक गजेंद्र सिंह शेखावत के नाम पर वसुंधरा राजे के वीटो से मोदी-शाह खासे नाराज तो थे. पर चुनावी साल में उन्होंने पार्टी को भीतरघात से बचाने के लिए बीच का रास्ता निकालना ही ठीक समझा. 2008 के विधानसभा चुनाव में ऐसे ही हालात में बीजेपी को लगभग जीती हुई बाज़ी हारनी पड़ी थी. तब प्रदेशाध्यक्ष ओम माथुर ने टिकट बंटवारे में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को फ्री हैंड नहीं दिया.

नतीजा ये रहा है कि सत्ता के लिए जरूरी 101 विधायकों की बजाय बीजेपी का सफर 78 विधायकों पर ही अटक गया. बाद में जब तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने वसुंधरा राजे को साइडलाइन करने की कोशिश की तो राजे ने 78 में से 60 विधायकों की दिल्ली में परेड कराई. हालात इस कदर बिगड़े कि आखिर में ओम माथुर को न सिर्फ प्रदेशाध्यक्ष का पद छोड़ना पड़ा बल्कि राजस्थान से भी बाहर जाना पड़ा.

अब एक बार फिर वसुंधरा राजे चुनावी साल में नेतृत्व के सामने ताल ठोंक कर खड़ी हो गई. लेकिन इस बार हालात बीजेपी के लिए पहले ही खराब से हैं. मध्यप्रदेश और राजस्थान में तमाम सर्वे बीजेपी के लिए सत्ता में लौटना चुनौतीपूर्ण बता रहे हैं. ऐसे में हल्की सी खामी बड़ी नाकामी बन सकती है. शायद इसी के चलते ढाई महीने से अधरझूल में चल रही प्रदेशाध्यक्ष की नियुक्ति के लिए संकटमोचक के तौर पर ओम माथुर को ही बीच में लाया गया. लेकिन ये सवाल अब भी पूरी तरह सुलझने से दूर है कि मदन लाल सैनी की नियुक्ति में जीता कौन और हारा कौन?

क्या कहती है मदन सैनी की नियुक्ति

चुनावी साल में जब पार्टी के लिए हालात विकट हों, तब किसी तेजतर्रार नेता को सेनापतित्व ज्यादा ठीक रहता, न कि ऐसे नेता को जो अरसे से चुनावी राजनीति से ही दूर है. बहुत से लोगों के लिए यही दुविधा बनी हुई है कि क्यों मदन लाल सैनी को पार्टी अध्यक्ष नियुक्त किया गया और क्यों दोनों गुट इसके लिए तैयार भी गए.

मदन लाल सैनी 1990 में विधायक निर्वाचित हुए थे. इसके बाद वे लोकसभा और विधानसभा का चुनाव हार चुके हैं. अरसे से वे ‘मुख्यधारा’ से दूर ही थे. बहुत से नए नेता तो उनसे हाल में राज्यसभा सांसद बनने से पहले तक परिचित भी नहीं थे. वे रहते भी बिल्कुल साधारण तरीके से हैं. आज के दौर में जब सरपंच भी फॉर्च्यूनर से छोटी गाड़ी को शान के खिलाफ समझते हैं, तब मदन लाल सैनी रोड़वेज की बस से दफ्तर आते-जाते थे. जब राज्यसभा के लिए उनके नाम की घोषणा हुई तो खुद उनके घरवालों तक को यकीन नहीं हुआ था.

हालांकि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से काफी कम उम्र मे ही जुड़ गए थे. संगठन में उनको लंबा अनुभव है और अनुशासन समिति के प्रमुख के तौर पर काफी काम किया है. लेकिन सिर्फ संगठनकर्ता की योग्यता ही उनके अध्यक्ष बनने का पैमाना नहीं बनी बल्कि सच्चाई से कहें तो मदन सैनी मजबूरी में सेनापति बनाए गए हैं. ये मजबूरियां कई तरह की हैं.

पार्टी नेतृत्व के सामने ये मजबूरी थी कि कोई ऐसा नाम सामने लाया जाए जो कि वसुंधरा राजे को भी मंजूर हो. वसुंधरा किसी मजबूत नाम को अपनी शक्तियों में बंटवारे के तौर पर देख रही थी. इसलिए मदन सैनी के नाम पर सहमति बन पाई. वसुंधरा राजे के लिए वे उसी तरह कोई खतरा नहीं बन सकते जैसे सोनिया गांधी के लिए मनमोहन सिंह. ये भी नहीं लगता कि टिकट बंटवारे में वे वसुंधरा के सामने कोई लकीर खींच पाएंगे.

ये भी पढ़ें: महागठबंधन से पहले ‘महाभारत’ के लिए कांग्रेस रहे तैयार, PM पद की ‘बाधा-रेस’ कैसे होगी पार

बीजेपी के सामने इस वक्त सबसे बड़ी मुश्किल सोशल इंजीनियरिंग का ताना-बाना बिखर जाना भी है. दलित और पिछड़े वर्गों ने पिछले चुनाव में उसे बंपर समर्थन दिया था लेकिन इसबार हालात अलग हैं. अनुसूचित जनजातियों का साथ मजबूत करने के लिए डॉ किरोड़ी लाल मीणा की घरवापसी कराई गई है. अब ओबीसी वर्ग को जोड़े रखने के लिए सैनी जाति के मदन लाल को पहले राज्यसभा पहुंचाया गया और अब प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया.

राजस्थान में सैनी समाज का जनसंख्या में करीब 6-7% हिस्सा माना जाता है. आमतौर पर ये कांग्रेस का वोटबैंक रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह अशोक गहलोत हैं, जो इसी जाति से आते हैं. अब इतने बड़े वोटबैंक को कांग्रेस से दूर करने के लिए ही ये दांव चला गया है. खुद अशोक गहलोत ने पिछले दिनों कहा कि अगर चुनावी मजबूरी नहीं होती तो बीजेपी कभी मदन लाल सैनी को राज्यसभा नहीं भेजती.

मदन लाल सैनी

क्या इससे जाट-राजपूत चुप रहेंगे

गजेंद्र शेखावत के लिए ये कहा गया कि राजपूत की नियुक्ति होने से जाट वोट बैंक बीजेपी से नाराज हो जाएगा. ऐसे में सवाल ये है कि मदन सैनी की नियुक्ति से क्या राजपूत नाराज नहीं होंगे और क्या जाट अब खुश हो जाएंगे ?

वसुंधरा गुट की तरफ से ये तर्क शुरू से ही समझ के परे था. जाट आमतौर पर कांग्रेस का वोटबैंक रहे हैं और राजपूत बीजेपी का. जाटों की जनसंख्या राज्य में करीब 10 फीसदी है जबकि राजपूतों की करीब 6-7 फीसदी. 1999 में जाटों को बीजेपी ने ही ओबीसी में शामिल किया जिसके बाद जाटों के वोट बीजेपी में शिफ्ट हुए लेकिन पूरे तौर पर नहीं. पिछले कुछ समय से राजपूतों के कई संगठनों ने बीजेपी का विरोध शुरू कर दिया है. ऐसे में अपने कोर वोटर को उन जाटों की कीमत पर नाराज करना, जो पूरी तरह पार्टी के नहीं कहे जा सकते, समझ से परे है.

2014 में राजस्थान में बीजेपी से 6 से ज्यादा जाट सांसद चुने गए थे. लेकिन ये इस बात का प्रमाण नहीं है कि जाट बीजेपी के साथ हैं. मोदी लहर में राजस्थान में हालात ये थे कि अगर बीजेपी किसी को भी टिकट दे देती तो वो जीत जाता. तब बीजेपी को सभी जातियों ने समर्थन दिया था. अपने आसपास मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जिन्होंने कट्टर कांग्रेसी होते हुए भी 2014 में पहली बार बीजेपी के लिए वोट किया था.

बहरहाल, मदन लाल सैनी ने काफी समय तक संगठन में ओम माथुर के साथ काम किया है. सैनी माथुर के नजदीक हैं और माथुर प्रचारक रहने के वक्त से ही नरेंद्र मोदी के करीबी रहे हैं. ऐसे में ये तो तय है कि सैनी को केंद्रीय नेतृत्व का समर्थन रहेगा. अब ये देखने वाली बात होगी कि वसुंधरा राजे उनसे कितना सहयोग कर पाती हैं. सवाल ये भी रहेगा कि क्या मदन लाल सैनी प्रदेशाध्यक्ष के तौर पर अपनी शक्तियों का बखूबी इस्तेमाल कर पाएंगे या हार की सूरत में ठीकरा फोड़ने के लिए उन्हे बलि के बकरे के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

0
Loading...

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
फिल्म Bazaar और Kaashi का Filmy Postmortem

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi