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BJP के 'चाणक्य' ने 2019 के लिए क्यों खोला है पानीपत के तीसरे युद्ध का पन्ना?

बीजेपी के चाणक्य ने इतिहास के पन्नों से हिंदू मराठाओं की हार और अपमान का अध्याय निकालकर 2019 के चुनावों की बिसात जरूर बिछा दी है

Updated On: Jan 13, 2019 09:16 AM IST

Tulika Kushwaha Tulika Kushwaha

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BJP के 'चाणक्य' ने 2019 के लिए क्यों खोला है पानीपत के तीसरे युद्ध का पन्ना?

2019 के लोकसभा चुनावों में ज्यादा वक्त नहीं बचा है. राजनीतिक पार्टियों ने चुनावी तैयारियां भी शुरू कर दी है. भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने शुक्रवार को दिल्ली के रामलीला ग्राउंड से चुनावी प्रचार का बिगुल बजाया.

शाह ने लोकसभा चुनाव प्रचार के पहले भाषण में विपक्षी पार्टियों पर भी तीर छोड़े और बीजेपी कार्यकर्ताओं में इस लड़ाई को लड़ने के लिए जोश भी भरा. शाह ने 2019 के चुनावों को युद्ध का नाम दिया है.

2019 का चुनाव बीजेपी के लिए युद्ध जैसा ही होने वाला है. जहां पिछले कुछ वक्त में बीजेपी की सहयोगी पार्टियां रह-रहककर उसे परख रही हैं, वहीं अलग-अलग गठबंधन भी उसकी राह मुश्किल करने वाले हैं.

ऊपर से बीजेपी के लिए ये चुनाव इसलिए भी इतने अहम होंगे क्योंकि ये नतीजे मोदी सरकार के चार सालों के फैसलों और नीतियों पर जनता की मुहर लगी या नहीं, ये बताएंगे.

पानीपत के तीसरे युद्ध जैसे नतीजे का डर

इसलिए जब अमित शाह ने शुक्रवार को लड़ाई की शुरुआत की तो इसकी तुलना पानीपत के तीसरे युद्ध से करके इसे और भी बड़ा कैनवास दे दिया. शाह ने अपने संबोधन में कहा कि बीजेपी कार्यकर्ताओं को खूब मेहनत करनी होगी. अगर बीजेपी नहीं जीती तो ये पानीपत के तीसरे युद्ध जैसा होगा, जब अफगानों ने मराठों को हरा दिया था और देश अगले दो सालों के लिए विदेशी ताकतों के हाथों में चला गया था.

1761 के पानीपत के युद्ध में हिंदू पेशवाओं की हार को अपमान और राष्ट्रीयता से जोड़कर लोकसभा चुनावों को देखने का शाह का ये नया पैंतरा है. लेकिन शाह ने अपने भाषण में लोगों को पानीपत के युद्ध का चश्मा क्यों चढ़ाया और क्या हुआ था पानीपत के तीसरे युद्ध में, जानने के लिए एक बार इतिहास का रुख करते हैं.

क्या हुआ था पानीपत के तीसरे युद्ध में

पानीपत का तीसरा युद्ध 14 जनवरी, 1761 को अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली और हिंदू मराठाओं के बीच दिल्ली से लगभग 100 किलोमीटर दूर पानीपत में हुआ था.

1707 में मुगल शासक औरगंजेब की मौत के बाद भारत बहुत ही अस्थिर राजनीतिक स्थिति में फंस गया था. मुगल सल्तनत कमजोर पड़ रही थी. उसके साथी उसका साथ छोड़कर खुद को स्वायत्त घोषित कर रहे थे. जगह-जगह विद्रोह हो रहे थे. इनमें मराठा भी शामिल थे. मराठाओं ने खुद को बहुत मजबूत कर लिया था और दूसरे दक्कन से उत्तर भारत तक वो जीत हासिल कर रहे थे. 1758 के आसपास मराठा लाहौर और पेशावर तक पहुंच और अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली के बेटे तिमुर शाह दुर्रानी को पंजाब और कश्मीर से बाहर धकेल दिया, जिसने अहमद शाह अब्दाली को मराठाओं से लोहा लेने का न्यौता दे दिया.

अब्दाली अपनी बड़ी सेना के साथ पंजाब आ गया. यहां छोटी-छोटी लड़ाइयों में दोनों सेनाएं एक दूसरे को शह-मात देती रहीं. लेकिन मराठाओं को काफी नुकसान हुआ क्योंकि वो राजपूतों, सिखों और जाटों को अपने साथ अब्दाली के खिलाफ लड़ने के लिए राजी नहीं कर पाए. वहीं, अहमद शाह को दो हिंदुस्तानी शासकों- दोआब के रोहिल्ला अफगान और अवध के शुजाउद्दौला नवाब की तरफ से मदद मिली थी. ये मराठाओं की हार का सबसे बड़ा कारण बना.

इसके अलावा उनका राशन भी खत्म हो रहा था. उनकी सेना का शस्त्रागार अफगानों के उन्नत हथियारों के आगे कमतर साबित हो रहा था. पानीपत के तीसरा युद्ध होने तक मराठाओं की सेना इतनी कमजोर और असहाय हो चुकी थी कि युद्ध उसी दिन खत्म हो गया और अब्दाली की सेना ने अधिकतर मराठा लड़ाकों को या तो मार दिया या बंदी बना लिया. जो बचे वो भाग गए.

2019 में पानीपत का नैरेशन?

अमित शाह ने कहा है कि मराठाओं की हार से ही देश दो सौ सालों के लिए औपनिवेशिक गुलामी के दौर में डूब गया. लेकिन तकनीकी रूप से ये सही नहीं है. इतिहासकार बिपन चंद्रा ने अपनी किताब मॉडर्न हिस्ट्री ऑफ इंडिया में लिखा है कि 'पानीपत के युद्ध से अफगानों को बहुत नुकसान हुआ. वो अपनी जीत का फायदा तक नहीं उठा पाए. हां उनकी जीत ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल और दक्षिण भारत में मजबूत होने का मौका जरूर दिया. पानीपत के युद्ध ने ये तय नहीं किया कि भारत पर राज कौन करेगा, इसने ये तय किया कि भारत पर राज कौन नहीं करेगा. लेकिन इसने भारत में ब्रिटिश ताकत के रास्ते तय कर दिए.'

बीजेपी की लड़ाई भी अभी गठबंधन से है और उसके सहयोगी भी हैं, जो छिटक रहे हैं. लेकिन जैसा कि उनके बयान पर कुछ लोगों ने ये कहते हुए विरोध भी जताया है कि बीजेपी न तो मराठा है, न ही ये 1761 का वक्त है, ऐसे में शाह के लिए 2019 में पानीपत का नैरेशन बिठा पाना पेचीदा होगा.

लेकिन हिंदुत्व की राजनीति करने वाली बीजेपी के चाणक्य ने इतिहास के पन्नों से हिंदू मराठाओं की हार और अपमान का अध्याय निकालकर 2019 के चुनावों की बिसात जरूर बिछा दी है, जिसमें उसकी परीक्षा भी होनी है और उसके सहयोगियों और विपक्ष की भी.

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