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क्या मोदी की ‘अराजकता’ वाली थ्योरी 2019 में महागठबंधन का रास्ता रोक पाएगी?

यह देखना बाकी है कि क्या बीजेपी मशहूर चुनावी रणनीति अवधारणा और हकीकत के बीच का अंतर पाट पाएगी

Updated On: Jul 04, 2018 01:03 PM IST

Sreemoy Talukdar

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क्या मोदी की ‘अराजकता’ वाली थ्योरी 2019 में महागठबंधन का रास्ता रोक पाएगी?

स्वराज्य मैगजीन की ओर से लिया गया नरेंद्र मोदी का विस्तृत साक्षात्कार 2019 में बीजेपी द्वारा अपनाई जाने वाली रणनीति पर व्यापक रूप से रोशनी डालता डालता है. विस्तृत विषयों को शामिल करने वाले सवालों पर प्रधानमंत्री की तरफ से और भी विस्तृत जवाब दिए गए, जिनमें वह उन उपलब्धियों के बारे में बताते हैं, जिन पर वह गर्व कर सकते हैं और उन कमजोरियों के बारे में भी बताते हैं, जिनसे उन्हें जूझना पड़ सकता है.

मतदाताओं को दिलाना होगा विश्वास

जाहिर है कि मोदी अवधारणा या परसेप्शन के महत्व से इनकार नहीं करेंगे, जिसे अगले साल सत्ता में वापसी के लिए उन्हें जीतना ही होगा. और वह चुनावी संग्राम में अपनी सबसे बड़ी कमजोरी के बारे में भी जानते हैं- अर्थव्यवस्था में गहरे और संस्थागत बदलावों के चलते, जो दीर्घकाल में फायदेमंद हो सकते हैं, मोदी ने अपने मतदाताओं को फौरी तौर पर तकलीफ में डाल दिया है.

इसने विपक्ष के हाथ में हथियार दे दिया है. एक तरफ जहां सुधार वाकई में 'अच्छे दिन' लाने के लिए जरूरी हैं, मगर इन 'अच्छे दिनों' का असर उलटा पड़ा तो इन सुधारों की संक्रमणकालीन अवधि भारी पड़ सकती है. इसका असर कम करने के लिए, मोदी को अपने वायदों को पूरा करने के लिए उठाए गए कदमों का व्यापक ब्यौरा देते हुए, किसी भी तरह अपने मतदाताओं को समझाना होगा कि वह सही कर रहे हैं, और ऐसा करके वह उम्मीद कर सकते हैं कि जनता उनके इरादों की ईमानदारी पर यकीन करेगी.

यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2014 के उलट वह इस बार बहुत ज्यादा सपने नहीं बेच सकते. यह कुछ नतीजे हैं, जो इंटरव्यू से सामने आते हैं, जबकि बाकी कुछ कम महत्वपूर्ण बातें भी हैं.

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महागठबंधन के खिलाफ अराजकता सिद्धांत

इन संकेतों से इतर, यह भी देखना रोचक होगा कि मोदी विपक्ष की एकता का किस तरह सामना करने की तैयारी कर रहे हैं. यह करीब-करीब तय सा लगता है कि 2019 में कांग्रेस सभी गैर-बीजेपी दलों को साझा मंच पर लाने में फेसिलिटेटर की भूमिका निभा रही होगी- वह चाहे चुनाव पूर्व हो या चुनाव बाद. प्रधानमंत्री इस रणनीति को दो तरीकों से भेदने की उम्मीद कर सकते हैं- एक अराजकता और दूसरा विकास से.

'अराजकता सिद्धांत' मोदी की चाल है कि अगर विपक्ष 'मोदी विरोधी' गठजोड़ (आशा के उन्होंने इसको खारिज भी कर दिया) बना भी लेता है, तो अस्थिर व्यवस्था होगी, जिसमें साझीदार अंदरूनी झगड़ों को ही सुलझाने में इतने व्यस्त रहेंगे कि गवर्नेंस पर ध्यान ही नहीं दे पाएंगे.

साक्षात्कार के दौरान उन्होंने कहा, 'किसी भी चुनाव में, एक विचारधारा-विहीन और अवसरवादी गठबंधन अराजकता की पक्की गारंटी है. अगले चुनाव में एक तरफ गवर्नेंस व विकास और दूसरी तरफ अराजकता के बीच चुनाव करने का होगा.' इसके उलट यह बीजेपी को एक ऐसी इकलौती पार्टी के रूप में पेश करता है, जो भारत को अराजकता के गर्त में जाने से रोक सकती है और ऐसी स्थिरता दे सकती है, जिसकी राष्ट्र को आवश्यकता है. मोदी ने 'महागठबंधन' को सत्ता के भूखे नेताओं के ऐसे गठबंधन के रूप में पेश किया जिनका 'अस्तित्व बचाने' और 'मोदी को हटाने' के सिवा कोई एजेंडा नहीं है. उन्होंने 1977, 1989 (जब कांग्रेस को हराने के लिए विशाल गठबंधन बना था) और 2019 की राजनीतिक स्थिति के बीच अंतर भी पेश किया.

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उनके अनुसार 1977 और 1989 में गठबंधन की जरूरत आपातकाल और बोफोर्स घोटाले के चलते पड़ी थी, जबकि 2019 में ऐसा कोई पवित्र उद्देश्य नहीं है. मोदी मजबूत जमीन पर खड़े हैं. कांग्रेस-जेडी(एस) गठबंधन जो कि कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए हड़बड़ी में किया गया था, उसके बाद से लगातार गलत वजहों से चर्चा में है. चुनावी मौसम में जबकि गठबंधन प्रत्यक्षतः 'लोकतंत्र को बचाने' के लिए संयुक्त मोर्चा बनाने की कवायदों में जुटा है, साझीदारों के बीच बार-बार नुमायां हो रही अंदरूनी खींचतान की खबरें (यहां, यहां और यहां देखें) कतई स्थिरता की तस्वीर पेश नहीं करतीं. कांग्रेस-जेडी(एस) की खींचतान ऐसा आभास देती है कि नकारात्मक एजेंडा (बीजेपी को सत्ता में आने से रोकना) आत्मघाती हो सकता है. मोदी ने कहा कि क्षेत्रीय स्तर पर नेताओं और उनके प्रतिद्वंद्वियों के बीच मौजूद “नापसंदगी और अविश्वास” से लगता है कि गठबंधन स्थायी नहीं होगा और राष्ट्रहित और विकास पर ध्यान केंद्रित किए जाने की संभावना को कमजोर करता है.

वह कर्नाटक को एक उदाहरण के तौर पर पेश करते हैं, 'जहां मंत्री एक दूसरे से 'विकास के मुद्दे हल' करने के लिए नहीं मिलते, बल्कि अंदरूनी झगड़ों को शांत करने के लिए मिलते हैं! विकास यहां नेपथ्य में चला गया गया है.'

गठबंधन की खींचतान की आग में घी

यहीं मोदी के अंदर का राजनीतिज्ञ जाग जाता है, जब वह गठबंधन की खींचतान में आग में घी डालते हुए कहते हैं कि कांग्रेस का अपने सहयोगियों की मान-मनुहार के पीछे उसका अस्तितत्व के संकट के खतरे से डरा होना है, ना कि उसकी मूल सोच में कोई बदलाव आया है.

वह एचडी देवेगौड़ा का जिक्र करना नहीं भूलते, जब कांग्रेस ने 1997 में उनकी कुर्सी गिरा दी थी. मोदी का यह कटाक्ष मीडिया में चलती उन खबरों (देखें और देखें) के बीच आया है जिनमें बताया गया है की जेडी(एस) के बुजुर्ग नेता कांग्रेस द्वारा उनकी पार्टी के साथ किए जा रहे बर्ताव से खुश नहीं हैं.

ऐसा लगता है कि मोदी जेडी(एस) के लिए एनडीए में आने को दरवाजा अधखुला रखना चाहते हैं, और बीजेपी के खुद के साझीदारों के साथ खींचतान की खबरों से ध्यान हटाना चाहते हैं. वह एक भावनात्मक सुरक्षा खड़ी करना चाहते हैं कि एनडीए 'एक बड़ा और खुशहाल परिवार है.'

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वह जोशीले अंदाज में दावा करते हैं कि एनडीए '20 दलों का एक बड़ा और खुशहाल परिवार है' जो कि कई राज्यों में सरकार में है. तकनीकी रूप से मोदी गलत नहीं हैं, लेकिन एनडीए के 'हैप्पीनेस' मीटर पर आलोचक सवाल उठाते हैं. चंद्रबाबू नायडू वॉकआउट कर चुके हैं. शिवसेना लगातार एक दिलजले आशिक की तरह बर्ताव कर रही है और नीतीश कुमार एक और यू-टर्न लेने के कगार पर हैं. हो सकता है मोदी सच को ना मानें, लेकिन यह सिर्फ सत्ता की ताकत का मामला हो सकता है. वह लंबे समय से राजनीति में हैं और जानते हैं कि सत्ता वो चुंबक है, जो दलों को एक साथ जोड़े रखता है, ना कि विचारधारा. और अगर बीजेपी को दोबारा व्यापक जनसमर्थन मिलता है तो सहयोगी उनके पीछे ही चलेंगे.

 'गुड गवर्नेंस और विकास' बनाम 'अराजकता'

अगर मोदी 2019 के चुनाव को 'गुड गवर्नेंस और विकास' बनाम 'अराजकता' बनाना चाहते हैं, तो उन्हें निश्चित रूप से संवादहीनता की स्थिति को सुधारना होगा, जो उनकी सरकार की सबसे बड़ी नाकामी है. काम किया गया है, लेकिन इसे किया गया दिखना भी चाहिए.

जैसा कि नीति आयोग के पूर्व वाइस चेयरमैन अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया ने Foreign Affairs में लिखा है, 'बीते चार सालों में मोदी सरकार ने ज्यादा विकास और समृद्धि लाने के लिए अर्थव्यवस्था में व्यापक सुधार किए हैं. हालांकि इसकी कई नीतियों का उल्लेखनीय असर हुआ है, लेकिन ज्यादातर के पूरे फायदे सामने आने में समय लगेगा…'

प्रधानमंत्री का बारीक विवरण के साथ अपने प्रदर्शन और उपलब्धियों के बारे में बताना अनकही स्वीकारोक्ति है कि आधुनिक युग की टेक्नोलॉजी के भारी इस्तेमाल के बावजूद भी, सरकार के सारे काम की जानकारी जनता तक नहीं पहुंची. उदाहरण के लिए, जॉब्स के मुद्दे पर मोदी स्वीकार करते हैं कि सटीक आंकड़ों के अभाव में डाटा बेस तैयार नहीं किया जा सका और तर्कपूर्ण आकलन नहीं हो सका. इस संबंध में, अगर सरकार का जॉब की गणना करने का परंपरागत ढांचा ठीक नहीं है, तो भी यह सरकार की ही जिम्मेदारी थी कि डाटा की क्वालिटी सुधारती. प्राथमिक डाटा की गैरमौजूदगी में, प्रधानमंत्री ने अपने दावे के लिए तृतीयक आंकड़ों का सहारा लेते हुए कहा, अगर राज्य '53 लाख जॉब्स' (कर्नाटक) '68 लाख जॉब्स' (पश्चिम बंगाल) पैदा कर रहे हैं तो यह कैसे मुमकिन है कि 'राज्य तो जॉब्स पैदा कर रहे हैं और केंद्र सरकार बेरोजगारी?'

इस पहलू पर असफल रही है बीजेपी

एक और उदाहरण के तौर पर जीएसटी को ले सकते हैं, जिसके 'खराब तरीके से लागू किए जाने' और 'जटिल ढांचे' को लेकर सरकार विपक्ष और आलोचकों के निशाने पर रही, यह कहते हुए मोदी का दर्द उभर आया कि सरकार आलोचना को लेकर संवेदनशील है और शुरुआती समस्याओं को हल करने के लिए सक्रियता से काम कर रही है. एक बार फिर, यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह लोगों को संक्रमणकालीन समस्याओं के बारे में समझाए कि इनसे थोड़े समय की तकलीफ बाद में बड़ा फायदा देगी. बीजेपी सरकार ऐसा कर पाने में नाकाम रही है. हालांकि यूपीए-2 सरकार ने अर्थव्यवस्था को जिस दलदल में छोड़ा था, मोदी सरकार काफी हद तक वहां से निकाल लाई है, लेकिन इस मुद्दे पर बहुत जोर नहीं दिया गया.

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2014 में अर्थव्यवस्था की वास्तविक दशा पर श्वेत पत्र नहीं लाकर बीजेपी ने पी. चिदंबरम जैसे लोगों को बीजेपी पर 'आर्थिक कुप्रबंधन के लिए निशाना साधने का आसान मौका दे दिया है, जबकि वास्तव में यूपीए-युग के वित्त मंत्री को 'बजट बाजीगरी' के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए. मोदी ने कहा कि उन्होंने पहले से ही निराशा के माहौल में और निराशा बढ़ाने के लिए आर्थिक बदहाली का मुद्दा उठाने के बजाय 'राजनीति' पर 'राष्ट्रनीति' को वरीयता दी.

कुल मिलाकर बड़ी बात यह है कि हालांकि, अप्रभावी संवाद के चलते बीजेपी की उपलब्धियों को ठीक से पेश नहीं किया जा सका. इसलिए हम इस साक्षात्कार में लगातार आंकड़े पेश किए जाने और आंकड़ों को स्थापित किए जाने की कोशिश देखते हैं. यह देखना बाकी है कि क्या बीजेपी मशहूर चुनावी रणनीति अवधारणा और हकीकत के बीच का अंतर पाट पाएगी.

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