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मिशन 2019: क्या तीसरे मोर्चे का कोई भविष्य है?

चंद्रशेखर राव और ममता बनर्जी जैसे नेता गैर-बीजेपी गैर-कांग्रेस विकल्प की वकालत कर रहे हैं, लेकिन 2019 की लड़ाई मोदी बनाम राहुल बनती जा रही है

Updated On: Jan 10, 2019 08:20 AM IST

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth

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मिशन 2019: क्या तीसरे मोर्चे का कोई भविष्य है?

लोकसभा चुनाव के करीब आते ही एक बात साफ होती जा रही है. बीजेपी के खिलाफ तमाम विरोधी दलों का राष्ट्रीय महागठबंधन बनने की वैसी संभावना नहीं है, जिसका दावा कुछ महीने पहले तक कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी कर रहे थे. तेलुगु देशम का कांग्रेस के साथ आना विपक्षी एकता के लिहाज से एक बड़ी घटना थी.

लेकिन 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश के दो सबसे ताकतवर दलों, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने यह साफ कर दिया है कि वे बीजेपी को हराने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन में शामिल होने को तैयार नहीं हैं. एसपी-बीएसपी ने अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल के साथ मिलकर यूपी में महागठबंधन बनाने की बात कही है, जिसकी औपचारिक घोषणा होनी अभी बाकी है. अखिलेश यादव और मायावती की तरफ से समय-समय पर कांग्रेस के खिलाफ बयान आ रहे हैं, जिनसे यह तकरीबन तय माना जा रहा है कि चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं हो पाएगा.

ममता बनर्जी को भी महागठबंधन पसंद नहीं

बंगाल की ताकतवर नेता ममता बनर्जी भी कांग्रेस की अगुआई वाले विपक्षी महागठबंधन की संभावनाओं को लगभग खारिज कर चुकी हैं. चंद्रबाबू नायडू और शरद यादव जैसे वरिष्ठ नेताओं की पहल का भी उन्होने कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया है. इस बीच दूसरी खबर यह है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री और टीआरएस नेता चंद्रशेखर राव लगातार एक ऐसा फेडरल फ्रंट बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें गैर-कांग्रेस और गैर-बीजेपी पार्टियां शामिल हों.

मोटे तौर पर इस फेडरल फ्रंट की परिकल्पना क्षेत्रीय पार्टियों के एक फोरम के रूप में है. चंद्रशेखर राव की इस पहल को लेकर ममता बनर्जी उत्साहित नज़र आ रही हैं. अखिलेश यादव और मायावती ने अब तक फेडरल फ्रंट के पक्ष में खुलकर कुछ नहीं कहा है लेकिन संकेतों से साफ है कि उन्होने यह विकल्प पूरी तरह खुला रखा है.

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देश की राजनीतिक परिस्थितियां पिछले कुछ समय में बहुत तेजी से बदली हैं. राजस्थान, मध्य-प्रदेश और छत्तीसगढ़ के नतीजों के बाद हाशिए पर पड़ी कांग्रेस पार्टी अब पूरी ताकत के साथ बीजेपी को ललकारने के लिए तैयार है. ऐसे में छोटी पार्टियों के लिए कांग्रेस के साथ सौदेबाजी के विकल्प सीमित हो गए हैं. मामला यूपीए बनाम एनडीए या मोदी बनाम राहुल बनता जा रहा है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि मौजूदा हालत में क्या थर्ड फ्रंट या फेडरल फ्रंट कोई विकल्प हो सकता है?

क्या है थर्ड फ्रंट की कहानी?

सबसे पहले हमें यह समझना पड़ेगा कि तीसरी शक्ति का मतलब क्या है और राष्ट्रीय राजनीति में ऐतिहासिक रूप से उसकी क्या भूमिका रही है. थर्ड फ्रंट की कहानी आज से तीन दशक पहले शुरू होती है.

1989 भारतीय राजनीति का टर्निंग प्वाइंट था. यह वही साल था, जब बीजेपी एक बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी और उसके बाद यह तय हो गया कि नेशनल पॉलिटिक्स मुख्य तौर पर इन्हीं दो पार्टियों यानी कांग्रेस और बीजेपी के इर्द-गिर्द घूमेगी. 1989 सिर्फ बीजेपी के उभार का साल नहीं था. कमंडल के साथ मंडल का दौर भी शुरू हो गया. पिछड़े समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले क्षत्रप अपने-अपने इलाकों में मजबूत हुए और कई क्षेत्रीय पार्टियां अपना स्थाई किस्म का जनाधार बनाने में कामयाब रहीं.

1989 के लोकसभा चुनाव में गैर-कांग्रेस और गैर-बीजेपी पार्टियों को 543 सदस्यों वाली लोकसभा में 261 सीटें मिलीं. उसके बाद से हर लोकसभा चुनाव में ये पार्टियां औसतन करीब 225 सीटें हासिल करती आई हैं. 2014 की मोदी लहर के बावजूद गैर-बीजेपी और गैर-कांग्रेस दलों को 214 सीटें मिली थीं. यानी इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि कांग्रेस और बीजेपी के अलावा जो 'अन्य' है, उसकी राष्ट्रीय राजनीति में एक ताकतवर उपस्थिति है.

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लेकिन बड़ी संख्या के बावजूद 'अन्य' इसलिए प्रभावी नहीं हैं क्योंकि ये पूरी तरह बिखरे हुए हैं. बीस सीटों वाले बीजू जनता दल (BJD) या दहाई अंकों तक पहुंचने वाली TRS या YSR कांग्रेस इस हालत में नहीं हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में कोई बड़ी भूमिका निभा सकें. ऐसे में चंद्रशेखर राव और ममता बनर्जी जैसे नेताओं की तीसरा मोर्चा बनाये जाने की वकालत में दम नज़र आता है.

लेकिन क्या कागज पर दिखाई देने वाली तस्वीर व्यवहारिक रूप से भी वैसी ही है? थोड़ा सा रुककर विश्लेषण करें तो समझ में आता है कि थर्ड फ्रंट या फेडरल फ्रंट की संभावना बहुत सी पेचीदगियों में फंसी है.

क्षेत्रीय पार्टियों का पेचीदा गणित

भारतीय राजनीति में तीसरी शक्ति या अन्य की ताकत को सिर्फ आंकड़ों के आधार पर नहीं आंका जा सकता है. यह ठीक है कि बहुत सी पार्टियां ना NDA में हैं ना UPA में, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वे तमाम पार्टियां एक साथ एक मंच पर आने को तैयार हैं.

उदाहरण के तौर पर हम लेफ्ट पार्टियों को ले सकते हैं. लेफ्ट पार्टियां `अन्य’ कैटेगरी में आती हैं. 1998 में लेफ्ट ने तीसरे मोर्चे की सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी. सीपीआई पहले एच.डी.देवगौड़ा और फिर आईके गुजराल के नेतृत्व वाली सरकारों में शामिल भी हुई थी. लेकिन इस बार स्थितियां बहुत अलग हैं.

लेफ्ट पार्टियां तीसरे विकल्प का झंडा उठाने की स्थिति में नहीं हैं. हालांकि केरल में उनकी कांग्रेस से सीधी लड़ाई है. इसके बावजूद वे बीजेपी को अपना ज्यादा बड़ा दुश्मन मानती हैं. उन्हें अगर किसी भी तरह यह लगता है कि तीसरे मोर्चे से यूपीए कमज़ोर होगा और फायदा बीजेपी को होगा तो वे इससे दूर रहना चाहेंगी. वैसे भी लेफ्ट किसी ऐसे गठबंधन का हिस्सा नहीं बन सकता जिसमें सबसे ताकतवर स्थिति में उनकी प्रबल राजनीतिक विरोधी ममता बनर्जी हों.

थर्ड फ्रंट में क्या है समानता?

तीसरे मोर्चे में शामिल होनेवाली संभावित पार्टियों में एक ही बात कॉमन है. उनकी कांग्रेस और बीजेपी दोनो से दुश्मनी है. लेकिन इस दुश्मनी के बावजूद इनमें से ज्यादातर पार्टियां कांग्रेस या बीजेपी दोनो में से किसी एक के साथ हल्की सी नरमी रखती हैं. अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी. ज़रूरत पड़ने पर समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ फिर से हाथ मिला सकती है लेकिन बीजेपी के साथ ऐसा कर पाना उसके लिए संभव नहीं है.

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दूसरी तरफ चंद्रशेखर राव की TRS की लड़ाई पूरी तरह कांग्रेस से है. तेलंगाना में बीजेपी की ताकत बहुत कम है. ऐसे में चंद्रशेखर राव के लिए चुनाव के बाद भी यूपीए के साथ जाना संभव नहीं होगा. अविश्वास प्रस्ताव के दौरान टीआरएस ने मोदी सरकार के खिलाफ वोट नहीं दिया था बल्कि नवीन पटनायक की बीजेडी की तरह सदन से अनुपस्थित रहने का फैसला किया था. इसी वजह से कुछ लोगों का यह कहना है कि टीआरएस का रवैया बीजेपी के लिए नर्म है. यही बात पटनायक की पार्टी बीजेडी के लिए भी कही जाती है.

लेकिन इस नरमी का यह मतलब नहीं है कि TRS या BJD 2019 में बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकती हैं. उड़ीसा की 21 सीटों में BJD को पिछली बार 20 में जीत हासिल हुई थी. लेकिन इस बार हालात पूरी तरह बदले हुए हैं. यहां बीजेपी अपने लिए बहुत ज्यादा संभावनाएं देख रही है.

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अलग-अलग सर्वे यह बता रहे हैं कि अगर किसी एक राज्य में बीजेपी को सबसे ज्यादा फायदा होने की उम्मीद है, तो वह उड़ीसा ही है. ज़ाहिर है, नुकसान BJD को होगा. उधर उड़ीसा विधानसभा में कांग्रेस बरसों से मुख्य विपक्षी पार्टी रही है. यानी नवीन पटनायक के लिए कांग्रेस और बीजेपी दोनो एक जैसे दुश्मन हैं. इसलिए तीसरा मोर्चा उनके लिए विकल्प नहीं बल्कि मजबूरी का नाम है.

ऐसी ही मजबूरी चंद्रशेखर राव के साथ भी है. पार्टी केंद्र सरकार को लेकर आक्रमक रवैया नहीं रखती है. इसके बावजूद वह एनडीए में नहीं जा सकती है. अगर वह ऐसा करती है, तो उसके मुसलमान वोटर छिटकर कांग्रेस की तरफ चले जाएंगे. बंगाल में लेफ्ट और कांग्रेस दोनों की लड़ाई ममता बनर्जी के खिलाफ रही है.

ऐसे में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन में ममता का जाना संभव नहीं है. बंगाल में बीजेपी पिछले कुछ समय से अपना जनाधार बढ़ाने की आक्रमक कोशिशें कर रही है, उसकी वजह से ममता बेहद सतर्क हैं. हालांकि वे पहले एनडीए में रह चुकी हैं लेकिन फिलहाल बीजेपी उनकी ज्यादा बड़ी दुश्मन है. इसलिए ममता के लिए भी तीसरा मोर्चा एक तरह की मजबूरी है.

थर्ड फ्रंट बन जाएगा लेकिन होगा क्या?

जिस फेडरल फ्रंट की वकालत चंद्रशेखर राव और ममता बनर्जी जैसे नेता कर रहे हैं, वह अगर बन भी जाए तो क्या होगा? समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, टीआरएस, बीजेडी और आप जैसी पार्टियां के अपने-अपने इलाके हैं. वे नैतिक समर्थन देने के अलावा एक-दूसरे की कोई मदद नहीं कर सकती हैं. राष्ट्रीय स्तर पर ये पार्टियां कोई विकल्प देने की हालत में नहीं हैं. इन पार्टियों में कोई ऐसा नेता नहीं है, जिसे प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश किया जा सके और बाकी घटक दल उसके नाम पर मुहर लगा दें.

यह बात भी गौर करने लायक है कि राष्ट्रीय राजनीति में इस समय ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां अप्रासंगिक हैं. बड़े राजनीतिक सवालों पर ये पार्टियां लगभग चुप हैं. राफेल मामला इसका बड़ा उदाहरण है. कांग्रेस के अलावा कोई और पार्टी इस मुद्दे पर आक्रमक नहीं है. 2019 के चुनाव में जो बड़े संभावित मुद्दे हो सकते हैं, उन पर भी इन पार्टियों की ओर से बहुत ज्यादा सक्रियता नहीं दिख रही है. ऐसे में अगर गैर-कांग्रेस और गैर-बीजेपी पार्टियां किसी तीसरे मोर्चे का एलान भी करती हैं तो आम वोटर इसे विकल्प के तौर पर गंभीरता से नहीं लेगा.

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फिर तीसरे मोर्चे की वकालत के मायने क्या हैं? इसका जवाब हाल ही ममता बनर्जी ने दिया था. ममता का कहना था कि बीजेपी को जो जहां रोक सकता है, वह अपनी ताकत से रोके. 2019 के चुनाव नतीजे आने के बाद बीजेपी विरोधी पार्टियां एकजुट हों और मिलजुल सरकार बनाने के विकल्पों पर विचार करें. ममता के इस बयान से यही लगता है कि फिलहाल क्षेत्रीय पार्टियां लामबंद होना चाहती हैं, ताकि नतीजों के बाद अगर त्रिशंकु लोकसभा हो तो अपने लिए ज्यादा से ज्यादा सौदेबाजी कर सकें.

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आनेवाले चुनाव को बीएसपी जैसी पार्टी के अस्तित्व के लिए निर्णायक माना जा रहा है. लेकिन दूसरी तरफ हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. वह 1998 वाली स्थिति में नहीं है, जहां बीजेपी को रोकने के लिए बाहर से समर्थन देकर किसी और को प्रधानमंत्री बनवा दे.

सत्ता का कर्नाटक फॉर्मूला भी दिल्ली में नहीं चल पाएगा. ऐसे में तीसरा मोर्चा अगर बन भी गया तो उसमें चुनाव नतीजों के बाद बिखराव तय है. स्पष्ट बहुमत ना मिलने पर एनडीए या यूपीए की तरफ अपनी सुविधा और परिस्थितियों के मुताबिक क्षेत्रीय पार्टियों की दौड़ दिखाई देगी. लेकिन फिलहाल ये बातें दूर की कौड़ी हैं. चुनावी माहौल में हर दिन कुछ ना कुछ नया हो रहा है. मुमकिन है, आने वाले वक्त में राजनीतिक हालात लगातार बदलते दिखाई दें.

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