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किसानों की कर्ज माफी: कमलनाथ के लिए वित्तीय संकट और घोटाले से निपटने की बड़ी चुनौती

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने दो दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर भावांतर योजना के तहत केंद्र से मिलने वाली 575 करोड़ रुपए की राशि तत्काल जारी करने का आग्रह भी किया था

Updated On: Feb 07, 2019 08:07 AM IST

Dinesh Gupta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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किसानों की कर्ज माफी: कमलनाथ के लिए वित्तीय संकट और घोटाले से निपटने की बड़ी चुनौती

मध्यप्रदेश में कमलनाथ की सरकार एक मात्र एजेंडे पर तेजी से काम करती नजर आ रही है. यह एजेंडा किसानों की कर्ज मुक्ति का है. किसानों की कर्ज मुक्ति हर हाल में लोकसभा चुनाव के पहले होनी है. किसानों को कर्ज मुक्त किए जाने के लिए सरकार को लगभग बीस हजार करोड़ रुपए की जरूरत है. विरासत में सरकार को खजाना खाली मिला है. कर्ज मुक्ति की प्रक्रिया के दौरान सामने आए घोटालों के बीच वास्तविक कर्जदार किसानों तक योजना का लाभ पहुंचाने की बड़ी चुनौती कमलनाथ के सामने है.

कर्ज मुक्ति के जरिए लोकसभा चुनाव में सीटें बढ़ाने की कवायद

राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही कमलनाथ ने किसानों के दो लाख रुपए तक के कर्ज माफ करने के आदेश जारी कर दिया था. किसानों को कर्ज मुक्त किए जाने के लिए आवेदन लेने की प्रक्रिया 15 जनवरी को शुरू की गई थी. आवेदन देने की अंतिम तारीख पांच फरवरी थी. एक सरकारी प्रवक्ता के अनुसार इस तारीख तक पचास लाख किसानों ने कर्ज मुक्ति के लिए आवेदन किया है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

कांग्रेस इन किसानों के जरिए ही लोकसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल करने का अनुमान लगा रही है. बीस सीटें जीतने का लक्ष्य कांग्रेस ने तय किया है. राज्य में लोकसभा की कुल 29 सीटें हैं. वर्तमान में कांग्रेस के पास सिर्फ तीन सीटें हैं. राज्य विधानसभा के हाल ही में संपन्न हुए चुनाव परिणामों के हिसाब से लोकसभा की 17 सीटें कांग्रेस ने जीती हैं. कांग्रेस ने इसी गणित के आधार पर बीस सीट जीतने का लक्ष्य तय किया है.

इस लक्ष्य को पाने के लिए किसान, कांग्रेस के मददगार बन सकते हैं. इस कारण ही मुख्यमंत्री कमलनाथ ने 22 फरवरी की तारीख किसानों के खाते में पैसा पहुंचने की तय की है. मुख्यमंत्री कमलनाथ का अनुमान है कि पचपन लाख किसानों को इसका सीधा लाभ मिलेगा. प्रदेश में कुल 55 लाख 61 हजार 712 ऋण खाते हैं. इनमें अपात्रता वाले किसान जैसे आयकरदाता/शासकीय सेवक, जन-प्रतिनिधि (विधायक, सांसद आदि) और जीएसटी पंजीयन वाले किसानों के फसल ऋण खाते भी सम्मिलित हैं.

साथ ही जिन कृषकों के अलग-अलग ऋण खातों में 2 लाख रुपए ऋण से ज्यादा की ऋण राशि हैं, उनके द्वारा भी 2 लाख रुपए से ऊपर के अन्य ऋण खातों में आवेदन नहीं किए जाने के कारण कुल प्राप्त आवेदनों की संख्या 50 लाख 40 हजार 861 रही है. कांग्रेस पूरे प्रदेश में किसान रथ यात्रा के जरिए कर्ज मुक्ति का संदेश भी दे रही है.

लाभ वोटों में बदलेगा, ऐसा अनुमान भी कांग्रेस लगा रही है. विधानसभा के हाल ही में संपन्न हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मिले कुल वोट कांग्रेस से ज्यादा हैं. बीजेपी को एक करोड़ छप्पन लाख से अधिक वोट मिले थे. कांग्रेस को बीजेपी से लगभग 47 हजार वोट कम मिले थे. कांग्रेस पंद्रह साल बाद सरकार में वापसी के लिए कर्ज मुक्ति को बड़ा कारण मानती है. कांग्रेस यह मानकार चल रही है कि किसानों के खाते में पैसा पहुंचने के बाद लाभान्वित किसान का भरोसा कांग्रेस सरकार पर बढ़ेगा.

घोटाले उजागर होने का लाभ भी लेना चाहती है कांग्रेस

Kamalnath

पिछले एक दशक में यह दूसरा मौका है, जबकि किसानों की ऋण माफी का काम बड़े पैमाने पर किया जा रहा है. कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार की इस ऋण माफी योजना का सबसे मजबूत और उजला पक्ष क्रियान्वयन में अपनाई जा रही पारदर्शिता है. इस पारदर्शिता के कारण ही यह तथ्य भी जगजाहिर हो रहा है कि सहकारी समितियों और बैंकों ने किन-किन सदस्यों और किसानों के नाम पर कर्ज की रकम चढ़ा रखी है. मुख्यमंत्री कमलनाथ कहते हैं कि कर्ज का यह घोटाला तीन हजार करोड़ रुपए से अधिक का है.

कर्ज मुक्ति के लिए फॉर्म भरने की और लाभान्वित किसानों की सूची यदि सार्वजनिक नहीं की जाती तो यह तय था कि तीन हजार करोड़ रुपए का यह घोटाला कभी उजागर ही नहीं हो पाता. घोटाले में सहकारी क्षेत्र की संस्थाएं ही नहीं राष्ट्रीयकृत बैंक भी शामिल हैं.

सहकारिता विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस घोटाले पर कहा कि पूर्ववर्ती बीजेपी सरकार, सहकारी बैंकों में ऐसे ही अधिकारियों को पदस्थ करती थीं, जो बैंक के खजाने से नगद रुपया निकालने की हिम्मत दिखा सकते थे. रीवा का उदाहरण सामने है. घोटाला लगभग दो साल पहले उजागर हुआ था. 25 करोड़ रुपए से अधिक का घोटाला है. मामले में 67 से ज्यादा नामजद आरोपी हैं लेकिन, कार्रवाई नहीं हो पाई.

सरकार ने बार-बार जांच अधिकारी बदले. हद तो तब हो गई जब घोटाले के आरोपियों से जब्त किया गया ट्रक बेचने की कोशिश की गई. ट्रक थाने में खड़ा था. आरोपियों ने जेल में बैठे-बैठे ही ट्रक बेचने का सौदा कर लिया था. राज्य के हर सहकारी बैंक की यही कहानी है. राज्य के कृषि मंत्री सचिन यादव कहते हैं कि किसानों के नाम पर जीरों परसेन्ट ब्याज पर लोगों ने किसानों के नाम से कर्ज लिया और ऊंची ब्याज दर पर चढ़ाकर मुनाफा कमाया.

राज्य में कुल 38 जिला सहकारी बैंक हैं. ये बैंक ढाई हजार करोड़ रुपए से अधिक के घाटे में चल रहे हैं. किसानों को शून्य ब्याज दर पर ऋण देने की योजना के तहत जो राशि बैंकों को क्षतिपूर्ति के तौर पर मिलना थी, वह भी नहीं दी गई. योजना वर्ष 2012 में शुरू की गई थी. बेस रेट के आधार पर सरकार को 11 प्रतिशत ब्याज की रकम सहकारी बैंकों को देनी थी, लेकिन सरकार टालती रही.

आज कई सहकारी बैंक बंद होने की कगार पर हैं. वर्ष 2008 में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने किसानों की कर्ज माफी का जो फैसला किया था, उसमें सौ करोड़ रुपए से अधिक का घोटाला होना तो तत्कालीन बीजेपी सरकार के कृषि मंत्री गौरीशंकर विसेन ने विधानसभा में पेश किए गए अपने प्रतिवेदन में ही स्वीकार किया था. तत्कालीन कृषि मंत्री के सदन में स्वीकार करने के बाद भी सरकार ने इस घोटाले के आरोपियों के खिलाफ गंभीर कार्रवाई नहीं की. परिणति ये हुई कि एक दशक बाद फिर नया घोटाला सामने आ गया.

किसानों की कर्ज माफी का असर विकास योजनाओं पर पड़ेगा

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शिवराज सिंह चौहान ने चुनाव की घोषणा से पहले ही लगभग हर विभाग का वर्ष 2018-2019 का पूरा बजट उपयोग में ले लिया था. कमलनाथ सरकार को विरासत में खाली खजाने के साथ-साथ दो लाख करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज भी मिला है. खजाना खाली होने के कारण कमलनाथ को विधानसभा के पहले ही सत्र में पूरक बजट पेश करना पड़ा था. इस बजट में किसानों की कर्ज माफी के लिए पांच हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस राशि को अपर्याप्त बता रहे हैं.

किसानों की कर्ज माफी के लिए राशि जुटाने के लिए मुख्यमंत्री कमलनाथ को कई विकास योजनाओं के बजट में कटौती भी करना पड़ी है. वित्तीय वर्ष 2018-19 का 22 हजार 347 करोड़ रुपए का आखिरी सप्लिमेंट्री बजट 10 जनवरी को पास होने के बाद भी अभी तक विभागों को राशि नहीं मिली, जबकि ऑनलाइन व्यवस्था में दूसरे-तीसरे दिन ही राशि विभागों तक पहुंच जाती है.

दूसरी ओर मध्य प्रदेश सरकार को केंद्र से 31 मार्च तक मिलने वाले 8 हजार करोड़ रुपए का इंतजार है. बताया जा रहा है केंद्र से पैसा मिलने के बाद ही स्थिति बेहतर हो सकती है. तब तक व्यवस्था संचालन के लिए राज्य सरकार ने एक हजार करोड़ रुपए का कर्ज बाजार से उठाया है.

यह मिलाकर बाजार से इस वित्तीय वर्ष में अब तक 13000 करोड़ रुपए का कर्ज लिया जा चुका है. मुख्यमंत्री कमलनाथ ने दो दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर भावांतर योजना के तहत केंद्र से मिलने वाली 575 करोड़ रुपए की राशि तत्काल जारी करने का आग्रह भी किया था.

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