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नोटबंदी पर ममता बनर्जी का अकेलापन, क्या होगा आगे 

ममता को लगता है कि कांग्रेस मजबूरी में उनके नेतृत्व को स्वीकार कर लेगी.

Updated On: Nov 20, 2016 03:03 PM IST

सुरेश बाफना
वरिष्ठ पत्रकार

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नोटबंदी पर ममता बनर्जी का अकेलापन, क्या होगा आगे 

अन्य विपक्षी दलों को विश्वास में लिए बगैर तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने नोटबंदी के खिलाफ संसद से लेकर राष्ट्रपति भवन तक जाने की घोषणा कर दी.

उन्होंने कहा कि अन्य विपक्षी दल मेरे साथ आए या न आए, मैं तो नोटबंदी के सवाल पर राष्ट्रपति से मुलाकात करूंगी.

दूसरी तरफ कांग्रेस, माकपा, जेडीयू, आरजेडी, भाकपा सहित कई विपक्षी दलों ने स्पष्ट कर दिया कि नोटबंदी के सवाल पर वे ममता बनर्जी के प्रस्तावित मार्च में शामिल होने के लिए तैयार नहीं है.

नोटबंदी के मुद्दे पर पहले संसद में चर्चा होनी चाहिए 

कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि नोटबंदी के मुद्दे पर पहले संसद में चर्चा होनी चाहिए और बाद में यदि जरूरत पड़ेगी तो राष्ट्रपति से भी मुलाकात की जाएगी.

ममता बनर्जी ने अतीत में भी कई मुद्‍दों पर राजनीतिक पहल करने की कोशिश की, किन्तु हर बार उन्हें अकेलेपन का शिकार होना पड़ा.

राष्ट्रपति चुनाव में ममता ने समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के साथ तालमेल किया था, लेकिन कुछ घंटों के बाद ही मुलायम सिंह यादव ने राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी का समर्थन करके ममता के अभियान को पंचर कर दिया था.

फोटो: पीटीआई फोटो: पीटीआई

ममता बनर्जी की नजर प्रधानमंत्री पद पर लगी हुई है. जब भी कोई मौका मिलता है, वे अपनी तरफ से पहल करके अन्य राजनीतिक दलों को साथ आने का न्यौता देती हैं.

ममता को शायद यह भ्रम है कि कमजोर कांग्रेस पार्टी मजबूरी के तहत उसके नेतृत्व को स्वीकार कर लेगी. कांग्रेस पार्टी ममता बनर्जी के राजनीतिक उद्देश्य को लेकर सदैव आशंकित रहती है. कांग्रेस को लगता है कि ममता उसके बचे-खुचे जनाधार को हड़पने की कोशिश कर रही है.

नोट बंदी पर मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा शुरू करने के लिए ममता बनर्जी ने कट्टर राजनीतिक दुश्मन माकपा के साथ भी संपर्क करने में संकोच नहीं किया.

यह कतई संभव नहीं था कि माकपा तृणमूल द्वारा निर्धारित मार्च में शामिल हो जाए. माकपा नेता सीताराम ने ममता के आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया.

ममता के राष्ट्रपति भवन मार्च को आम आदमी पार्टी व शिवसेना से समर्थन मिलने का दावा किया गया है.

शिवसेना इस मार्च में शामिल होगी, यह स्पष्ट नहीं है. ममता बनर्जी के लिए यह विचारणीय सवाल है कि जब भी वे किसी मुद्दे पर अपने नेतृत्व में अन्य विपक्षी दलों को जोड़ने की कोशिश करती है तो हर बार विफल क्यों होती है?

खुद को प्रधानमंत्री पद की दावेदार मानती हैं ममता

पश्चिम बंगाल में दूसरी बार विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद ममता बनर्जी खुद को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में देखने लगी थीं.

वह गैर-कांग्रेसी विपक्षी दलों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करती रहीं, लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस के बिना वह दिल्ली में अपना कोई वजूद नहीं सकतीं, तब उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के साथ जाने का निर्णय लिया.

कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों की शिकायत यह है कि ममता बनर्जी उनसे विचार-विमर्श किए बिना कुछ भी कार्यक्रम तय कर लेती हैं. ममता के साथ किसी राजनीतिक कार्यक्रम को अंजाम देना बहुत मुश्किल है.

ममता ने अपनी जिद की वजह से नोटबंदी के मुद्दे पर मोदी-विरोधी दलों के बीच विभाजन की स्थिति पैदा कर दी है.

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