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2019 की लड़ाई कठिन होगी: 'अच्छे दिन' के नारे पर चुनाव नहीं लड़ेगी बीजेपी!

मोदी का समर्थन करने वाले मध्यम वर्ग को लगता है कि यह देश गलत तरीके से चलाया जा रहा है. इसे ठीक करने के लिए क्रांतिकारी फैसलों की जरूरत है. कोई मजबूत नेता आकर यह फैसले लेगा

Aakar Patel Updated On: Jan 03, 2018 05:12 PM IST

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2019 की लड़ाई कठिन होगी: 'अच्छे दिन' के नारे पर चुनाव नहीं लड़ेगी बीजेपी!

नरेंद्र मोदी हमारे दौर के सबसे प्रतिभाशाली राजनेता हैं. वो हिंदुस्तान ही नहीं आस-पास के कई देशों के नेताओं पर 20 बैठते हैं. मोदी के बराबर लोकप्रिय नेता का नाम लेना चाहें, तो जल्दी से कोई और नाम जहन में नहीं आता. ऐसे नेताओं में या तो रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन या फिर तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप अर्दोआन का नाम लिया जा सकता है. मुझे उन दोनों ही देशों की राजनीति की समझ नहीं है. लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि पुतिन और अर्दोआन अपने-अपने देश में मोदी के बराबर ही लोकप्रिय हैं. तीनों ही नेता अपनी पार्टी से ज्यादा लोकप्रिय हैं. इसकी वजह यह है कि उन्होंने अपनी लोकप्रियता का दायरा काफी बढ़ा लिया है.

मोदी आम तौर पर लोकप्रियता में 70 फीसदी रेटिंग हासिल करते हैं. मैं मानता हूं कि ऐसी रेटिंग आम तौर पर गलत होती हैं. उनके काम करने की प्रक्रिया न तो पारदर्शी होती है और न ही गलतियों से परे. लेकिन जिस तरह से मोदी रेटिंग में अव्वल से भी ज्यादा नंबर लाते हैं, वो काबिले-तारीफ है. मोदी की पार्टी तो केवल 31 फीसद वोट ही हासिल कर पाती है.

अगर हम मोदी और उनकी राजनीति को पसंद करने वाले लोगों पर गौर करें, तो उन्हें इन दर्जों में बांटा जा सकता है. पहले तो वो लोग हैं जो ऊंची जाति से ताल्लुक रखते हैं. फिर मध्यम वर्ग भी उनसे काफी प्रभावित है. शहरी वोटर भी मोदी से काफी मुतासिर नजर आता है. जिस तरह से बीजेपी ने गुजरात में शहरी सीटों पर कब्जा किया, उससे यह बात साफ तौर पर नजर आई. भले ही पार्टी की नीतियां ग्रामीण इलाकों में नाकाम हो रही हों, लेकिन शहरी वोटर और मध्यम वर्ग पूरी मजबूती से बीजेपी के साथ है. इसकी वजह सिर्फ नरेंद्र मोदी हैं.

गुजरात-हिमाचल में जर्बदस्त जीत के बाद संसद के बहार जीत का निशान दिखाते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो: पीटीआई)

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को बीते साढ़े तीन वर्षों में अधिकतर चुनावों में कामयाबी मिली है

देश गलत ढंग से चलाया जा रहा है, इसे ठीक करने के लिए क्रांतिकारी फैसलों की जरूरत है

मोदी को मिलने वाले समर्थन की कई वजहें हैं. मध्यम वर्ग को लगता है कि यह देश गलत तरीके से चलाया जा रहा है. इसे ठीक करने के लिए क्रांतिकारी फैसलों की जरूरत है. कोई मजबूत नेता आकर यह फैसले लेगा, यह बात मध्यम वर्ग को हमेशा अपील करती है. पिछले तीन दशकों के मेरा खुद का तजुर्बा यह बताता है. अब यह विचार कितना सही है, इस पर फिर कभी चर्चा होगी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का आरक्षण विरोधी और ब्राह्मणवादी रुख बताता है कि यह संगठन किस तरह के समाज की कल्पना करता है. यह समुदाय कट्टर राष्ट्रवादी है (विदेश में भी ऐसे लोग मोदी को सुनने के लिए भारी तादाद में जमा हो जाते हैं). ऐसे लोग बीजेपी की नीतियों में भी फिट बैठते हैं. ताकतवर राष्ट्रवाद का मतलब है कि लोगों का दिमाग पाकिस्तान और चीन जैसे मसलों पर पूरी तरह से एक ही सोच से भर देना. इन पेचीदा मसलों पर ऐसी सीधी सपाट सोच बीजेपी की विचारधारा से मेल खाती है.

आर्थिक रूप से मध्यम वर्ग तेज तरक्की पर निर्भर है. बुनियादी ढांचे का विकास, सफेदपोश नौकरियों में इजाफा इस वर्ग को पसंद आते हैं. इसीलिए यह तबका बुलेट ट्रेन के प्रोजेक्ट से खुश होता है. उसे हवाई अड्डे बनाए जाने पर खुशी होती है. उसे राज्य का परिवहन सुधारने या गांवों की सड़कें बेहतर करने में कोई दिलचस्पी नहीं.

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देश के मध्यम वर्ग को लगता है कि नरेंद्र मोदी उनकी जिंदगियों में बदलाव लाने के लिए काम कर रहे हैं

अल्पसंख्यकों के मामले में किसी एक सोच के बारे में कहना ठीक नहीं. मगर दक्षिण एशिया में आम तौर पर लोग अल्पसंख्यकों को नापसंद करते हैं. हिंसा इस वर्ग को नापसंद है. इन लोगों को सेक्यूलर शब्द तक पसंद नहीं. ज्यादातर भारतीय वोटर के लिए सेक्यूलरिज्म कोई मुद्दा नहीं.

मध्य वर्ग की नजर में मोदी मेहनत काबिलियत से इस पायदान पर पहुंचे हैं 

मध्यम वर्ग के ज्यादातर लोग नौकरीपेशा होते हैं. इसीलिए उनका काबिलियत पर काफी जोर होता है. इन लोगों की नजर में मोदी मेहनत काबिलियत से इस पायदान पर पहुंचे हैं. जबकि राहुल को विरासत में बहुत कुछ मिल गया. मोदी समर्थक दूसरा तबका बीजेपी का नियमित वोटर है. यह वो लोग हैं जो समाज के ऊंचे तबके से आते हैं. जैसे कि कर्नाटक में लिंगायत समुदाय. गुजरात में पाटीदार और राजस्थान में राजपूत. मोदी समर्थकों का तीसरा तबका वो भारतीय हैं जिन्हें हिंदुत्व की राजनीति पसंद आती है. जिसे यह लगता है कि दुश्मन देश के अंदर ही है. यह लोग मानते हैं कि देश की तरक्की के लिए इस दुश्मन से पहले निपटना होगा.

मुझे लगता है कि बाद के दो वर्गों वाले मोदी समर्थक हर हाल में बीजेपी और मोदी के साथ ही रहेंगे. भले ही मोदी के बाद कोई और नेता बन जाए. वो अभी भी बीजेपी का समर्थन करते हैं. आगे भी करते रहेंगे. लेकिन मोदी समर्थकों का जो पहला तबका है, वो मोदी की जादुई छवि से प्रभावित है. उन्हें लगता है कि मोदी अपने वादे पूरे करेंगे.

अब साल 2018 शुरू हो गया है. 2019 के आम चुनाव से पहले यह आखिरी पूरा साल है. आर्थिक मोर्चे पर जो आंकड़े सामने हैं वो मोदी को फ्लॉप साबित करते हैं. मनमोहन सिंह ने बताया था कि मोदी सरकार, यूपीए सरकार के दौर की विकास दर हासिल नहीं कर पाएगी. कॉरपोरेट जगत मोदी को बहुत पसंद करता है. लेकिन अगर मोदी किसी कॉरपोरेट घराने के सीईओ होते, तो उनका इम्तिहान तिमाही नतीजे होते. वो अब तक नौकरी से निकाल दिए गए होते.

rahul gandhi manmohan singh

जीएसटी और नोटबंदी को लेकर विपक्ष ने नरेंद्र मोदी की आर्थिक नीतियों की काफी आलोचना है

मेरी नजर में सबसे अहम आंकड़ा यह है कि 2009 में दुनिया की अर्थव्यवस्था मंदी की वजह से कम हो गई थी. लेकिन आज दुनिया तरक्की की तेज रफ्तार से चल रही है. यह रफ्तार 3 फीसदी सालाना है. लेकिन ऐसे माहौल में भी भारत की विकास दर घट गई है. इसकी वजह हैं नोटबंदी जैसे सनक भरे फैसले.

2019 का लोकसभा चुनाव प्रचार जहरीला और बंटवारा करने वाला होगा

यह नाकामी ही मोदी और बीजेपी के दिमाग पर उस वक्त हावी होगी, जब वो 2019 के लिए रणनीति बनाने बैठेंगे. उनके पास बताने के लिए कोई आर्थिक कामयाबी नहीं होगी. क्या आपको याद है कि किसी चुनाव में आपने सबसे तेजी से तरक्की करते देश का नारा सुना हो? जाहिर है 2019 का चुनाव प्रचार जहरीला और बंटवारा करने वाला होगा. भारतीय के तौर पर यह खयाल मेरे लिए बहुत बुरा है. लेखक और समाज के एक हिस्से के तौर पर मेरे लिए यह देखना दिलचस्प होगा कि मोदी के साथ खड़ा मध्यम वर्ग 2019 में उनका कितना साथ देता है.

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