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माया-अखिलेश की दोस्ती में कांग्रेस को कैसे मिलेगी डील?

कांग्रेस के कई बड़े नेता अंदरूनी तौर पर इस महागठंबधंन में शामिल होने की पैरवी कर रहे हैं. लेकिन कांग्रेस के कई नेता फ्रेंडली चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं

Updated On: Mar 27, 2018 09:21 AM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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माया-अखिलेश की दोस्ती में कांग्रेस को कैसे मिलेगी डील?

मायावती और अखिलेश के साथ आ जाने से राजनीति की नई इबारत लिखी जा रही है. एक ही प्रदेश की दोनों धुर विरोधी पार्टी बीजेपी को हराने के मकसद से साथ हैं, जिसको लेकर काफी उत्साह दिखाई दे रहा है. खासकर समाजवादी पार्टी के खेमे में जोश ज्यादा है. गोरखपुर और फूलपुर में बीजेपी की हार प्रदेश के अगुअा योगी आदित्यनाथ की व्यक्तिगत हार मानी जा रही है. बीएसपी की राज्यसभा चुनाव के हार के बाद ये कयास लगाए जा रहे थे कि मायावती गठबंधन से अलग हो जाएंगी लेकिन मायावती ने साफ कर दिया है कि समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन 2019 के आम चुनाव तक रहेगा. मायावती ने तैयारी भी शुरू कर दी है.

सोमवार को पार्टी के नेताओं और विधायकों के साथ बैठक कर मायावती ने फीडबैक लिया है, जिसके बाद मायावती ने जोनल कोऑर्डिनेटर्स को निर्देश दिया है कि जनता तक गठबंधन की बात पहुंचाएं. जाहिर है कि बीएसपी ने बीजेपी के खिलाफ मोर्चाबंदी में कांग्रेस से बाजी मार ली है. मायावती ने कहा है कि ये गठबंधन बीजेपी की गलत नीतियों के खिलाफ है. इस गठबंधन का दिल से स्वागत हो रहा है. बीजेपी हर प्रकार से बरगलाने में लगी हुई है लेकिन बीजेपी की इन टिप्पणियों का कोई असर नहीं होने वाला है.

इस गठबंधन से बीजेपी परेशान है क्योंकि आंकड़ों से ये गठबंधन काफी मजबूत दिखाई दे रहा है. दूसरे दोनों दलों के पास जुझारू कार्यकर्ताओं की फौज भी है. वहीं कांग्रेस अफसोस में है कि इस तरह के गठबंधन की कोशिश कांग्रेस ने क्यों नहीं की, जिससे कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई है. कांग्रेस के बड़े नेता चुनाव के वक्त आने का इंतजार करते रह गए. वहीं राजनीतिक तौर पर अंदाजा नहीं लगा पाए कि इस तरह मायावती कोई कदम उठा सकती हैं लेकिन बीएसपी और एसपी के बीच कई माध्यमों से बातचीत काफी अरसे से चल रही थी. कांग्रेस के साथ दिक्कत ये भी हो गई है कि यूपी में गठबंधन की कैप्टन मायावती हो गई है, जिनके साथ मोल भाव करना आसान नहीं है.

कांग्रेस के लिए दोहरी परेशानी

कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव में सेक्युलरवाद के नाम पर बीएसपी प्रत्याशी का समर्थन किया था. लेकिन लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस चूक गई. कांग्रेस के साथ दुश्वारी ये है कि वो एसपी-बीएसपी के साथ जाएगी तो सीटों को लेकर एडजस्टमेंट कैसे होगा. कांग्रेस के कद्दावर नेताओं की सीटों का क्या होगा. 2009 में कांग्रेस के पास यूपी से 23 सांसद थे, जिसके बाद एसपी-बीएसपी का नंबर था. लेकिन 2014 से कांग्रेस के पास दो लोकसभा सांसद हैं. जाहिर है कि वोट प्रतिशत के हिसाब से कांग्रेस कहीं नहीं टिक पा रही है.

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कांग्रेस के कई बड़े नेता जिसमें सलमान खुर्शीद, आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद, श्रीप्रकाश जायसवाल, पीएल पुनिया यूपी से सांसद थे, जिनके लिए सीटों का जुगाड़ करना कांग्रेस के लिए इस गठबंधन में चुनौती रहेगी क्योंकि यूपी में एसपी बीएसपी के साथ आने से कांग्रेस की ज्यादा अहमियत नहीं रह गई है. वहीं अगर कांग्रेस अलग से मोर्चाबंदी करे तो बीजेपी को फायदा होने की आशंका है क्योंकि इससे कई सीटों पर वोट बंटने के खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता है. कांग्रेस के ऊपर सेक्युलर वोट बांटने का भी आरोप लगेगा, जिससे कांग्रेस कश्मकश में है.

Congress ‘Steering Committee' meeting

कांग्रेस के कई बड़े नेता अंदरूनी तौर पर इस महागठंबधंन में शामिल होने की पैरवी कर रहे हैं. लेकिन कांग्रेस के कई नेता फ्रेंडली चुनाव लड़ने की बात कर रहें हैं. इस मसले पर कांग्रेस के भीतर मायावती-अखिलेश के अगले कदम का इंतजार है. अखिलेश यादव ने साफ कर दिया है कि गठबंधन नीतियों की बात पर ही मजबूती के साथ चल सकता है. सीटों के बारे में बातचीत से ज्यादा हासिल नहीं होगा. इशारा कांग्रेस की तरफ है कि कांग्रेस ज्यादा सीटों के चक्कर में ना रहे. इस गठबंधन की शर्त अब रीजनल पार्टी ही तय करेंगी. हालांकि यूपी उपचुनाव में गठबंधन को लेकर कांग्रेस प्रभारी गुलाम नबी आज़ाद का कहना है कि एसपी से पार्टी फूलपुर सीट मांग रही थी, जिसके लिए अखिलेश यादव ने इनकार कर दिया था.

वोटों का समीकरण

यूपी के उपचुनाव नतीजों से बीएसपी काफी खुश नजर आ रही है. पार्टी को लग रहा है कि 2014 और 2017 के चुनाव में बीएसपी का वोट बीजेपी में पलायन कर गया था, अब वो वापिस आ गया है. बीएसपी ये समझ रही है कि एसपी-बीएसपी के साथ आने से 43 फीसदी वोटों पर अधिकार हो जाएगा. हालांकि 2014 के आंकड़ों के मुताबिक बीजेपी को 42.6 फीसदी वोट मिले हैं. वहीं एसपी-बीएसपी को मिलाकर 42.1 फीसदी वोट मिला है, जो बीजेपी से कम है. यानी निर्णायक लड़ाई लड़ने के लिए कांग्रेस के हाथ की जरूरत है. कांग्रेस को 2014 में 7.5 फीसदी वोट मिला था. ये तीनों दल के साथ आने से ही बीजेपी के वर्चस्व को चुनौती दी जा सकती है.

Rahul Gandhi meets party workers

वहीं जातीय आंकड़ों के मुताबिक, दलित 20 फीसदी मुस्लिम 19 फीसदी और यादव 9 फीसदी मिलाकर तकरीबन 48 फीसदी वोट का आंकड़ा बैठ रहा है. लेकिन मुश्किल है कि बीएसपी का गैरजाटव वोट काफी हद तक बीजेपी के साथ जा चुका है. खासकर पासी वोट जिसके बड़े नेता बीजेपी में शामिल हो गए हैं. मौर्या वोट भी बीजेपी ने काफी हद अपने पक्ष में कर लिया है, वहीं बीजेपी ने यादव वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए राज्यसभा में हरनाथ सिंह यादव को भेजा है. राजभर वोट पर भी बीजेपी की पैनी नजर है, जो पहले बीएसपी के साथ था. बीएसपी के बड़े नेता रामअचल राजभर को मायावती का करीबी माना जाता है, उनकी काट के लिए सकलदीप राजभर को बीजेपी ने राज्यसभा भेज दिया है.

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कांग्रेस के उम्मीदवारों में भगदड़

कांग्रेस के लोकसभा के संभावित उम्मीदवार इस गठबंधन के बनने के बाद कशमकश में हैं. उनको लग रहा है कि अगर कांग्रेस इस गठबंधन के साथ जाएगी तो उनका पत्ता कट सकता है क्योंकि कांग्रेस की पहली प्राथमिकता अपने बड़े नेताओं की सीटों के हासिल करना रहेगा. बलरामपुर के कांग्रेस के पूर्व सांसद रिज़वान ज़हीर वापिस समाजवादी पार्टी के साथ हो गए हैं क्योंकि डर है कि सीट कहीं एसपी-बीएसपी के खाते में न चली जाए. अभी एसपी-बीएसपी का समीकरण मुफीद लग रहा है. इस तरह से कांग्रेस कई नेता नए समीकरण में अपनी भूमिका तलाश रहे हैं. बीजेपी के भी सांसद ऊहापोह में हैं.

कांग्रेस की डील

2019 के आम चुनाव से पहले तीन बड़े राज्यों के चुनाव हैं. कांग्रेस चाह रही है कि बुंदेलखंड के आस-पास की सीटों पर एसपी-बीएसपी से तालमेल कर लिया जाए, इससे वोटों में तो फायदा होगा ही दूसरे कांग्रेस ये दिखाना चाहती है कि उसका दिल बड़ा है. सभी दलों को साथ लेकर चलने की जुगत भिड़ा रही है. राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की कुछ सीटों पर बीएसपी का असर है. वहीं एसपी की यूपी से लगे कुछ इलाकों में अच्छी पैठ है. ऐसे में कांग्रेस आम चुनाव से पहले नया समीकरण बनाने की कवायद मे तो जुटी है लेकिन उसकी पकड़ पहले की तरह मजबूत नहीं है. रीजनल पार्टियां अपने हिसाब से गठबंधन को आगे बढ़ा रही हैं.

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राहुल गांधी को करनी चाहिए पेशरफ्त

सोनिया गांधी अपने हिसाब से यूपीए-3 बनाने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन कांग्रेस के नेता महसूस कर रहे हैं कि ये कोशिश राहुल गांधी की तरफ से होनी चाहिए थी. राहुल गांधी को सभी सेक्युलर दल के नेताओं से खुद मिलना चाहिए था. इससे एक तो आपसी विश्वास बढ़ता, दूसरे कांग्रेस को पता चलता कि बाकी दलों का क्या रुख है, कौन इसमें कांग्रेस के साथ है ,कौन सा दल साथ छोड़ सकता है, जैसे नीतिश कुमार के साथ हुआ है. हालांकि चुनाव में काफी वक्त है. लेकिन बीजेपी चुनाव के लिए तैयार है. कांग्रेस को अभी तैयारी शुरू करनी है, जिससे पार्टी के नेता भी असमंजस में हैं.

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