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फूलपुर में किसका खिलेगा फूल, जानिए क्यों है यह सीट खास!

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बीजेपी फूलपुर में फिर से कमल खिला पाएगी? बीजेपी के साथ-साथ यहां केशव प्रसाद मौर्य के कामकाज की भी परीक्षा होगी

Updated On: Feb 19, 2018 08:33 PM IST

FP Staff

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फूलपुर में किसका खिलेगा फूल, जानिए क्यों है यह सीट खास!
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भारतीय जनता पार्टी के लिए फूलपुर लोकसभा सीट नाक का सवाल बनी हुई है क्योंकि यह सीट 62 साल तक कांग्रेसियों और समाजवादियों की गढ़ रही है. यह वह सीट है जहां प्रख्यात समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया और बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम जैसे दिग्गज भी चुनाव हार चुके हैं.

बीजेपी के केशव प्रसाद मौर्य ने 2014 में इस सीट पर भगवा लहराने में कामयाबी हासिल की थी. पार्टी गोरखपुर सीट को काफी सेफ मानकर चल रही है लेकिन फूलपुर के इतिहास को लेकर वह डरी हुई है. फूलपुर में दोबारा फूल खिलाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य पर ही है.

पहले चुनाव से लेकर वर्ष 1971 तक फूलपुर में कांग्रेस का कब्जा रहा. पंडित जवाहर लाल नेहरू ने फूलपुर से हैट्रिक लगाई थी. धीरे-धीरे यह सीट समाजवादियों के गढ़ के रूप में बदल गई. पहले जनता पार्टी तो बाद में समाजवादी पार्टी ने इस सीट से राजनीतिक फसलें काटीं. इस सीट पर दोबारा कब्जा जमाने के लिए कांग्रेस ने 2014 में क्रिकेटर मोहम्मद कैफ को मैदान में उतारा. गणित मुस्लिम वोटरों की अच्छी-खासी संख्या और क्रिकेटर के रूप में लोकप्रियता थी. इसके बावजूद जीत तो दूर कैफ जमानत तक नहीं बचा सके थे.

क्या है राजनीतिक इतिहास

इस सीट का इतिहास देखें तो 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में पंडित नेहरू ने इस पर विजय हासिल की. फिर 1957 और 1962 के लोकसभा चुनाव में भी वह जीते. साल 1962 में डॉ. राम मनोहर लोहिया खुद जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़े, लेकिन वे हार गए.

1964 में नेहरू के निधन के बाद यहां उप चुनाव हुआ. जिसमें उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित को भी जनता ने संसद भेज दिया. विजय लक्ष्मी पंडित के खिलाफ 1967 के चुनाव में समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र खड़े थे. जनता ने उन्हें हराकर विजय लक्ष्मी पंडित पर ही भरोसा जताया. वर्ष 1969 में विजय लक्ष्मी ने संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधि बनने के बाद सांसद पद से इस्तीफा दे दिया.

इस्तीफे के बाद हुए उप चुनाव में कांग्रेस ने नेहरू के सहयोगी रहे केशवदेव मालवीय को उतारा लेकिन संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के बैनर तले लड़े समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र ने उन्हें हरा दिया. 1971 में फूलपुर वालों ने विश्वनाथ प्रताप सिंह को संसद भेजा, जो आगे चलकर प्रधानमंत्री बने.

आपातकाल के दौर 1977 में हुए आम चुनाव में जनता पार्टी की कमला बहुगुणा ने यह सीट कांग्रेस से छीन ली. कांग्रेस ने यहां से रामपूजन पटेल को उतारा था. दिलचस्प बात यह है कि 1980 में इसी कमला बहुगुणा ने खुद कांग्रेस से चुनाव लड़ा. नेहरू के बाद इस सीट पर सिर्फ रामपूजन पटेल ही हैट्रिक लगाई. उन्होंने 1984 (कांग्रेस), 1989 और 1991 (जनता दल) में जीत हासिल की.

1996 से 2004 तक हुए चार लोकसभा चुनावों में यहां से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों का कब्जा रहा. 1996 में यहां बीएसपी के संस्थापक कांशीराम चुनाव में खड़े हुए, लेकिन वह एसपी के जंग बहादुर सिंह पटेल से 16021 वोट से हार गए. एसपी ने 2004 में यहां से बाहुबली अतीक अहमद को मैदान में उतारा और वह चुनाव जीत गए.

बहुजन समाज पार्टी के कपिल मुनि करवरिया ने इस सीट पर कांशीराम की हार का बदला 2009 के चुनाव में ले लिया. जवाहरलाल नेहरू, पंडित विजय लक्ष्मी पंडित, विश्वनाथ प्रताप सिंह, कमला बहुगुणा की राजनैतिक जमीन पर 2014 में केशव प्रसाद मौर्य ने पहली बार भगवा लहराया. जबकि राम मंदिर लहर में भी उसे इस सीट पर कामयाबी नहीं मिली थी.

मौर्य ने रिकॉर्ड 5,03,564 वोट हासिल किए. जबकि उनके निकट प्रतिद्वंदी एसपी के धर्मराज सिंह पटेल को सिर्फ 1,95,256 वोट से संतोष करना पड़ा था. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बीजेपी फूलपुर में फिर से कमल खिला पाएगी? बीजेपी के साथ-साथ यहां केशव प्रसाद मौर्य के कामकाज की भी परीक्षा होगी.

फिलहाल गणित तो बीजेपी के पक्ष में है

चुनाव में जातीय गणित महत्वपूर्ण है. बीजेपी के लिए फायदे की बात यह है कि यूपी में कुर्मियों की पार्टी कही जाने वाले अपना दल के साथ उसका गठबंधन है. इस पार्टी की प्रमुख अनुप्रिया पटेल मोदी सरकार में मंत्री हैं. ऐसे में वह बीजेपी के लिए कुर्मी वोटरों को रिझाने का प्रयास करेंगी. इस सीट पर सबसे अधिक 2.25 लाख कुर्मी वोटर बताए जाते हैं.

बीएसपी कभी उप चुनाव नहीं लड़ती है. इसलिए ज्यादा उम्मीद यह है बीएसपी यहां अपना प्रत्याशी नहीं उतारेगी. उसका कांग्रेस से अभी गठबंधन भी नहीं है. इसलिए वह खुलकर कांग्रेस को समर्थन देने की बात भी नहीं तय कर पा रही है. बीएसपी के वरिष्ठ नेता उम्मेद सिंह का कहना है कि जब पार्टी ने कभी उप चुनाव लड़ा ही नहीं तो यहां भी नहीं लड़ेगी. हालांकि सियासी जानकारों का कहना है कि बीएसपी के चुनाव न लड़ने से बीजेपी को फायदा होगा.

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर एचके शर्मा कहते हैं कि किसी भी चुनाव में केवल जातीय आधार पर विजय पाना मुश्किल है. विपक्ष अलग-अलग लड़कर पहले ही कमजोर दिख रहा है. सिर्फ जाति के आधार पर प्रत्याशी खड़ा कर देने से काम नहीं चलता. यह सीट पहले कांग्रेस के पास थी. फिर समाजवादियों के पास आई. अब बीजेपी ने यहां अपना आधार बना लिया है. जनता विकास के नाम पर भी वोट करती है और यहां विकास के नाम पर सिर्फ एक यूरिया फैक्ट्री है.

कांग्रेस, एसपी ने लगाई जातीय गणित

फूलपुर से कांग्रेस और एसपी ने जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर टिकट वितरण किया है. एसपी ने फूलपुर से नागेंद्र सिंह पटेल को उम्मीदवार बनाया है. वजह साफ है कि यहां छह बार पटेल प्रत्याशी चुनाव जीत चुके हैं. इस सीट पर सबसे ज्यादा कुर्मी वोट हैं इसलिए पार्टी ने यह दांव खेला है. बीएसपी के संस्थापक कांशीराम को भी पराजित करने वाला पटेल ही था.

कांग्रेस ने भी फूलपुर से जातीय गणित को देखते हुए ब्राह्मण चेहरा मनीष मिश्रा पर दांवा लगाया है. उनके पिता जेएन मिश्रा आईएएस थे जिन्होंने वीआरएस लेकर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निजी सचिव की जिम्मेदारी संभाली थी. इस सीट पर 1.5 लाख ब्राह्मण वोटर बताए जाते हैं.

(न्यूज18 हिंदी के लिए ओम प्रकाश की रिपोर्ट)

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