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मिशन 2019: दलबदलू नेताओं के भरोसे नीतीश कुमार!

दूसरी पार्टी छोड़कर जेडीयू में शामिल होने वाले नेताओं पर पार्टी प्रमुख न सिर्फ भरोसा कर रहे हैं बल्कि उन्हें अहम जिम्मेदारी भी सौंप रहे हैं

Updated On: Mar 21, 2018 07:10 PM IST

Kanhaiya Bhelari Kanhaiya Bhelari
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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मिशन 2019: दलबदलू नेताओं के भरोसे नीतीश कुमार!

बिहार के सीएम नीतीश कुमार 2019 लोकसभा चुनाव की तैयारी में तन, मन और धन से लग गए है. चुनाव को लेकर वह बेहद गंभीर हैं. तभी तो पुरानी रंजिश को ताक पर रखकर भूतकाल में गाली देने वालों के साथ भी गलबहिंया कर रहे हैं. दूसरी तरफ मालदारों को राज्य सभा में भेजने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं.

हाल के दिनों में जनता दल यू के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने दो दमदार नेताओं को अपने राजनीतिक कुटिया में एंट्री दी है. इनमें एक ताजा-ताजा बागी हैं तो दूसरे अनुभवी दलबदलू. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इन दोनों के जनता दल यू में आने से नीतीश कुमार को यकीनन चुनावी फायदा मिलेगा.

वैसे ये दोनों नेता भूतकाल में पानी पी-पीकर अपने अंदाज में नीतीश कुमार को खूब आल्हा-बिरहा सुनाते रहते थे. लेकिन राजनीति में 'जिसे हम भूलना चाहें वो अक्सर याद आते हैं' वाली सेंटीमेंट कतई फायदेमंद नहीं होती है.

आखिर कौन हैं ये दो चेहरे?

पहले महारथी हैं अशोक चौधरी. कभी गर्व से कहते थे कि 'I am a Khandani devotee of Gandhi family.' इनको कांग्रेस पार्टी ने हर वो चीज दी जिसकी इन्होंने मांग की. इसके साथ ही मंत्री और अध्यक्ष पद भी मिला जो बहुत कम होता है. विधायक बनाए गए. पता नहीं क्या वजह रही कि नाराज होकर कोप भवन में चले गए. वहां से निकलते ही पलटी मारकर 'नीतीशम शरणम गच्छामि' हो गए.

ashok choudhary

अशोक चौधरी

सियासी चौपाल से छनकर आ रही खबरों पर अगर थोड़ा-बहुत विश्वास किया जाए तो दलित समाज से आने वाले अशोक चौधरी को जनता दल यू का प्रदेश अध्यक्ष बनाया जा सकता है. वर्तमान अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह की भी इच्छा है कि उन्हें इस पद से मुक्त किया जाए. उनकी उम्र और शरीर दोनों अब संगठन का बोझ उठाने में असमर्थ हैं.

चुनावी गणित के हिसाब से भी दलित को सांगठनिक सिंहासन पर बैठाना फायदेमंद रहेगा. अभी दल के दो पुराने दलित नेता उदय नारायण चैधरी और श्याम रजक भीतर ही भीतर नीतीश कुमार से नाराज हैं. अफवाह ये भी है कि दोनों दलित नेता कभी भी अपने मकान में लालटेन टांग लेंगे. इस बात की भनक नीतीश कुमार को भी है.

एक कहावत है, 'नए जब दोस्त मिलते हैं, पुराने छूट जाते हैं.' सौ बात की एक बात है कि अशोक चौधरी में संगठन को मजबूत बनाने का जबरदस्त हुनर है. चुनावी साल में ऐसे ही धुरंधरों की जरूरत होती है.

कौन हैं दूसरे नेता?

चुपचाप पल्टी मारने वाले दूसरे नेता हैं पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह. जमुई के नरेंद्र सिंह खांटी लोहियावादी और जयप्रकाश के विचारधारा को मानने वाले हैं. जेपी आंदोलन के अग्रणी नेताओं में इनकी गिनती होती है.

जनता पार्टी से राजनीतिक उबटन लगाते हुए नरेंद्र सिंह ने पहली बार पार्टी बदली और कांग्रेस में शामिल हो गए. कांग्रेस से नाता तोड़कर जनता दल फिर आरजेडी उसके बाद लोकजनशक्ति पार्टी (एलजेपी) फिर जेडीयू से जुड़े. फिर जेडीयू से अलग होकर हम पार्टी और अभी 19 मार्च को हम पार्टी के एक धड़े के साथ जेडीयू में वापसी करते हुए कहा कि 'अब मैं अपने असली घर आ गया हूं.'

कहते हैं कि नरेंद्र सिंह को जनता दल में दोबारा एंट्री करवाने में बिहार सरकार के जल संसाधन मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह की अहम भूमिका रही है. चर्चा है कि ललन सिंह इस बार फिर मुंगेर से लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे.

नरेंद्र सिंह का प्रभाव इस क्षेत्र के राजपूत मतदाताओं पर है जो ललन सिंह को काम देगा. एक अफवाह ये भी है कि जवानी के दिनों से ही नरेंद्र सिंह का दिल लोकसभा में जाना जाता है. लिहाजा बांका लोकसभा क्षेत्र से नरेंद्र सिंह जेडीयू से उम्मीदवार बन सकते हैं.

बताया जाता है कि इनके आने से कम से कम 3 लोकसभा क्षेत्रों में एक समाज के बीच जेडीयू की पकड़ मजबूत होगी. बांका के वर्तमान आरजेडी सांसद जय प्रकाश यादव और विधायक विजय प्रकाश के एकतरफा वर्चस्व को कड़ी चुनौती मिलेगी.

कयास लगाया जा रहा था कि छवि को लेकर घोर सावधान सीएम नीतीश कुमार इस बार विटामिन की जगह कैप्सूल में सत्तू भरकर करोड़ों कमाने वाले को दिल्ली नहीं भेजेंगे. पर जानकार बताते हैं कि नीतीश कुमार धन के सवाल पर कोइ रिस्क नहीं उठाना चाहते हैं. 'कई नेताओं की तरह उनको अपने निजी हित के लिए मनी नहीं चाहिए. लेकिन चुनाव में लक्ष्मी की उपयोगिता से कैसे इनकार किया जा सकता है.'

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