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राजनीति का सस्ता, सुंदर, टिकाऊ मुद्दा बन गया है शराब बैन

अगले चरण के विधानसभा चुनावों से पहले शराबबंदी अगर नोटबंदी जैसा मुद्दा बन जाए तो अचरज नहीं होना चाहिए.

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: Apr 15, 2017 08:47 AM IST

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राजनीति का सस्ता, सुंदर, टिकाऊ मुद्दा बन गया है शराब बैन

बिहार में कुछ महीने पहले शराबबंदी लागू हुई. मध्य प्रदेश सरकार अगले कुछ सालों में शराब की दुकानें खत्म करने की योजना बना रही है. छत्तीसगढ़ सरकार शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रही है. पूरे राजस्थान में शराबबंदी के लिए प्रदर्शन हो रहे हैं.

केरल से चली है हवा

क्या खासतौर से बीजेपी शासित राज्य शराबबंदी की ओर बढ़ रहे हैं? क्या हम अगले चरण के विधानसभा चुनावों से पहले शराबबंदी की होड़ में शामिल हो गए हैं?

यह समझना मुश्किल नहीं है कि शराबबंदी के मामले में कुछ राज्य सरकारें केरल की नकल करने पर आमादा क्यों दिख रही हैं. केरल में 2014 में शराब की खरीद-बिक्री पर रोक लगाई गई थी. दरअसल, शराबबंदी से मतदाताओं का एक ऐसा प्रतिबद्ध समूह तैयार होता है जो शराब को अनैतिक, सेहत के लिए नुकसानदेह और आपराधिक मसला मानता है.

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महिलाओं की जिंदगी पर क्या होता है असर?

जब भी देश में शराबबंदी पर बहस छिड़ती है, मुझे खासतौर से दो महिलाओं की याद आती है जिनकी जिंदगी अलग होती अगर उनके पति शराब के आदती न होते.

इनमें से एक शर्मीली और सहमी सी महिला मेरी सहपाठी रह चुकी है, जिसकी शादी 18 साल की उम्र में उसके मां-बाप ने एक एनआरआई से कर दी थी. इतनी कम उम्र में एक नए देश में अपनों से दूर अजनबियों के बीच में रहना जैसे काफी न हो, उसे एक ऐसे पति का साथ मिला जिसमें राम और रावण दोनों के गुण भरपूर थे.

एक दो पैग लगाते ही बेहद अच्छे और मिलनसार स्वभाव का उसका पति हिंसक हो जाता था और गाली गलौज पर उतर आता था. मारना-पीटना, बाल पकड़कर खींचना, उसने हर संभव तरीके से उसे प्रताड़ित किया. कभी-कभार ऐसा भी हुआ कि नशे में होशोहवास खोने के बाद वह अपने दोस्तों को अपनी पत्नी को गलत तरीके से छूने की इजाजत भी दे देता था.

लेकिन रात बीतने के साथ जब उसका नशा काफूर हो जाता तो उसे अपनी गलती का अहसास होता और वह माफी मांगने लगता. लेकिन उसका यह अहसास तब तक ही कायम रहता जब तक कि शराब की अगली घूंट उसके गले के नीचे नहीं उतरती थी.

यह सिलसिला कई सालों तक चला. इस दौरान इस महिला को कई बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, लेकिन वह यह सब अपनी बेटियों और अपने परिवार की इज्जत की खातिर सहती रही.

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दूसरी कहानी मेरी एक महिला रिश्तेदार की है जिसका पति गले के नीचे शराब उतरते ही शैतान बन जाता था. वो उसे परेशान करता, ब्लैकमेल करता और उसके साथ मारपीट करता. यह सब लगातार चलता रहा और एक दिन शराब के नशे में चूर गाड़ी चलाते हुए उसने लोहे के सरिए से लदे ट्रक में टक्कर मार दी. और मेरी रिश्तेदार महिला को भारी कर्ज और दो छोटे-छोटे बच्चों की जिम्मेदारी के साथ छोड़कर चल बसा.

ये दोनों महिलाएं स्मार्ट हैं, पढ़ीलिखी हैं, नौकरी करती हैं और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं. इनमें से एक महिला की आय अमेरिकी प्रवासियों की औसत आमदनी से दोगुनी है. दूसरी महिला एक सरकारी की स्कूल में प्रिसिंपल के पद से रिटायर होने वाली है.

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आखिर इन दोनों महिलाओं ने इतने जुल्म-सितम क्यों सहे? इस मसले पर बाद में बात की जा सकती है. लेकिन यहां सबसे प्रासंगिक विषय यह है कि दोनों महिलाएं यह मानती हैं कि अगर शराब न होती तो आज उनकी जिंदगी बिल्कुल अलग होती.

देश के अंदरूनी हिस्सों में बदतर हैं हालात

इस तरह की कहानियां बेहद आम हैं. मैंने इन कहानियों की चर्चा इस बात पर बल देने के लिए की कि अगर दुनिया के दो कोनों में दो सक्षम और स्वतंत्र महिलाओं की जिंदगी सिर्फ इसलिए दयनीय हो सकती है कि उनके पति शराब के आदती थे तो भारत के विभिन्न हिस्सों में रहने वाली उन हजारों गरीब महिलाओं की जिंदगी इससे अलग कैसे हो सकती है?

2014 में केरल सरकार ने शराब पर प्रतिबंध लगाते वक्त एक अध्ययन का हवाला दिया था जिसके मुताबिक 50 फीसदी घरेलू हिंसा के मूल में शराब है. एक दूसरे अध्ययन के मुताबिक, केरल के अस्पतालों में भर्ती होने वालों में करीब एक चौथाई और राज्य के कुल अपराध का 69 फीसदी नशाखोरी से जुड़ा था. देश के दूसरे राज्यों के आंकड़े भी इससे अलग नहीं होंगे.

लिहाजा, शराबबंदी के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क यही होगा कि शराब से न सिर्फ पीने वाला बल्कि उसके आसपास के लोग और खासतौर से घर की महिलाएं और बच्चे भी प्रभावित होते हैं. इसकी तुलना सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान करने से दूसरों पर पड़ने वाले असर से की जा सकती है. लेकिन धूम्रपान की तरह सार्वजनिक जगहों पर शराब पीने की पाबंदी लगाकर शराब के असर से नहीं बचा जा सकता.

शराबबंदी के खिलाफ तर्क भी हैं

बिहार में नीतीश कुमार ने सरकारी खजाने को होने वाले नुकसान और भारी विरोध के बावजूद शराबंदी को सख्ती से लागू किया. बिहार में शराबबंदी की सफलता में राज्य सरकारों को वह सियासी हथियार दिख सकता है जिसके जरिए चुनाव के वक्त सत्ता के खिलाफ पैदा होने वाले असंतोष से निपटा जा सकता है. लेकिन शराबबंदी के खिलाफ दिए जाने वाले तर्क भी कम मजबूत नहीं हैं.

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शराबबंदी से नकली और जहरीली शराब के उत्पादन, तस्करी और अवैध कारोबार को बढावा मिलता है, जो न सिर्फ सेहत के लिए खतरनाक होती है बल्कि अपराध में इजाफा भी करती है. उदाहरण के लिए, गुजरात में पूर्ण शराबबंदी होने के बावजूद बड़ी आसानी से शराब खरीदी जा सकती है.

दरअसल, शराब पीने वाला हर व्यक्ति समाज के लिए खतरा नहीं है. अत्यधिक शराब पीने और नशे में सुध-बुध खो देने वाले ही हिंसा करते हैं और दुर्घटनाओं को दावत देते हैं. हमारे देश में ऐसे लोगों की संख्या तुलनात्मक रूप से बेहद कम (सिर्फ 11 फीसदी) है. लिहाजा, इन 11 फीसदी लोगों की हरकतों की वजह से किसी खास मौके पर कभी-कभार पीने वालों को दंड देना पूरी तरह अन्याय है.

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तस्वीर पीटीआई

लेकिन शराबबंदी तो अब चुनावी मुद्दा है

लेकिन राज्य सरकारें एक चुनावी रणनीति के तहत शराबबंदी की दिशा में काम कर रही हों तो वे जिम्मेदारी से शराब का सेवन करने वालों के अधिकारों की हिफाजत के बारे में भला क्यों सोचेंगी?

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हमारे नेताओं को अच्छी तरह पता है कि शराब पीना हमारे समाज में स्वीकार्य नहीं है और इसे अच्छी नजर से नहीं देखा जाता. अगर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की बीजेपी सरकारें शराबबंदी का फैसला करती हैं तो वे अच्छी तरह जानती हैं कि कोई इसका विरोध करने का साहस नहीं जुटा पाएगा.

लिहाजा, अगले चरण के विधानसभा चुनावों से पहले शराबबंदी अगर नोटबंदी जैसा मुद्दा बन जाए तो अचरज नहीं होना चाहिए.

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