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एसपी-बीएसपी गठबंधन: मायावती की 'चुप्पी' ही उन्हें बड़ा बना रही है

जिस तरह से मायावती ने अपने फ्यूचर के पॉलिटिकल मूव पर सस्पेंस बना रखा है, वो 2019 के लिए उनकी बड़ी राजनीतिक भूमिका का निर्माण करता है

Updated On: Dec 28, 2018 07:08 PM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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एसपी-बीएसपी गठबंधन: मायावती की 'चुप्पी' ही उन्हें बड़ा बना रही है

2019 की चुनावी जंग करीब आती जा रही है और बीएसपी प्रमुख मायावती ने खामोशी की लंबी चादर ओढ़ रखी है. बीएसपी की राजनीति किस करवट लेने जा रही है, उसका इशारा तक देना नहीं चाहतीं. बीजेपी के खिलाफ अलग-अलग राजनीतिक कुनबे बन रहे हैं, एकजुट विरोध के लिए मेल-मुलाकातों का सिलसिला चल पड़ा है.

हर गुट चाहता है कि दलित वोटों की बड़ी पोटली लिए मायावती की नजरें इनायत उनपर हो लेकिन मायावती की चुप्पी उन्हें उम्मीद और नाउम्मीदियों के मंझधार में छोड़ देती हैं. सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात है कि मायावती की चुप्पी ही उन्हें बड़ा बना रही है. इतना बड़ा कि फिलहाल लोकसभा की एक सीट न होते हुए भी उन्हें प्रधानमंत्री पद का संभावित उम्मीदवार तक मान लिया जाता है.

पिछले दिनों तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रमुख केसीआर राज्य फतह करने के बाद बड़े राजनीतिक प्लान के तहत तेलंगाना से बाहर निकले. एंटी बीजेपी और एंटी कांग्रेस फेडरल फ्रंट की अपनी कल्पना को साकार देने के लिए ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक से बात की. उसके बाद पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी से मिले. तीसरे पड़ाव में दिल्ली आकर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और बीएसपी चीफ मायावती से मिलने का प्लान था.

अखिलेश ने तो कह दिया कि वो लखनऊ में हैं और व्यस्त कार्यक्रम की वजह से केसीआर से नहीं मिल पाए लेकिन वो जनवरी में उनसे मुलाकात जरूर करेंगे. अखिलेश ने तो अपनी मजबूरी बता दी लेकिन मायावती दिल्ली में होते हुए भी न केसीआर से मुलाकात कीं और न ही किसी तरह का बयान दिया. केसीआर के ‘पॉलिटिकल ऑफर’ पर हामी या इनकार की बात छोड़ दीजिए अपने रुझान का एक संकेत तक नहीं दिया मायावती ने. मायावती चुप रहीं. उनकी चुप्पी कयासों की कमान पर चढ़कर राजनीति के आसमान में उनके बुलंद होते सितारे की संभावना दिखा रही है. सवाल और बड़ा बन गया है- आखिर किधर जाएंगी मायावती?

मायावती अपने राजनीतिक रूझान का इशारा कर दें तो शायद वो बात न रहे. लेकिन जिस तरह से उन्होंने अपने फ्यूचर के पॉलिटिकल मूव पर सस्पेंस बना रखा है, वो 2019 के लिए उनकी बड़ी राजनीतिक भूमिका का निर्माण करता है. बीएसपी के साथ किसी भी दूसरी पार्टी के संभावित गठजोड़ पर मायावती एक ही बात कहतीं रही हैं- बिना सम्मानजनक सीटों के किसी भी पार्टी के साथ बीएसपी गठजोड़ नहीं करने वाली है. इसके आगे के सवाल को वो टाल जाती हैं. सवाल है कि सम्मानजनक सीटें कितनी हों? वो भी तब जब लोकसभा में उनकी एक भी सीट नहीं है.

Akhilesh-Mayawati

मायावती अपने पत्ते क्यों नहीं खोल रहीं

बीजेपी की चुनावी जीत से बुरी तरह त्रस्त पार्टियां मायावती का साथ चाहती हैं. मायावती खुद जानती हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के यूपी चुनाव में बीजेपी के हाथों पाई करारी शिकस्त की भरपाई अकेले मुमकिन नहीं है. लेकिन इस आशंका की वजह से कि कहीं गठजोड़ का ज्यादा फायदा साझीदार पार्टी न ले जाए वो फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं. ऐसा देखा गया है कि बीएसपी के साथ गठबंधन का फायदा बीएसपी से ज्यादा उसकी साझीदार पार्टी उठा ले जाती हैं. इसलिए वो कांग्रेस के साथ गठबंधन को उत्सुक नहीं दिखतीं.

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1996 में बीएसपी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था. नतीजा ये हुआ था कि बीएसपी के दलित वोट तो कांग्रेस को ट्रांसफर हो गए लेकिन कांग्रेस के ब्राह्मण वोटबैंक ने बीएसपी की बजाए बीजेपी को वोट कर दिया. बीएसपी को नुकसान उठाना पड़ा था. जबकि बीजेपी के विरोध वाली आवाजों को एकजुट करने के नाम पर कांग्रेस बार-बार मायावती की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखती रहती है.

मध्य प्रदेश चुनावों के दौरान राहुल गांधी आखिरी वक्त तक कहते रहे कि बीएसपी के साथ गठबंधन हो जाएगा लेकिन मायावती ने कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर सस्पेंस बरकरार रखा और आखिर में कांग्रेस की तमाम कोशिशों के बावजूद भी गठबंधन नहीं हुआ. हालांकि बीजेपी की हार के बाद बहुमत के लिए थोड़े से अंतर से लड़खड़ा रही कांग्रेस की सरकार को समर्थन का ऐलान करके थोड़ी राहत जरूर दे दी. लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये भी साफ कर दिया कि वो और उनकी पार्टी कांग्रेस की नीतियों का समर्थन नहीं करती हैं लेकिन वो फिर भी कांग्रेस की सरकार को समर्थन दे रही हैं.

इस साल मई के महीने में कर्नाटक में कुमारस्वामी सरकार के शपथग्रहण समारोह में यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी के साथ मायावती की गर्मजोशी से मुलाकात हुई थी. दोनों की मुलाकात वाली तस्वीरों को लेकर राजनीतिक संभावनाओं को टटोलती कई कहानियां गढ़ी गईं थीं. लेकिन उस वक्त भी मायावती ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी थी. गठबंधन के सवाल पर उनकी तरफ से खामोशी ही मिली.

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव यूपी में एसपी-बीएसपी गठबंधन के लिए एक कदम आगे बढ़ने से लेकर बुआ को मनाने के लिए झुकने को तैयार हैं लेकिन मायावती अपनी चुप्पी नहीं तोड़तीं. उन्होंने अब तक एसपी-बीएसपी गठबंधन को लेकर खुलकर बयान नहीं दिया है. जबकि हाल के एक सर्वे का हवाला देकर ये तक कहा गया है कि यूपी में अगर एसपी-बीएसपी का गठबंधन हो गया तो मोदी सरकार की वापसी में मुश्किल होगी.

गठबंधन के कामयाब फॉर्मूले पर बोलने से क्यों बच रही हैं मायावती

एबीपी न्यूज-सी वोटर के सर्वे के हिसाब से अगर एसपी-बीएसपी गठबंधन हुआ तो एनडीए को 247 सीटें मिलेंगी. यानी बहुमत से 25 सीटें कम. वहीं इस गठबंधन के नहीं होने की सूरत में एनडीए को 291 सीटें हासिल होंगी. यानी बहुमत से 19 सीटें ज्यादा. संभावना जगाने वाले इस आंकड़े पर भी मायावती नहीं पिघलीं हैं, गठबंधन पर साफतौर पर कुछ नहीं बोली हैं. राजनीति के सेंसेक्स पर उनकी उछाल जारी है.

मायावती के समर्थक

राजनीति में मायावती की ‘शोर’ मचा देने वाली खामोशी दिलचस्प तरीके से शुरु हुई. बीएसपी अपने सारे घोड़े खोलकर भी कुछ नहीं कर पाई और जब कुछ नहीं किया तो ढेर सारी चर्चा बटोर ली. सारा जोर लगा देने के बाद भी 2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी का पूरी तरह से सफाया हो गया. 2017 के यूपी चुनाव में पार्टी ने राज्य में अपनी वापसी के लिए कड़ी मशक्कत की. लेकिन वो 19 सीटों पर सिमट गई. बीएसपी को 61 सीटों का नुकसान हुआ.

इसके बाद फूलपुर और गोरखपुर सीट पर उपचुनाव हुए. उपचुनाव में बीएसपी ने कुछ नहीं किया. अपने उम्मीदवार नहीं उतारे. आधे-अधूरे मन से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार को समर्थन दिया. बीएसपी ने चुनाव प्रचार में कोई भूमिका नहीं निभाई. इनदोनों सीटों से समाजवादी पार्टी उम्मीदवार जीते तो इसे एसपी-बीएसपी गठबंधन की जीत माना गया. उसी के बाद से 2019 में बीजेपी से निपटने के लिए एसपी-बीएसपी गठबंधन की चर्चा शुरू हो गई.

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उपचुनावों में जीत से उत्साहित अखिलेश ने भी इस चर्चा को हाथों हाथ लेकर मीडिया के जरिए ही बीएसपी के पास संदेशे भिजवाने शुरू कर दिए. लेकिन जिस मात्रा में उन्होंने अपनी बुआ पर स्नेह उढेला मायावती ने उतनी गर्मजोशी कभी नहीं दिखाई. मायावती ने ज्यादा ना बोलकर ज्यादा सस्पेंस बनाए रखा.

कैराना के उपचुनाव में भी बीएसपी ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारकर 2019 में एसपी-बीएसपी गठबंधन की संभावना बरकरार रखी. कैराना में एसपी समर्थित आरएलडी उम्मीदवार की जीत में बीजेपी के खिलाफ की रणनीति काम करती दिखी. उसके बाद से एसपी-बीएसपी गठबंधन की चर्चा बदस्तूर जारी है. इस संभावित गठबंधन के एक साझीदार अखिलेश तो खूब बोलते हैं. दूसरी साझीदार मायावती अपने पत्ते नहीं खोलती. मध्य प्रदेश राजस्थान और छत्तीसगढ़ चुनाव के नतीजों के बाद भी मायावती ने सस्पेंस बनाए रखा है. उनकी चुप्पी ही उन्हें बड़ा बना रही है.

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