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लिंगायत मुद्दा : धर्म की राजनीति में बीजेपी से दो कदम आगे चल रही है कांग्रेस

क्या कांग्रेस अब आरएसएस के नाम पर बीजेपी को घेर सकेगी. बिल्कुल नहीं.

Updated On: Mar 20, 2018 04:04 PM IST

Ravi kant Singh

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लिंगायत मुद्दा : धर्म की राजनीति में बीजेपी से दो कदम आगे चल रही है कांग्रेस

महज दो दिन पहले कांग्रेस पार्टी का महाधिवेशन संपन्न हुआ. पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की बागडोर में यह पहला जमावड़ा था. कई प्रस्तावों पर चर्चा हुई. राजनीति से लेकर विदेश नीति और गृह नीति तक पर बहस हुईं. एकसुर में बोला गया कि मौजूदा सरकार हर मोर्चे पर नाकाम है.

महाधिवेशन का लब्बोलुआब बताया गया कि कांग्रेस राज आया तो समावेशी विकास की बात होगी, समग्र विदेश नीति की बात होगी. और बात होगी सर्वधर्म समभाव की. लेकिन कांग्रेस के सामने ऐसी कौन सी मजबूरी आन पड़ी, जो महाधिवेशन समाप्त होने के अगले ही दिन उसके चाल-चरित्र और चेहरे में इतना बड़ा फांक दिख गया. कर्नाटक में पार्टी ने एकतरफा ऐलान कर दिया कि वह लिंगायतों को अल्पसंख्यक का दर्जा देगी. इसके लिए केंद्र सरकार के पास प्रस्ताव भी रवाना कर दिया गया.

अबतक भारत राष्ट्र-राज्य में अलग जाति के कोटे की मांग होती थी, पर कांग्रेस ने सोमवार को अलग धर्म का बिगुल फूंक दिया. जान लें, मौजूदा पीढ़ी के लिए यह अनोखी घटना है क्योंकि इसके पूर्व बौद्धों और जैनों को अल्पसंख्यक दर्जा दिया गया तो उसकी सियासी वजहें कम, सामाजिक ज्यादा थीं. अब कांग्रेस और सिद्धारमैया इससे कई कदम आगे निकलने की तैयारी में लग गए हैं. क्या 'वोट पॉलिटिक्स' इतनी बड़ी मजबूरी हो सकती है कि नई इबारत लिखने की जल्दी में 'मर्सिया' लिखने की तैयारी हो जाए. लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देना इससे जुदा और कुछ नहीं.

यह कोई पहली बार नहीं है जब लिंगायत का मुद्दा चुनाव से पहले उछला हो. लेकिन इस बार खास इसलिए है क्योंकि कर्नाटक सरकार ने लिंगायतों को अल्पसंख्य दर्जा दे दिया और इसका प्रस्ताव केंद्र को भी भेज दिया. गेंद अब केंद्र के पाले में है कि वह क्या करती है. आइए जानते हैं कि मामला क्या है और इसके आगे क्या हो सकता है.

लिंगायतों की आबादी पर कांग्रेस की नजर

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सिद्धारमैया यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि बीजेपी जिस दिन कर्नाटक के रण में उतरेगी उस दिन हिंदू राजनीति की बात होगी. भगवा और राष्ट्रवाद का मुद्दा उछलेगा. पर बीजेपी कुछ कर पाती, उससे पहले ही सिद्धारमैया ने मास्टरस्ट्रोक खेल दिया. इसलिए कि उनकी नजर कर्नाटक में लिंगायत आबादी पर है. इस आबादी की बात जो पार्टी करेगी, थोक में उसे वोट जाएगा. आइए समझते हैं लिंगायतों की जनसंख्या का पूरा गणित.

1981 की जनगणना में कर्नाटक की आबादी तकरीबन पौने चार करोड़ बताई गई. जिसमें 6 लाख लिंगायत हैं. सबसे दिलचस्प बात ये है कि इनकी वृद्धि दर कर्नाटक की अन्य जातियों के आसपास ही बैठती है. वोट बैंक के लिहाज से यह आबादी अच्छी मानी जाएगी क्योंकि इनका एकमुश्त वोट जीत-हार तय करेगा. सिद्धारमैया किसी सूरत में इस मौके को गवाना नहीं चाहते.

कांग्रेस अच्छी तरह जानती है कि शहरी क्षेत्र बीजेपी का गढ़ है. कर्नाटक में भी शहरी लोग बीजेपी को पसंद करते हैं. जबकि लिंगायतों की आबादी ज्यादातर गांवों में है. शहरों में भी है लेकिन उतनी नहीं. अंदाजन 27 हजार गांव और 300 छोटे शहर ऐसे हैं जहां लिंगायतों की पैठ है. आंकड़ों की मानें तो एक गांव में औसतन 250 से लेकर 3,500 तक इनकी जनसंख्या है. कोई पार्टी इसे साधती है तो क्या बुरा है ?

बीजेपी नेता बीएस येदियुरप्पा भी लिंगायतों के हिमायती रहे हैं. ऐसे में बीजेपी कोई अगला कदम बढ़ाती, इससे पहले कांग्रेस ने अपनी चाल चल दी. अब देखना होगा कि बीजेपी का इसपर क्या स्टैंड होता है.

हिंदू बनाम लिंगायत का पेच

यहां जान लेना जरूरी है कि लिंगायत अपने को हिंदू नहीं मानते. वे गले में भले इष्टलिंग (शिव) को धारण करते हों लेकिन अपने शिव को हिंदुओं के शिव से जुदा मानते हैं. हिंदू जहां शिव की मूर्ति के पूजक हैं तो लिंगायत मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी. इतना ही नहीं, लिंगायत शिव को निराकार मानते हैं. हिंदू जहां वेदों को मान्यता देते हैं तो लिंगायत इसे नकारते हैं. संस्कृत को लेकर भी लिंगायतों में विरोध है. वे कन्नड़ को आदि भाषा के रूप में मान्यता देते हैं. जबकि हिंदुओं के वेद, उपनिषद या फिर अन्य धार्मिक ग्रंथ सभी मूलतः संस्कृत में लिखे गए हैं. इसलिए यह भी संभावित है कि कर्नाटक चुनाव से पूर्व भाषाई आधार पर भी वोटों का ध्रुवीकरण हो. ठीक वैसे ही, जैसे तमिलनाडु की राजनीति में तमिल बनाम संस्कृत का लफड़ा गाहे-बगाहे देखा जाता है.

अल्पसंख्यक दर्जे से बीजेपी को जवाब

चुनाव पूर्व लिंगायतों को अल्पसंख्यक मानकर सिद्धारमैया ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि बीजेपी अगर हिंदुओं की राजनीति कर सकती है, तो कांग्रेस लिंगायतों के नाम पर क्यों नहीं. दोनों धर्मों की रवायतें दो छोर पर हैं तो दोनों पार्टियां आराम से इन्हें पोलराइज कर सकती हैं. अगले चुनाव में ऐसा जरूर देखा जाएगा जब हिंदू बनाम लिंगायत की राजनीति कर्नाटक में अहम मुद्दा बनकर उभरेगी.

अल्पसंख्यक दर्जे में क्या-क्या

लिंगायतों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाए, इसके लिए नागदास कमेटी ने कर्नाटक सरकार से सिफारिश की. सिद्धारमैया सरकार ने इसे मान भी लिया. आनन-फानन में राज्य अल्पसंख्यक आयोग कानून की धारा 2डी के तहत यह दर्जा दे दिया गया और इसका प्रस्ताव अब केंद्र के हवाले है. क्या केंद्र की बीजेपी सरकार इसे मानेगी. अगर मान भी लेती है तो क्या लिंगायत बीजेपी को वोट देंगे. जान लें, यह दोनों नहीं होने वाला क्योंकि इसके दूरगामी परिणाम होंगे जिसे बीजेपी अपने माथे पर बदनुमा दाग के रूप में कतई लेना नहीं चाहेगी. इसलिए चुनावी जुमले की तरह यह गुब्बारा फुलेगा और चुनाव संपन्न होते ही इसकी हवा निकल जाएगी.

बीजेपी के वरिष्ठ नेता और राज्य के पूर्व सीएम येदियुरप्पा को लिंगायत समुदाय का मजबूत नेता माना जाता है.

बीजेपी के वरिष्ठ नेता और राज्य के पूर्व सीएम येदियुरप्पा को लिंगायत समुदाय का मजबूत नेता माना जाता है.

सिद्धारमैया ने अब तक यह नहीं बताया कि लिंगायतों को अलग धर्म मान भी लें तो वीरशैवों का क्या होगा. वीरशैव लिंगायत समुदाय का ही एक अंग है जो अपने को लिंगायतों से कई मामलों में अलग मानते हैं. मसलन वेद पूजा और जाति व्यवस्था इनकी परंपराओं में शामिल है जो लिंगायतों में नहीं देखी जाती. ऐसे में वीरशैवों की कोई चर्चा न करना कर्नाटक सरकार के लिए खतरनाक साबित हो सकता है क्योंकि आगे अब वे भी सड़कों पर उतरेंगे.

क्या जायज है लिंगायतों की मांग

मामला सिर्फ अल्पसंख्यक दर्जा देने भर का नहीं है. लिंगायत पूरे कर्नाटक में अपने स्कूल-कॉलेज चलाते हैं. जरूरतमंदों को मुफ्त शिक्षा, रहन-सहन देते हैं. अल्पसंख्यक का दर्जा मिलते ही वे अलग शिक्षा पद्धति की मांग करेंगे. इनकी अपनी धार्मिक शिक्षा-दीक्षा होगी. तब सवाल है कि हम मदरसों से इन्हें कैसे अलग मानेंगे ? मदरसों की आलोचना इसके लिए भी होती रही है कि वहां कट्टर धार्मिक तालीम दी जाती है. किसी खास धर्म के लिए बच्चों को तैयार किया जाता है. ऐसे में हम लिंगायत शिक्षण-व्यवस्था को मदरसों की व्यवस्था से कैसे अलग मानेंगे? कांग्रेस और सिद्धारमैया को इसका जवाब जरूर देना चाहिए.

कांग्रेस की इस राजनीति से समझना आसान है कि अब तक बीजेपी को अगर कट्टर धार्मिक पार्टी कहा जाता रहा है तो कांग्रेस को किस श्रेणी में रखेंगे ? क्या आने वाले समय में कांग्रेस सर्वधर्म समभाव की बात आते ही अपना चेहरा नहीं छुपाएगी? क्या कांग्रेस तब आरएसएस के नाम पर बीजेपी को घेर सकेगी. बिल्कुल नहीं.

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